इसके बाद 26 मार्च 2022 को आयकर विभाग ने उन्हें धारा 148A(b) के तहत पहला नोटिस जारी किया। शिक्षक ने इस नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद 26 अप्रैल 2022 को आकलन अधिकारी (AO) ने धारा 148A(d) के तहत आदेश जारी करते हुए धारा 148 का नोटिस भेजा और ITR दाखिल करने को कहा। उन्होंने बाद में ITR तो दाखिल किया, लेकिन उसका ई-वेरिफिकेशन नहीं किया, इसलिए वह अमान्य माना गया। आगे चलकर विभाग ने कई नोटिस भेजे और अंत में धारा 147 और 144 के तहत पुनर्मूल्यांकन (Reassessment) करते हुए उनकी कुल आय ₹48.85 लाख निर्धारित कर दी। साथ ही ₹48.73 लाख को अघोषित आय मानते हुए टैक्स लगाया गया।
CIT(A) से नहीं मिली राहत
शिक्षक ने पहले CIT(A) के पास अपील की, लेकिन वहां उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद मामला ITAT बेंगलुरु पहुंचा। यहां उनके वकीलों ने सबसे अहम दलील यह दी कि आयकर विभाग ने धारा 148 का नोटिस तय समय सीमा समाप्त होने के 26 दिन बाद जारी किया था। पुराने कानून के अनुसार AY 2015-16 के लिए नोटिस जारी करने की अंतिम तारीख 31 मार्च 2022 थी। कुछ प्रक्रियात्मक छूट जोड़ने के बाद भी अधिकतम 12 अप्रैल 2022 तक ही नोटिस जारी किया जा सकता था, लेकिन विभाग ने नोटिस 26 अप्रैल 2022 को भेजा।
ITAT ने इसी आधार को स्वीकार करते हुए कहा कि जब नोटिस ही समय सीमा (Limitation Period) के बाद जारी हुआ है, तो पूरा पुनर्मूल्यांकन कानून की नजर में अमान्य हो जाता है। ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 148A की प्रक्रिया का पालन करने से समय सीमा की कानूनी बाध्यता खत्म नहीं होती, यानी अगर नोटिस तय समय के बाद भेजा गया है तो बाद की सारी कार्रवाई स्वतः निरस्त मानी जाएगी।
अपने फैसले में ITAT ने सुप्रीम कोर्ट के राजीव बंसल मामले और कर्नाटक हाईकोर्ट के मोहम्मद यासीन मामले का भी हवाला दिया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि पुराने कानून के तहत जहां नोटिस जारी करने की समय सीमा समाप्त हो चुकी हो, वहां नए प्रावधानों का सहारा लेकर विभाग दोबारा मामला नहीं खोल सकता।
यह फैसला करदाताओं के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे साफ हो गया कि आयकर विभाग को भी कानून में तय समय-सीमा का सख्ती से पालन करना होगा। अगर विभाग समय सीमा के बाद नोटिस जारी करता है, तो चाहे मामला कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसकी पूरी कार्रवाई अदालत में टिक नहीं पाएगी। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि बड़ी नकद जमा राशि या ITR न भरने पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। अगर विभाग समय रहते सही प्रक्रिया अपनाता है, तो वह जांच और टैक्स वसूली दोनों कर सकता है। लेकिन, इस मामले में केवल 26 दिन की देरी ने पूरे केस का रुख बदल दिया और रिटायर्ड शिक्षक को बड़ी कानूनी राहत मिल गई।
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