पश्चिम एशिया एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ा है और इस बार चिंगारी किसी सीमा विवाद या छाया संघर्ष की नहीं, बल्कि खुली सैन्य कार्रवाई की है। अमेरिका और इजराइल ने जिस समन्वित अभियान के तहत ईरान पर प्रहार किया है, उसने केवल एक देश को नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्रीय संतुलन को झकझोर दिया है। सवाल यह है कि क्या यह कदम वास्तव में परमाणु खतरे को रोकने के लिए था, या फिर पश्चिम एशिया की राजनीति को अपने अनुकूल ढालने की एक सुनियोजित चाल है?
तेहरान पर सीधे हमले, सर्वोच्च नेतृत्व को निशाना बनाने की कोशिश और शासन परिवर्तन के संकेत, यह सब किसी सीमित सैन्य कार्रवाई की परिभाषा में नहीं आता। यह शक्ति प्रदर्शन है। यह संदेश है कि जो अमेरिकी रणनीति के खिलाफ खड़ा होगा, उसे सैन्य कीमत चुकानी पड़ेगी। लेकिन इतिहास गवाह है कि बाहरी हस्तक्षेप से पैदा हुई अस्थिरता अक्सर नियंत्रण से बाहर हो जाती है। इराक और अफगानिस्तान के अनुभव अभी पुराने नहीं हुए हैं।
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ईरान का जवाब भी उतना ही आक्रामक है। क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाना और खाड़ी देशों तक मिसाइलों की पहुंच दिखाना यह बताता है कि संघर्ष सीमित नहीं रहेगा। यदि खाड़ी के देश भी अपनी जमीन पर हुए हमले के विरोध में ईरान के खिलाफ सीधे युद्ध में उतरते हैं तो यह आग कई सीमाओं को लांघ सकती है। इससे समुद्री मार्गों, तेल आपूर्ति और सामरिक जलडमरूमध्य पर खतरा बढ़ेगा जिससे संकट केवल क्षेत्रीय स्तर पर नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर फैल जायेगा।
सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है। यदि वहां अवरोध पैदा होता है तो दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की रीढ़ टूट सकती है। तेल की कीमतों में उछाल केवल बाजार का आंकड़ा नहीं होता, वह विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं को झकझोर देता है। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं, वह सीधे प्रभावित होंगे। महंगाई बढ़ेगी, राजकोषीय दबाव बढ़ेगा और आम नागरिक की जेब पर बोझ पड़ेगा।
यह भी स्पष्ट है कि इस टकराव का असर केवल सैन्य या आर्थिक नहीं है। हवाई क्षेत्र बंद हो रहे हैं, उड़ानें रद्द हो रही हैं, प्रवासी समुदायों में असुरक्षा की भावना बढ़ रही है। इसके साथ ही पश्चिम एशिया में बसे लाखों भारतीयों की सुरक्षा का प्रश्न हमारे लिए केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं, मानवीय दायित्व भी है।
सबसे खतरनाक पहलू यह है कि बड़ी शक्तियां अलग अलग खेमों में बंटती दिख रही हैं। यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है और अन्य शक्तियां भी खुलकर पक्ष लेने लगती हैं, तो यह टकराव बहुध्रुवीय युद्ध का रूप ले सकता है। विश्व युद्ध शब्द का प्रयोग भले अभी अतिशयोक्ति लगे, पर वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक गठबंधनों पर पड़ने वाला प्रभाव इसे विश्वव्यापी संकट अवश्य बना सकता है।
बहरहाल, आज जरूरत है संयम की, संवाद की और कूटनीतिक साहस की। शक्ति प्रदर्शन से अस्थायी बढ़त मिल सकती है, स्थायी शांति नहीं। यदि पश्चिम एशिया को फिर से युद्धभूमि बनाया गया, तो उसकी कीमत केवल वहां के लोग नहीं, पूरी दुनिया चुकाएगी। भारत को संतुलित, दृढ़ और दूरदर्शी कूटनीति के साथ अपनी ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। देखा जाये तो युद्ध की आंधी में विवेक ही सबसे बड़ा हथियार होता है।
-नीरज कुमार दुबे
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