हरिद्वार में गंगा दशहरा पर सुबह 3 बजे से भारी भीड़ दिखी। हरकी पैड़ी पर सुबह 5 बजे से 8 बजे तक पैर रखने की भी जगह नहीं मिली। मान्यता है कि इस दिन गंगा में डुबकी लगाने से व्यक्ति के 10 प्रकार के पाप (4 शारीरिक, 3 मानसिक और 3 वाचिक) नष्ट हो जाते हैं। हरिद्वार के ज्योतिषाचार्य पंडित मनोज त्रिपाठी ने बताया कि पौराणिक मान्यता है कि आज के दिन गंगा स्नान मौन रहकर करना चाहिए। इससे शारीरिक, मानसिक और वाणी से जुड़े दोषों का शमन होता है। पौराणिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार, गंगा दशहरा के दिन ही मां गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण (आगमन) हुआ था। हरकी पैड़ी की तस्वीरें… गंगा दशहरा के दिन की मान्यताएं… 1. पृथ्वी पर मां गंगा का आगमन- राजा सगर के साठ हजार पुत्रों के उद्धार के लिए उनके वंशज राजा भागीरथ ने हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने मां गंगा को पृथ्वी पर जाने का आदेश दिया। वह पावन दिन ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी थी, जिसे आज हम गंगा दशहरा के रूप में मनाते हैं। 2. भगवान शिव ने जटाओं में धारण किया- जब गंगा स्वर्ग से चलीं, तो उनका वेग इतना प्रचंड था कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर पाती और रसातल में चली जाती। तब भगवान शिव ने गंगा के अहंकार को शांत करने और पृथ्वी की रक्षा के लिए उन्हें अपनी जटाओं में धारण कर लिया। कई दिनों तक जटाओं में भ्रमण करने के बाद, शिव जी ने एक जटा खोली और गंगा शांत धारा के रूप में पृथ्वी पर प्रवाहित हुईं। 3. पूर्वजों (60 हजार पुत्रों) को मिला मोक्ष- पृथ्वी पर आने के बाद मां गंगा भागीरथ के पीछे-पीछे वहां पहुंचीं जहां राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की राख पड़ी थी। जैसे ही गंगा के पवित्र जल ने उन अस्थियों का स्पर्श किया, उन सभी को मोक्ष प्राप्त हो गया और वे स्वर्ग सिधार गए। 4. हरिद्वार के ‘ब्रह्मकुंड’ में प्रवेश- माना जाता है कि इसी दिन मां गंगा पहाड़ों से निकलकर पहली बार मैदानी इलाके यानी हरिद्वार (ब्रह्मकुंड) में पहुंची थीं। इसीलिए हरिद्वार में इस दिन का महत्व सबसे अधिक माना जाता है। 5. 10 पापों का नाश- धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान करने से मनुष्य के 10 प्रकार के पाप नष्ट हो गए थे। इनमें 3 कायिक (शरीर द्वारा किए गए), 4 वाचिक (वाणी द्वारा किए गए) और 3 मानसिक (मन द्वारा किए गए) शामिल है। हरिद्वार ही क्यों है मुख्य केंद्र? गंगा दशहरा के दिन हरिद्वार में सबसे अधिक भीड़ होने के पीछे ठोस धार्मिक कारण हैं। हरिद्वार वह पवित्र भूमि है जहां मां गंगा पर्वतों की गोद छोड़कर पहली बार मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती हैं। माना जाता है कि स्वर्ग से निकलने के बाद हरिद्वार ही वह स्थान है जहां गंगा का स्वरूप जन-जन के जीवन से जुड़ा। आज भी देश के कोने-कोने से लोग अपने पूर्वजों की शांति और मोक्ष के लिए यहां अस्थि विसर्जन करने पहुंचते हैं। इस दिन स्नान के साथ-साथ सामर्थ्य अनुसार दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। विशेषकर गर्मी के मौसम को देखते हुए इन वस्तुओं के दान की परंपरा है जल, छाता, पंखा, फल, अन्न और वस्त्र।
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