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साउथ कोरिया में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्विपक्षीय बैठक करते हुए। तस्वीर 30 अक्टूबर 2025 की है।
ट्रम्प और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 24 सितंबर को होने वाली मुलाकात से पहले ताइवान में डर बढ़ गया है। ताइवान को आशंका है कि चीन के साथ कोई बड़ा आर्थिक समझौता करने के लिए ट्रम्प उसके मुद्दे पर नरम रुख अपना सकते हैं। जापान और साउथ कोरिया समेत अमेरिका के सहयोगी देशों को भी यही चिंता सता रही है।
रॉयटर्स के मुताबिक, ट्रम्प ने मई में ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री को चीन से डील के लिए ‘सौदेबाजी का जरिया’ बताया था। अब जिनपिंग फिर ताइवान का मुद्दा ट्रम्प के सामने उठा सकते हैं।
ऐसे में ताइवान को डर है कि ट्रम्प चीन से कोई बड़ी डील निकालने के चक्कर में कहीं उसके मुद्दे पर पीछे न हट जाएं। अमेरिका के किसी नरम बयान से भी बीजिंग को ताइवान पर दबाव बढ़ाने का हौसला मिल सकता है।
पहले ताइवान का मामला समझिए…
ताइवान चीन के करीब स्थित एक द्वीप है। वहां अपनी सरकार है और लोग अपने नेताओं को चुनाव के जरिए चुनते हैं। ताइवान खुद को अलग तरीके से चलाता है, लेकिन चीन उसे अपना हिस्सा मानता है।
चीन चाहता है कि ताइवान एक दिन उसके साथ मिल जाए। बीजिंग ने यह भी साफ कर रखा है कि जरूरत पड़ी तो वह इसके लिए सैन्य ताकत का इस्तेमाल कर सकता है।
दूसरी तरफ, अमेरिका ताइवान को हथियार देता है ताकि वह अपनी सुरक्षा कर सके। लेकिन अमेरिका ने यह साफ नहीं किया है कि अगर चीन ताइवान पर हमला करता है, तो अमेरिकी सेना सीधे उसकी मदद के लिए युद्ध में उतरेगी या नहीं।
यही वजह है कि ताइवान को लेकर अमेरिका का रुख हमेशा से थोड़ा अस्पष्ट रहा है। वॉशिंगटन चीन को खुलकर चुनौती भी नहीं देता और ताइवान को अकेला भी नहीं छोड़ता।

जापान को किस बात की चिंता है?
ताइवान को लेकर सिर्फ वहां की सरकार ही चिंतित नहीं है। जापान भी ट्रम्प-शी की बैठक को करीब से देख रहा है।
रॉयटर्स के मुताबिक, जापान चाहता है कि अमेरिका ताइवान को लेकर अब तक इस्तेमाल की जाने वाली कूटनीतिक भाषा पर कायम रहे। टोक्यो यह भी चाहता है कि बैठक में ताइवान का मुद्दा इतना न छाए कि दोनों देशों के रिश्तों में तनाव और बढ़ जाए।
जापान के दो सीनियर नेताओं ने रॉयटर्स को बताया कि उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि ट्रम्प चीन से अमेरिकी सामान खरीदने का बड़ा समझौता हासिल करने के बदले ताइवान के मामले में कोई रियायत न दे दें।
अमेरिका में अगले साल मिडटर्म चुनाव होने हैं। ऐसे में चीन के साथ बड़ा कारोबारी समझौता ट्रम्प के लिए घरेलू राजनीति में भी अहम हो सकता है।
बैठक से पहले ताइवान ने अपनी चिंता बताई
बैठक से पहले ताइवान सरकार लगातार अमेरिका के सामने अपना पक्ष रख रही है। ताइवान के सीनियर अधिकारी शेन यू-चुंग ने कहा कि उनकी उम्मीद है कि ऐसा कोई फैसला नहीं होगा जिससे ताइवान को नुकसान पहुंचे।
ताइवान के विदेश मंत्री लिन चिया-लुंग ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि शी बैठक में ताइवान का मुद्दा उठाएंगे। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका कई बार साफ कर चुका है कि ताइवान को लेकर उसकी नीति में बदलाव नहीं हुआ है।

अमेरिका की ‘वन चाइना पॉलिसी’ क्या है?
- अमेरिका ने चीन के साथ राजनयिक रिश्ते शुरू किए: अमेरिका ने 1979 में बीजिंग की सरकार को चीन की सरकार के तौर पर मान्यता दी और ताइवान के साथ आधिकारिक राजनयिक रिश्ते खत्म कर दिए।
- ताइवान को अलग देश की मान्यता नहीं: अमेरिका ताइवान को अलग देश के तौर पर आधिकारिक मान्यता नहीं देता। लेकिन ताइवान के साथ उसके अनौपचारिक रिश्ते बने हुए हैं।
- चीन के दावे को भी पूरी तरह नहीं मानता: चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है। अमेरिका ताइवान की संप्रभुता पर कोई फैसला नहीं देता यानी वह यह नहीं कहता कि ताइवान पर किसका अधिकार है।
- ताइवान को हथियार भी देता है: अमेरिका ताइवान को अपनी सुरक्षा के लिए हथियार देता है। यह नीति 1979 के ताइवान रिलेशन एक्ट से भी जुड़ी है।
- ताइवान की आजादी का समर्थन नहीं: अमेरिका कहता है कि वह ताइवान की औपचारिक आजादी का समर्थन नहीं करता और ताइवान-चीन का विवाद बातचीत से सुलझना चाहिए।
ट्रम्प के बयान पर इतनी नजर क्यों?
अमेरिका ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि अगर चीन ताइवान पर हमला करता है, तो क्या अमेरिकी सेना ताइवान की मदद करने जाएगी। इसलिए ट्रम्प ताइवान को लेकर क्या कहते हैं, इस पर सबकी नजर रहती है।
पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अपने कार्यकाल में कई बार कहा था कि चीन ने हमला किया तो अमेरिका ताइवान की मदद करेगा। लेकिन ट्रम्प ने इस बारे में अब तक ऐसी साफ बात नहीं कही है।
जापान के दो सरकारी सूत्रों ने रॉयटर्स को बताया कि ट्रम्प का अचानक दिया गया कोई बयान भी ताइवान को लेकर चिंता बढ़ा सकता है। चीन लगातार अमेरिका से कहता रहा है कि वह ताइवान को अलग देश बनाने की बात का समर्थन न करे।
ताइवान का मुद्दा दुनिया की अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा
ताइवान का मामला सिर्फ चीन और अमेरिका के बीच सत्ता की खींचतान तक सीमित नहीं है। इसका असर दुनिया के कारोबार पर भी पड़ सकता है।
ताइवान दुनिया की सबसे आधुनिक कंप्यूटर चिप्स का 90% से ज्यादा बनाता है। इन चिप्स का इस्तेमाल मोबाइल फोन, कार, कंप्यूटर से लेकर मिसाइल और दूसरे आधुनिक उपकरणों में होता है।
अगर यहां बड़ा सैन्य संघर्ष होता है तो चिप्स की सप्लाई रुक सकती है। इससे दुनिया के कई देशों में कार, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरे सामानों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
मलेशिया के राष्ट्रीय सुरक्षा महानिदेशक राजा नुशिरवान जैनल आबिदीन ने रॉयटर्स से कहा कि ताइवान में संघर्ष हुआ तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।
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