क्या है पूरा मामला?
सुभाष चंद्रा पर करीब 22,006 करोड़ रुपये का कर्ज है, जो उनकी कंपनियों के लिए लिए गए कर्ज की गारंटी देने से बना था। उन्होंने लेनदारों को सिर्फ 6.25 करोड़ रुपये चुकाने का प्रस्ताव रखा था, जिसे NCLT ने 25 अगस्त को मंजूरी दे दी। इस योजना के पक्ष में 80.81% लेनदारों ने वोट किया। हालांकि, HDFC और LIC Housing Finance समेत कुछ लेनदार इसके खिलाफ थे।
यह कर्ज किसका था?
यह कर्ज सुभाष चंद्रा ने निजी तौर पर नहीं लिया था, बल्कि वे Essel Group की अलग-अलग कंपनियों के कर्ज के ‘पर्सनल गारंटर’ थे। मामला उनकी निजी दिवालियापन प्रक्रिया से जुड़ा है, न कि किसी कंपनी के कॉरपोरेट कर्ज से।
कर्ज देने वालों को क्या आपत्ति है?
एलआईसी हाउसिंग, कैनरा बैंक, यूनियन बैंक, एचडीएफसी बैंक और आईडीबीआई समेत कई बैंकों का कहना है कि यह योजना गलत तरीके से पास की गई। उनका आरोप है कि चंद्रा से जुड़ी 5 कंपनियों को वोटिंग की इजाजत दी गई। चूंकि कानून के मुताबिक़ एक निश्चित बहुमत जरूरी था, इसलिए यह योजना पास हो गई और NCLT ने इसे मंजूरी दे दी।
केनरा बैंक ने फोरेंसिक ऑडिट की मांग की थी, लेकिन कहा कि वोटिंग में कम हिस्सेदारी होने के कारण इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। जबकि, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने कहा था कि उसने दूसरे सरकारी सेक्टर के संस्थानों के साथ मिलकर रिजॉल्यूशन प्लान को नामंजूर कर दिया था और NCLT के सामने इसे मंजूरी मिलने का विरोध किया था। बाद में बैंक ने कहा कि वह NCLT के फैसले को NCLAT में चुनौती देगा।
LIC हाउसिंग फाइनेंस ने भी कहा था कि वह दूसरे सरकारी फाइनेंशियल संस्थानों के साथ मिलकर NCLAT में अपील करेगा, जबकि HDFC बैंक ने कहा था कि वह अपील करने पर विचार कर रहा है।
बैंकों ने क्या किया?
केनरा बैंक, यूनियन बैंक और LIC हाउसिंग फाइनेंस ने शनिवार को कहा कि वे NCLT के इस आदेश को चुनौती देंगे। बता दें इसी महीने Zee ने अपनी प्रमोटर कंपनी से ₹660 करोड़ जुटाए थे, लेकिन उसके बाद भी शेयरों पर यह असर पड़ा।
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