सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सरकारें अब सीधे जनता की जिंदगी में दखल दे रही हैं। पाकिस्तान में स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए गए, चार दिन का कार्य सप्ताह लागू किया गया और सरकारी कर्मचारियों के लिए आधा काम घर से करने का आदेश जारी हुआ। गैर जरूरी सरकारी वाहनों को सड़कों से हटाया गया और ईंधन आवंटन में पचास प्रतिशत कटौती कर दी गई। यह कदम साफ दिखाता है कि संकट कितना गहरा है।
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श्रीलंका ने तो एक कदम आगे बढ़ते हुए सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया। स्कूल, विश्वविद्यालय और गैर जरूरी दफ्तर बंद कर दिए गए। क्यूआर आधारित ईंधन पास फिर से लागू कर दिया गया, जिसमें निजी वाहनों के लिए साप्ताहिक सीमा तय कर दी गई। यह व्यवस्था बताती है कि सरकारें अब संसाधनों को नियंत्रित करने के लिए तकनीक का सहारा ले रही हैं।
बांग्लादेश में विश्वविद्यालय और कोचिंग संस्थान बंद कर दिए गए और ऑनलाइन शिक्षा लागू की गई। पांच घंटे की बिजली कटौती ने आम जीवन को झकझोर दिया है। उर्वरक संयंत्र तक बंद करने पड़े, जिससे कृषि और खाद्य सुरक्षा पर सीधा खतरा मंडरा रहा है। भूटान में जमाखोरी रोकने के लिए जरी कैन में ईंधन बिक्री पर रोक लगा दी गई और आपात सेवाओं को प्राथमिकता दी जा रही है।
फिलीपींस और वियतनाम में भी हालात काबू से बाहर जाते दिख रहे हैं। सरकारी कर्मचारियों के लिए चार दिन का कार्य सप्ताह और निजी क्षेत्र को घर से काम करने की सलाह दी गई है। गैर जरूरी यात्राओं पर रोक लगाकर सरकारें साफ संकेत दे रही हैं कि अब हर बूंद की कीमत है।
अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया में संकट और भयावह है। म्यांमार ने निजी वाहनों के लिए विषम सम प्रणाली लागू कर दी। कंबोडिया में हजारों पेट्रोल पंप बंद हो गए। लाओस में सरकारी कर्मचारियों के लिए घर से काम और रोटेटिंग शिफ्ट लागू की गईं ताकि आवागमन कम हो। दक्षिण अफ्रीका में नियंत्रित आवंटन लागू हो चुका है, जबकि मिस्र में बाजार, रेस्तरां और सरकारी दफ्तरों के समय सीमित कर दिए गए और रोशनी वाले विज्ञापन बंद कर दिए गए।
वहीं केन्या ने ईंधन राशनिंग और निर्यात पर प्रभावी रोक लगा दी है। न्यूजीलैंड में हवाई सेवाएं प्रभावित हुईं और हजारों उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। स्लोवाकिया और स्लोवेनिया जैसे यूरोपीय देशों में भी डीजल खरीद पर सीमा तय कर दी गई है। इस तरह यह संकट अब किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले चुका है।
देखा जाये तो यह तेल संकट केवल कीमतों का खेल नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का नया अध्याय है। ऊर्जा आपूर्ति पर नियंत्रण रखने वाले देश अब निर्णायक बढ़त हासिल कर रहे हैं। जो देश आत्मनिर्भर नहीं हैं, वे नीतिगत गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं। वर्क फ्रॉम होम, राशनिंग और आवागमन पर नियंत्रण जैसे कदम बताते हैं कि सरकारें अब युद्धकालीन नीतियों को शांतिकाल में लागू कर रही हैं।
इसके अलावा, यह संकट आने वाले समय में कई बड़े बदलावों का संकेत दे रहा है। एक तो, ऊर्जा सुरक्षा अब राष्ट्रीय सुरक्षा का केंद्र बनेगी। इसके अलावा, डिजिटल निगरानी और संसाधन नियंत्रण बढ़ेगा, जिससे नागरिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। साथ ही, आपूर्ति श्रृंखला टूटने से खाद्य संकट और महंगाई चरम पर पहुंच सकती है। सबसे अहम बात यह है कि यह संकट देशों को मजबूर कर रहा है कि वह वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ें। लेकिन जब तक यह बदलाव पूरी तरह नहीं होता, तब तक जनता को कड़े प्रतिबंध और कठिन फैसलों का सामना करना ही होगा।
बहरहाल, तेल संकट ने दुनिया को आईना दिखा दिया है। यह साफ है कि आने वाले समय में ऊर्जा ही असली शक्ति होगी। सरकारें जितनी जल्दी इस सच्चाई को समझेंगी, उतना ही बेहतर होगा। लेकिन फिलहाल, हालात यह कहते हैं कि दुनिया एक लंबे संघर्ष की ओर बढ़ रही है, जहां हर देश अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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