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हानो पेवकुर 2022 से एस्टोनिया के रक्षा मंत्री थे। उन्होंने समझौते की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया।
एस्टोनिया के रक्षा मंत्री हानो पेवकुर ने इस्तीफा दे दिया है। उनके इस्तीफे की वजह यूक्रेन के लिए की गई करीब 768 करोड़ रुपए की एक डील है।
सौदे के तहत भारतीय कंपनी से जुड़ी इटली की एक फर्म को गोला-बारूद सप्लाई का कॉन्ट्रैक्ट दिया गया था। आरोप है कि कंपनी के पास तोप के गोले बनाने या बेचने का अनुभव नहीं था। इसके बावजूद उसे बड़ा कॉन्ट्रैक्ट दिया गया और भारी रकम एडवांस में दी गई।
कंपनी के साथ किए गए थे 4 समझौते
2024 में एस्टोनिया के सेंटर फॉर डिफेंस इन्वेस्टमेंट ने तोप के गोलों की खरीद के लिए डेटासेल एसआरएल के साथ चार समझौते किए। यह कंपनी इटली में रजिस्टर्ड है।

नवंबर 2024 तक यूक्रेन पहुंचने थे गोले
गोला-बारूद का पहला बैच नवंबर 2024 में यूक्रेन पहुंचना था, लेकिन डेटासेल ने देरी की। बाद में जो सामान पहुंचा, उसे लेकर भी सवाल उठाए गए।
अधिकारियों के मुताबिक, कुछ खेप अधूरी थी और उसमें गोले चलाने के लिए जरूरी हिस्से मौजूद नहीं थे। इनमें फ्यूज, प्रोपेलेंट चार्ज और प्राइमर जैसे हिस्से शामिल हैं। इसलिए एस्टोनिया ने कुछ सामान को स्वीकार नहीं किया।
कंपनी ने आरोपों को खारिज किया
डेटासेल ने एस्टोनिया के आरोपों को खारिज कर दिया है। कंपनी का कहना है कि उसने बड़ी मात्रा में सामान तैयार किया और उसकी सप्लाई के लिए बिल भी दिए।
कंपनी ने यह भी कहा कि डिलीवरी में देरी के पीछे अलग-अलग देशों से मंजूरी और जरूरी दस्तावेज मिलने में हुई देरी जैसी वजहें थीं।
एस्टोनिया के 768 करोड़ रुपए अटके
एस्टोनिया ने इस सौदे में करीब 768 करोड़ रुपए दिए थे। अब वह इस रकम को वापस पाने की कोशिश कर रहा है। अगर पैसा वापस नहीं मिला तो एस्टोनिया पर इस रकम का वित्तीय बोझ पड़ सकता है। यूरोपीय आयोग भी एस्टोनिया के साथ इस मामले पर बातचीत कर रहा है।
EU के फंड से आया था पैसा
इस सौदे में इस्तेमाल हुआ पैसा यूरोपीय संघ की यूरोपियन पीस फैसिलिटी (EPF) से आया था। यह फंड यूक्रेन को सैन्य सहायता देने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
अब सवाल यह है कि अगर एस्टोनिया कंपनी से पैसा वापस नहीं ले पाया तो इस फंड का क्या होगा। यूरोपीय आयोग इस मामले में एस्टोनियाई अधिकारियों के संपर्क में है।

जांच में खरीद प्रक्रिया पर भी सवाल
एस्टोनिया के राष्ट्रीय लेखा कार्यालय ने इस सौदे को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। जांच का एक बड़ा मुद्दा यह है कि इतने बड़े रक्षा सौदे में ऐसी कंपनी को कैसे चुना गया, जिसके पास तोप के गोले की सप्लाई का पहले का अनुभव नहीं था।
यानी विवाद सिर्फ इस बात पर नहीं है कि गोले समय पर पहुंचे या नहीं। सवाल यह भी है कि कंपनी का चयन कैसे हुआ और इतनी बड़ी रकम एडवांस में क्यों दी गई।
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