हम आपको बता दें कि केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में भारत सरकार, असम सरकार और नगालैंड सरकार के बीच असम-नगालैंड सीमावर्ती क्षेत्रों में खनिज तेल संचालन के संबंध में एक त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। इस मौके पर केन्द्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी, असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा और नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो सहित केंद्र, असम एवं नगालैंड सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। अमित शाह ने इसे ऐतिहासिक क्षण बताते हुए साफ कहा कि इस समझौते ने विकसित पूर्वोत्तर के रास्ते में खड़ी अंतिम बड़ी बाधा हटा दी है।
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हम आपको बता दें कि असम और नगालैंड की सीमा से लगे विवादित क्षेत्र में तीन दशक से अधिक समय से तेल और खनिज अन्वेषण ठप पड़ा था। अधिकार क्षेत्र को लेकर दोनों राज्यों के बीच तनाव बना रहता था, जिसके कारण हजारों करोड़ रुपये की संपदा जमीन के नीचे दबी रह गई। अब इस समझौते के तहत एक हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में तेल, गैस और खनिज संसाधनों की खोज और उत्पादन का रास्ता खुल गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों राज्यों ने संसाधनों के बंटवारे पर 50-50 की सहमति बनाई है। यही वह राजनीतिक परिपक्वता है जिसने इस समझौते को टकराव से निकालकर साझेदारी के मॉडल में बदल दिया।
अमित शाह ने दावा किया कि इस एक समझौते से प्रतिदिन एक हजार से पंद्रह सौ बैरल तेल उत्पादन क्षमता को दस गुना तक बढ़ाया जा सकता है। केवल एक तेल क्षेत्र से पंद्रह हजार करोड़ रुपये से अधिक की संभावित प्राप्ति का अनुमान जताया गया है। यह बयान केवल आर्थिक संभावना का संकेत नहीं, बल्कि उस रणनीतिक दिशा का संकेत है जिसमें भारत तेजी से आगे बढ़ना चाहता है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, पश्चिम एशिया में अस्थिरता और ऊर्जा आपूर्ति संकटों के दौर में भारत लंबे समय से आयातित तेल पर निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे समय में पूर्वोत्तर के विशाल तेल और गैस भंडार भारत के लिए नई ऊर्जा रीढ़ साबित हो सकते हैं।
दरअसल यह समझौता केवल तेल निकालने का मसला नहीं है। यह पूर्वोत्तर को संघर्ष की पहचान से निकालकर सामरिक और आर्थिक शक्ति केंद्र में बदलने की कवायद है। अमित शाह ने कहा कि यदि नगालैंड में फैले तेल और गैस भंडार का पूरा दोहन हुआ तो भारत विदेशी देशों पर अपनी ऊर्जा निर्भरता काफी हद तक कम कर सकेगा। इसका सीधा मतलब है कि भारत अपने ऊर्जा हितों को लेकर अधिक स्वतंत्र रणनीति अपना सकेगा। देखा जाये तो ऊर्जा आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक मुद्दा नहीं होती, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मूल तत्व बन चुकी है।
साथ ही इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा बड़ा पहलू सुरक्षा और शांति से जुड़ा है। अमित शाह ने पूर्वोत्तर में हिंसा की घटनाओं में लगभग अस्सी प्रतिशत गिरावट का दावा करते हुए कहा कि वर्ष 2019 के बाद 12 शांति समझौते हुए हैं। यही कारण है कि अब सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को भी पूर्वोत्तर के अधिकांश हिस्सों से हटाने की तैयारी चल रही है। अमित शाह ने विश्वास जताया कि अगले वर्ष एक या दो राज्यों को छोड़कर पूरे पूर्वोत्तर से यह कानून हटाया जा सकता है। यह बयान बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि दशकों तक पूर्वोत्तर की पहचान उग्रवाद, सैन्य उपस्थिति और अस्थिरता से जुड़ी रही है। अब केंद्र सरकार यह संदेश देना चाहती है कि क्षेत्र संघर्ष से विकास की ओर बढ़ चुका है।
रणनीतिक दृष्टि से देखें तो यह समझौता चीन और दक्षिण पूर्व एशिया से जुड़ी भारत की व्यापक नीति से भी मेल खाता है। पूर्वोत्तर भारत लंबे समय तक केवल भौगोलिक सीमा माना जाता रहा, लेकिन अब उसे आर्थिक गलियारे, ऊर्जा केंद्र और संपर्क सेतु के रूप में विकसित किया जा रहा है। सड़क, रेल, निवेश, पर्यटन और ऊर्जा परियोजनाओं के जरिए केंद्र सरकार इस क्षेत्र को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रही है। तेल और गैस परियोजनाओं के सक्रिय होने से निजी निवेश बढ़ेगा, रोजगार पैदा होंगे और क्षेत्रीय असंतोष कम होगा। यही वह बिंदु है जहां विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने भी कहा कि यह समझौता देश की दीर्घकालिक ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगा। वहीं नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो की सहमति इस बात का संकेत है कि अब पूर्वोत्तर की राजनीति टकराव से अधिक आर्थिक साझेदारी की दिशा में बढ़ रही है। यही कारण है कि अमित शाह ने इसे जीत हार का नहीं, बल्कि सबकी जीत का समझौता बताया।
बहरहाल, अब स्पष्ट है कि यह त्रिपक्षीय समझौता केवल सीमाई विवाद सुलझाने का प्रयास नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर के भविष्य को नए सिरे से परिभाषित करने की शुरुआत है। यदि सरकार अपने दावों के अनुरूप तेल उत्पादन, निवेश और शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सफल रहती है, तो आने वाले वर्षों में पूर्वोत्तर भारत की ऊर्जा शक्ति, सामरिक मजबूती और आर्थिक विस्तार का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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