लंदन के कू ब्रिज पर विंटेज इतालवी कॉफी कार्ट के बाहर लंबी कतार है। दौड़ लगाने वाले, पर्यटक और डॉग वॉकर, सभी हाथ में कॉफी लिए दिन शुरू करना चाहते हैं। लेकिन कार्ट चलाने वाले एंथनी डकवर्थ की नजर ग्राहकों से ज्यादा कीमतों पर टिकी है। उनके यहां आइस्ड लाते 4.5 पाउंड (580 रुपए) में मिलती है। उनकी चिंता है कि कीमत 5 पाउंड (644 रुपए) न पहुंच जाए। यह चिंता पूरे वैश्विक अर्थव्यवस्था की है। आज एक कप कॉफी में जलवायु संकट, ट्रेड वॉर और बदलती उपभोक्ता संस्कृति सब दिखाई देने लगे हैं। दुनिया की कॉफी मुख्य रूप से दो बीन्स पर टिकी है- अरेबिका और रोबस्टा। अरेबिका ब्राजील, इथियोपिया और केन्या की ठंडी पहाड़ियों में उगती है, जबकि कैफीन से भरपूर रोबस्टा पर वियतनाम का दबदबा है। लेकिन पिछले दो वर्षों में मौसम ने दोनों फसलों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। नतीजतन अरेबिका बीन्स की कीमत औसत 1.2 डॉलर प्रति पाउंड से 4 डॉलर (384 रुपए) से ऊपर निकल गई। कॉफी उद्योग के दिग्गज गुइसेप्पे लावाज्जा मानते हैं कि राहत जल्द मिलने वाली नहीं है। इस बीच, अमेरिकी टैरिफ ने संकट और गहरा दिया। ट्रम्प प्रशासन ने वियतनाम पर 46%, इंडोनेशिया पर 32% और ब्राजील पर 50% तक टैरिफ लगा दिया। अमेरिका में पिसी कॉफी की कीमत 17% और इंस्टेंट कॉफी 25% तक महंगी हो गई। आखिरकार बढ़ती नाराजगी के बाद कॉफी को टैरिफ से राहत देनी पड़ी। लेकिन मुसीबत यहीं खत्म नहीं हुई। लाल सागर में हूती हमलों के कारण वियतनाम से यूरोप जाने वाले जहाज अब अफ्रीका का लंबा चक्कर लगा रहे हैं। यात्रा 4,000 मील बढ़ गई। ऊपर से यूरोप के नए नियमों के तहत कॉफी किसानों को यह साबित करना होगा कि काफी जंगल काटकर नहीं उगाई गई। कीमत बढ़ने पर भी खरीदारी, इसीलिए दाम नीचे नहीं आते दिलचस्प है महंगी होने के बावजूद कॉफी की मांग कम नहीं हुई। तस्वीर साफ है- सप्लाई चेन संकट में है, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीति कीमतें बढ़ा रहे हैं, लेकिन दुनिया का कॉफी प्रेम अडिग है। अब कॉफी सिर्फ ड्रिंक नहीं, बल्कि ‘एक्सपीरियंस’ बन चुकी है। चीनी कंपनी कॉफी डेटा और टेक्नोलॉजी के दम पर स्टारबक्स को चुनौती दे रही है, जबकि ब्रिटेन की ग्रेग्स ऑटोमेशन के जरिए सस्ती कॉफी बेचकर सबसे बड़ा कॉफी विक्रेता बन चुकी है।
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