Africa Ebola outbreak: अफ्रीका एक बार फिर इबोला वायरस के बड़े खतरे का सामना कर रहा है. इस बार चिंता की वजह इबोला का बुंडीबुग्यो स्ट्रेन है, जिसके लिए अभी तक कोई मंजूर वैक्सीन मौजूद नहीं है. कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) और युगांडा में तेजी से बढ़ते मामलों ने दुनिया भर की स्वास्थ्य एजेंसियों को अलर्ट कर दिया है. रिपोर्ट के अनुसार, सैकड़ों संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं और कई लोगों की मौत भी हुई है. सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह वायरस अब घनी आबादी वाले इलाकों तक पहुंच रहा है, जिससे दूसरे देशों में फैलने का खतरा भी बढ़ गया है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अफ्रीका CDC ने इस स्थिति को गंभीर स्वास्थ्य आपातकाल माना है. अभी तक इबोला के जिस जेरे स्ट्रेन के लिए वैक्सीन मौजूद है, वह बुंडीबुग्यो स्ट्रेन पर कितना असर करेगी, यह साफ नहीं है. इसी कारण दुनिया अब नई वैक्सीन तैयार करने की दौड़ में जुट गई है.
वैक्सीन बनाने की दौड़ में भारत की बड़ी भूमिका
इस मुश्किल समय में भारत की बड़ी वैक्सीन कंपनी Serum Institute of India अहम भूमिका निभाने जा रही है. पुणे स्थित यह कंपनी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और CEPI के साथ मिलकर नई वैक्सीन बनाने की तैयारी कर रही है. यह वैक्सीन ChAdOx प्लेटफॉर्म पर आधारित होगी, जिसका इस्तेमाल कोविड-19 के समय कोविशील्ड वैक्सीन में भी किया गया था. सीरम इंस्टीट्यूट का कहना है कि उसके पास पहले से ऐसी तकनीक और मशीनें मौजूद हैं, जिनकी मदद से बहुत कम समय में वैक्सीन की खुराक तैयार की जा सकती है.
कंपनी के अनुसार, अगर सब कुछ सही रहा तो 20 से 30 दिनों के अंदर शुरुआती उत्पादन शुरू किया जा सकता है. कोविड महामारी के दौरान भारत ने जिस तरह दुनिया को बड़ी मात्रा में वैक्सीन दी थी, उसी तरह अब इबोला संकट में भी भारत एक भरोसेमंद साथी बनकर सामने आ सकता है. साथ ही यह भारत की मेडिकल और बायोटेक ताकत को भी दिखाता है.
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वैज्ञानिकों के सामने समय और सुरक्षा की चुनौती
फिलहाल वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती समय की है. बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के लिए दो वैक्सीन उम्मीदवारों पर काम हो रहा है. पहला rVSV तकनीक पर आधारित है, जो पहले से मौजूद Ervebo वैक्सीन जैसी तकनीक का इस्तेमाल करता है, लेकिन इसकी समस्या यह है कि इसकी खुराक अभी उपलब्ध नहीं है और इसे तैयार करने में कई महीने लग सकते हैं. दूसरी तरफ ChAdOx प्लेटफॉर्म की खासियत इसकी तेज उत्पादन क्षमता है क्योंकि कोविड के समय इसका बड़े स्तर पर इस्तेमाल हो चुका है, इसलिए इसकी फैक्ट्री व्यवस्था पहले से तैयार है. हालांकि इसकी भी एक कमजोरी है. अभी तक इस वैक्सीन का जानवरों या इंसानों पर बुंडीबुग्यो वायरस के खिलाफ पूरा परीक्षण नहीं हुआ है. ऐसे में स्वास्थ्य एजेंसियों को यह फैसला बहुत सोच-समझकर लेना होगा कि तेज़ी को प्राथमिकता दी जाए या लंबे परीक्षण का इंतजार किया जाए. यह फैसला आने वाले समय में लाखों लोगों की सुरक्षा तय कर सकता है.
दुनिया की उम्मीद बना भारत
अफ्रीका में फैल रहा यह इबोला संकट पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है कि महामारी कभी भी वापस आ सकती है. साथ ही संघर्ष और गरीबी से जूझ रहे इलाकों में बीमारी को रोकना और भी मुश्किल हो जाता है. ऐसे समय में भारत की एंट्री उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आई है. अगर सीरम इंस्टीट्यूट और उसके सहयोगी जल्द सुरक्षित और असरदार वैक्सीन तैयार करने में सफल होते हैं, तो इससे हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है. साथ ही यह साबित होगा कि भारत केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के स्वास्थ्य संकट में मदद करने की क्षमता रखता है. आने वाले कुछ महीने बेहद अहम होंगे, क्योंकि यही तय करेंगे कि दुनिया इस नए इबोला खतरे को कितनी तेजी से रोक पाती है.
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