देश की महान धाविका, माननीय राज्यसभा सांसद और पद्मश्री से सम्मानित पीटी उषा आज 27 जून को अपना 62वां जन्मदिन मना रही हैं। पीटी उषा ओलंपिक के फाइनल में पहुंचने वाली पहली महिला एथलीट हैं। उन्होंने 50-60 के दशक में कई उपलब्धियां हासिल की हैं। जिससे तिरंगे की शान बढ़ी है। तो आइए जानते हैं उनके जन्मदिन के मौके पर पीटी उषा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में…
जन्म और परिवार
केरल के कोझीकोड जिले में स्थित पयोली गांव में 27 जून 1964 को पीटी उषा का जन्म हुआ था। उनका जीवन गरीबी में बीता और वह जब स्कूल में थीं, तो उन्होंने दौड़ना शुरू किया। चौथी कक्षा में पीटी उषा के शारीरिक शिक्षा के टीचर ने जिले के चैंपियन मुकाबले में हिस्सा लेने के लिए कहा। इस प्रतियोगिता में उन्होंने जिला चैंपियन को हरा दिया, जोकि उनके ही स्कूल में पढ़ती थीं।
अपने स्कूल के लिए पीटी उषा जिला स्तर के मुकाबले में शामिल होने लगीं। खेलों में पीटी उषा के प्रदर्शन को देखते हुए केरल सरकार ने उनको स्कॉलरशिप से सम्मानित किया। इसके बाद पीटी उषा ने पढ़ाई और ट्रेनिंग के लिए कन्नूर के एक विशेष खेल स्कूल में एडमिशन लिया।
खेल करियर
पीटी उषा की जिंदगी में मोड़ तब आया, जब साल 1976 में नेशनल स्कूल गेम्स के दौरान पीटी उषा के कोच ओ एक नाम्बियार ने उनको देखा। जिसके बाद उनको अंतरराष्ट्रीय खेल में शामिल होने का मौका मिला। साल 1980 में पीटी उषा के अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरूआत की थी। उन्होंने कराची में पाकिस्तान ओपन नेशनल मीट में चार स्वर्ण पदक जीते।
फिर पीटी उषा तीन ओलंपिक साल 1980 में मॉस्को, साल 1984 में लॉस एंजिल्स और साल 1988 में सियोल में शामिल हुईं। लेकिन वह पदक पाने से चूक गईं। लॉस एंजिल्स ओलंपिक के फाइनल तक वह पहुंची, जोकि देश के लिए बड़ी उपलब्धि थी। पीटी उषा से पहले कोई भारतीय एथलीट ओलंपिक फाइनल में नहीं पहुंची थी। उन्होंने एशियाई खेलों में बेहतर प्रदर्शन किया। फिर साल 1991 में पीटी उषा ने शादी की और कुछ समय के ब्रेक के बाद साल 1998 में उन्होंने एथलेटिक्स में फिर वापसी की।
पीटी उषा के पदक
महज 20 साल की उम्र में पीटी उषा को पद्म श्री और अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उनको विश्व ट्रॉफी से भी सम्मानित किया गया। भारतीय ओलंपिक संघ ने भी उनको ‘स्पोर्ट्स वुमन ऑफ द मिलेनियम’ और ‘स्पोर्ट्स पर्सन ऑफ द सेंचुरी’ के लिए नामित किया था। वहीं भारत की इस सर्वश्रेष्ठ एथलीट ने साल 2000 में संन्यास ले लिया था।
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