सुरभि जब कॉलेज पहुंची तो पहले ही दिन उनकी दुनिया बिल्कुल बदल गई। क्योंकि वह एक हिंदी मीडियम की छात्रा रही थीं और यहां आने वाले ज्यादातर बच्चे इंग्लिश मीडियम से थे। ऐसे में उनकी इंग्लिश काफी कमजोर थी। इंट्रोडक्शन क्लास में ही वो हीन भावना का शिकार हुईं और पूरी तरह से टूट गईं
कौन है सुरभि गौतम
सुरभि गौतम का जन्म मध्य प्रदेश के सतना के एक छोटे से गांव हुआ। वो एक संयुक्त परिवार में पली-बढ़ीं, जहां 30 से ज्यादा सदस्य थे। पिता एक वकील हैं और माता एक शिक्षिका हैं। प्राथमिक शिक्षा के लिए परिवार के अन्य बच्चों की तरह सुरभि का दाखिला भी गांव के सरकारी स्कूल में हुआ। यह हिंदी माध्यम स्कूल था। सुरभि बचपन से ही पढ़ने में काफी तेज थी, लेकिन परिवार के ज्यादातर सदस्यों के लिए यह कोई खास बात नहीं थी।
गणित में मिले 100 में से 100 अंक
लेकिन उनकी लाइफ में पहला बदलाव तब आया, जब वो कक्षा पांचवीं मे थी। बता दें कि मध्य प्रदेश के स्कूलों में पांचवीं में भी बोर्ड परीक्षा होती है। दरअसल, 5वीं कक्षा में गणित की परीक्षा में उन्हें 100 में से 100 अंक मिले। यहां उनकी टीचर्स ने उनकी खूब सराहना की और कहा कि तुम पढ़ाई मं आगे चलकर अच्छा करोगी। यहीं से उन्होंने अच्छी पढ़ाई करने का वादा कर लिया। पढ़ाई के साथ-साथ सुरभि ने पेंटिंग, स्केचिंग और ड्रॉइंग में हाथ आजमाना शुरू किया और कढ़ाई भी सीखने लगी।
बीमारी को नहीं बनने दिया मंजिल की बाधा
सुरभि की लाइफ में सबकुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन इसी बीच उनके जोड़ों में रह-रहकर दर्द उठने लगा था, पर वह उसे नजरअंदाज करती रहीं। धीरे-धीरे दर्द पूरे शरीर में फैल गया और कुछ समय बाद मैं बिस्तर पर पड़ गई। जब उन्हें जबलपुर में डॉक्टर को दिखाया गया, तो बताया गया कि सुरक्षि को रूमेटिक फीवर (Rheumatic Fever) है। डॉक्टरों ने समझाया कि इस बीमारी में संक्रमण शरीर को प्रभावित कर सकता है और बच्चों में दर्द और अन्य समस्याएं पैदा कर सकता है। गंभीर स्थिति में यह हार्ट को भी प्रभावित कर सकता है और हार्ट के वाल्व को नुकसान पहुंचा सकता है। कुछ मामलों में यह जानलेवा भी हो सकता है।
एक यूट्यूब वीडियो में सुरभि ने बताया कि डॉक्टर ने उन्हें हर 15 दिन पर पेनिसिलिन का इंजेक्शन लगाने की सलाह दी। गांव में कुशल डॉक्टर था नहीं, इसलिए हर 15वें दिन पर सुरभि को जबलपुर जाना पड़ता। पर कमजोर सेहत, अभावों के बीच भी सुरभि ने अपनी पढ़ाई से मुंह नहीं मोडा। इसके बावजूद जिंदगी धीरे-धीरे आगे बढ़ती रही।
दीये की रोशनी में की पढ़ाई
इतना ही नहीं गांव में कई समस्याएं थी, जैसे बिजली और स्वास्थ्य की। इसलिए उन्होंने मुझे मिट्टी के तेल वाले दीये की रोशनी में पढ़ाई की। साथ ही ट्यूशन की सुविधा नहीं थी और स्कूल की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी। इसके बाद उनके जीवन की दूसरी बड़ी घटना तब घटी जब कक्षा 10वीं का परिणाम आया।
10वीं में शानदार प्रदर्शन
सुरभि ने इस परीक्षा में गणित के साथ-साथ विज्ञान में भी 100 में से 100 अंक हासिल किए। इतने अच्छे अंक आए कि उनका नाम राज्य की मेरिट लिस्ट में आ गया। इस तरह वो गांव की एक सेलिब्रिटी बन गई थी। वो बताती हैं कि इस उपलब्धि के बाद एक अखबार के पत्रकार ने उनका इंटरव्यू किया और उनके पूछा कि वो क्या बनना चाहती हैं? सुरभि ने तब पहली बार कहा कि वो कलेक्टर बनना चाहती हैं।
कलेक्टर बनने का सपना
फिर, अगले दिन जब खबर अखबार में छपी, तो उसमें लिखा गया कि सुरभि कलेक्टर बनना चाहती हैं, जबकि सुरभि के मन में उस समय तक ऐसा कोई ख्याल नहीं था। हालांकि इन खबरों के कारण उनका झुकाव यूपीएससी की तरफ हो गया।
इंजीनियरिंग में दाखिला
इसके बाद उन्होंने कक्षा 12वीं में भी अच्छा प्रदर्शन किया। PCM में ज्यादा अंक हासिल करने की वजह से उन्हें ए.पी.जे. अब्दुल कलाम स्कॉलरशिप मिली। इसके बाद वो अपने गांव से निकलकर बड़े शहर भोपाल आई और इसी कॉलेज में बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग में दाखिला लिया।
अंग्रेजी थी कमजोर, पर नहीं मानी हार
सुरभि जब कॉलेज पहुंची तो पहले ही दिन उनकी दुनिया बिल्कुल बदल गई। क्योंकि वह एक हिंदी मीडियम की छात्रा रही थीं और यहां आने वाले ज्यादातर बच्चे इंग्लिश मीडियम से थे। ऐसे में उनकी इंग्लिश काफी कमजोर थी। इंट्रोडक्शन क्लास में ही वो हीन भावना का शिकार हुईं और पूरी तरह से टूट गईं। क्योंकि उन्हें इंग्लिश नहीं बोलना आता था। वो अपने कमरे में गईं और खूब रोईं। यहां तक वो बैग पैक करके वापस गांव जाने का भी मन बना लिया था, लेकिन तब उनकी मां ने उन्हें अच्छे समझाया। इसके बाद उन्होंने अपनी इंग्लिश पर काम करना शुरू किया।
फिर क्या था, सुरभि ने एक बार फिर कारनामा किया। सुरभि ने अपने ग्रेजुएशन के फर्स्ट सेमेस्टर में टॉप किया और इसके लिए उन्हें कॉलेज चांसलर अवार्ड भी दिया गया। यहां पूरी पढ़ाई के दौरान उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया।
कई सरकारी नौकरियों की परीक्षा में पास
कॉलेज में प्लेसमेंट के दौरान सुरभि को टीसीएस कंपनी में जॉब मिल गई, लेकिन उन्होंने ज्वाइन नहीं किया। इसके बाद उन्होंने लगातार BARC, ISRO, GTE, SAIL, MPPSC, SSC, FCI और दिल्ली पुलिस जैसे कई प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लिया और सभी को क्रैक कर लिया। वहीं साल 2013 में सुरभि ने आईईएस की परीक्षा भी पास कर ली। इसमें उनकी ऑल इंडिया फर्स्ट रैंक आई। वो कहती हैं कि न मैं IIT की थी, न किसी NIT से। मैं UIT से पढ़ी थी और मैंने पूरे देश में टॉप किया था। लेकिन सुरभि ने अपना लक्ष्य आईएएस बनना तय कर रखा था।
यूपीएससी में आई 50वीं रैंक
इसलिए, उन्होंने अपनी तैयारी जारी रखी और साल 2016 में यूपीएससी परीक्षा में सुरभि ने अपने पहले प्रयास में 50वीं रैंक हासिल कर ली। इस परीक्षा की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों को जागरूक करते हुए सुरभि कहती हैं कि कोई भाषा दीवार नहीं होती, ठान लीजिए तो वह आपके अधिकार में होगी। वो कहती हैं कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं है और सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं है।
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