लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या बलूचिस्तान वास्तव में पाकिस्तान से अलग होकर एक स्वतंत्र देश बन सकता है? अंतरराष्ट्रीय कानून की कसौटी पर फिलहाल इसका रास्ता बेहद कठिन है। किसी क्षेत्र द्वारा स्वतंत्रता की घोषणा कर देना अपने आप उसे नया राष्ट्र नहीं बना देता। व्यापक रूप से स्वीकार किए गए मोंटेवीडियो कन्वेंशन के मानकों के अनुसार स्थायी आबादी, निश्चित भू-भाग, प्रभावी सरकार और दूसरे देशों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता जैसे तत्व राज्य की बुनियादी पहचान के लिए जरूरी माने जाते हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मान्यता किसी नए देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है।
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यहीं बलूचिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है। अभी तक किसी देश ने औपचारिक रूप से ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी है। पाकिस्तान भी बलूचिस्तान पर प्रशासनिक, सैन्य और न्यायिक नियंत्रण बनाए हुए है। अलगाववादी संगठन भले ही प्रांत के कुछ हिस्सों में सक्रिय हों, लेकिन इस्लामाबाद का सरकारी तंत्र अब भी व्यापक रूप से काम कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय व्यवहार में किसी क्षेत्र पर प्रभावी नियंत्रण राज्य की संप्रभुता का महत्वपूर्ण संकेतक है। इसलिए जब तक पाकिस्तान का नियंत्रण निर्णायक रूप से समाप्त नहीं होता, स्वतंत्र बलूचिस्तान का दावा व्यावहारिक स्तर पर बेहद मुश्किल बना रहेगा।
वैसे बलूचिस्तान के अलगाववादी आंदोलन को समझने के लिए पाकिस्तान की दशकों पुरानी नीतियों और वहां के लोगों में पैदा हुए असंतोष को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बलूच संगठनों और मानवाधिकार समूहों का आरोप है कि प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध इस प्रांत को राजनीतिक प्रतिनिधित्व, विकास और नागरिक अधिकारों के मामले में लंबे समय से उपेक्षित रखा गया है, जबकि सुरक्षा के नाम पर सैन्य और अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी बढ़ती गई। जबरन गुमशुदगियां इस संकट का सबसे भयावह चेहरा बनकर सामने आई हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने छात्रों, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और मानवाधिकार रक्षकों के जबरन गायब किए जाने की घटनाओं को दर्ज किया है, जबकि ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाकिस्तान के सुरक्षा बलों पर गुमशुदगी, गुप्त हिरासत, यातना और न्यायेतर हत्याओं से जुड़े गंभीर आरोपों का दस्तावेजीकरण किया है। हाल के वर्षों में भी बलूच राजनीतिक आंदोलनों और प्रदर्शनों पर कार्रवाई तथा गुमशुदगी के आरोप जारी रहे हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार 2024 में बलूच नेशनल गैदरिंग के दौरान सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया गया और प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगे। यही कथित दमन बलूच समाज के उस वर्ग को मजबूत करता है जो मानता है कि इस्लामाबाद उसे पाकिस्तान के बराबर का नागरिक नहीं, बल्कि एक ऐसे भूभाग के रूप में देखता है जिसे सुरक्षा और संसाधनों के नजरिये से नियंत्रित किया जाना है।
फिर भी बलूचिस्तान में हालात जिस दिशा में बढ़ रहे हैं, वह पाकिस्तान के लिए गंभीर चिंता का संकेत हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार कालात और खुजदार में सुरक्षा कारणों से कारोबार और नागरिक आवाजाही पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। कालात में दुकानदारों को शाम छह बजे तक दुकानें बंद करने और लोगों को रात में घरों में रहने के निर्देश दिए गए। बाद में कालात में 9 अगस्त से 15 अगस्त तक रात आठ बजे से सुबह नौ बजे तक कर्फ्यू लागू किए जाने की आधिकारिक अधिसूचना की भी रिपोर्ट सामने आई। खुजदार में बाजारों, दुकानों, होटलों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को रात आठ बजे से सुबह दस बजे तक बंद रखने का आदेश दिया गया।
इन पाबंदियों के बीच मानवाधिकार संबंधी आरोपों ने संकट को और गंभीर बना दिया है। बलूच अधिकार संगठनों के हवाले से 19 वर्षीय मजदूर सईद अहमद के कथित जबरन गायब किए जाने की खबर सामने आई है। वहीं बलूचिस्तान के खुजदार में इनायतुल्लाह जट्टक की हत्या को लेकर भी बलूच कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान समर्थित ‘डेथ स्क्वॉड’ पर आरोप लगाए हैं। उनकी बेटी अस्मा जट्टक ने हत्या से पहले अपने पिता और परिवार की सुरक्षा को लेकर सार्वजनिक रूप से आशंका जताई थी।
इसके अलावा कराची और बलूचिस्तान में कथित जबरन गुमशुदगी के कई मामलों ने चिंता बढ़ाई है। रिपोर्टों में 28 वर्षीय मजदूर साबिर, अब्दुल अजीज और दुकानदार आमिर के हिरासत में लिए जाने के बाद उनके ठिकाने की जानकारी परिवारों को न मिलने का दावा किया गया है। क्वेटा में दो 14 वर्षीय छात्रों को भी कथित तौर पर हिरासत में लिए जाने और उनके बाद से लापता होने की बात सामने आई है। बुलेदा निवासी मंसूर अनवर के परिवार ने भी उनके दोबारा कथित रूप से गायब किए जाने का आरोप लगाया है।
देखा जाये तो कानूनी रूप से बलूचिस्तान का मामला इसलिए भी जटिल है क्योंकि एक तरफ संयुक्त राष्ट्र चार्टर आत्मनिर्णय के सिद्धांत को मान्यता देता है, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था मौजूदा संप्रभु देशों की क्षेत्रीय अखंडता की भी रक्षा करती है। इतिहास बताता है कि अलगाव को अंतरराष्ट्रीय समर्थन आमतौर पर असाधारण परिस्थितियों में ही मिलता है। कोसोवो का उदाहरण अलग है, जहां बड़ी संख्या में देशों ने स्वतंत्रता को मान्यता दी, जबकि उत्तरी साइप्रस, सोमालिलैंड और ट्रांसनिस्ट्रिया जैसे क्षेत्र लंबे समय से अलग प्रशासन चलाने के बावजूद व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल नहीं कर पाए हैं।
भारत के लिए यह घटनाक्रम खास महत्व रखता है। नई दिल्ली ने अब तक बलूचिस्तान को पाकिस्तान का हिस्सा माना है और उसे स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं दी है। हालांकि भारत ने बलूचिस्तान में मानवाधिकार और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चिंता जरूर जताई है।
देखा जाये तो फिलहाल बलूचिस्तान की स्वतंत्रता तत्काल वास्तविकता से ज्यादा पाकिस्तान के लिए बढ़ते दबाव का संकेत है। पाकिस्तान एक साथ बलूचिस्तान के विद्रोह, खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवादी हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। 11 अगस्त को ‘स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश इस संघर्ष को प्रतीकात्मक और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर नया आयाम दे सकती है। लेकिन जब तक अलगाववादी ताकतें प्रभावी क्षेत्रीय नियंत्रण, स्थायी प्रशासन और व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल नहीं करतीं, तब तक स्वतंत्र बलूचिस्तान की घोषणा पाकिस्तान की मौजूदा कानूनी स्थिति को अपने आप नहीं बदल पाएगी।
फिर भी पाकिस्तान के लिए खतरा कम नहीं है। अगर बलूचिस्तान में राजनीतिक असंतोष, सशस्त्र विद्रोह और मानवाधिकार संकट एक-दूसरे से जुड़ते गए और उन्हें अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलने लगा, तो इस्लामाबाद के सामने केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि राज्य की क्षेत्रीय अखंडता का सवाल खड़ा हो सकता है। यही वह बिंदु है जहां बलूचिस्तान भारत के लिए भी रणनीतिक महत्व हासिल करता है क्योंकि पाकिस्तान के पश्चिमी मोर्चे पर बढ़ती अस्थिरता क्षेत्रीय रणनीति पर सीधा असर डाल सकती है।
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