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आज (मंगलवार, 14 जुलाई) आषाढ़ मास की अमावस्या यानी हलहारिणी अमावस्या है। यह पर्व किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इस दिन खेती में उपयोग होने वाले हल, बैल और अन्य कृषि उपकरणों की पूजा करने की परंपरा है। किसान अच्छी फसल, भूमि की उर्वरता और खेती में सफलता की कामना से इन यंत्रों का पूजन करते हैं।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, आषाढ़ी अमावस्या पर इष्टदेव की पूजा, पितरों का स्मरण, तर्पण और जरूरतमंद लोगों को दान करने की परंपरा है। दिन की शुरुआत सूर्य देव की पूजा से करेंगे, तो बहुत शुभ रहेगा। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से किए गए शुभ कार्यों से अक्षय पुण्य मिलता है, ऐसा पुण्य जिसका शुभ असर जीवन में बना रहता है।
तांबे के लोटे से चढ़ाएं सूर्य को जल
आज सुबह स्नान के बाद सूर्य देव को जल चढ़ाएं। इसके लिए तांबे के लोटे में जल लें, जल में कुमकुम, चावल, फूल डाल लें। इसके बाद सूर्य देव को अर्पित करें और ऊँ सूर्याय नम: मंत्र का जप करें। इसके बाद घर के मंदिर में अपने इष्टदेव की पूजा करें। अमावस्या पर भगवान गणेश, भगवान शिव, भगवान विष्णु, माता दुर्गा और भगवान श्रीकृष्ण की विशेष पूजा करने से विशेष फल मिलता है। अगर कोई व्यक्ति इस दिन व्रत रखने का विचार कर रहा है तो पूजा के समय व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
इष्टदेव के मंत्रों का करें जप
अमावस्या पर उपवास करें। जो लोग निराहार व्रत नहीं रख सकते, वे एक समय फलाहार करके भी व्रत कर सकते हैं। पूजा में भगवान के मंत्रों का जप करना चाहिए। भगवान गणेश के लिए श्री गणेशाय नम:, भगवान शिव के लिए ऊँ नम: शिवाय, भगवान विष्णु के लिए ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय और माता दुर्गा के लिए दुं दुर्गायै नम: मंत्र का जप किया जा सकता है। अगर आपके पास पर्याप्त समय हो, तो धार्मिक ग्रंथों का पाठ भी कर सकते हैं। अपनी सुविधा के अनुसार शिवपुराण, विष्णुपुराण या श्रीमद्भागवत कथा के अध्याय पढ़े जा सकते हैं। इसके अलावा संतों के प्रवचन भी सुन सकते हैं।
दोपहर में करें पितरों के लिए धूप-ध्यान
अमावस्या पर पितरों के लिए धूप-ध्यान करने की विशेष परंपरा है। दोपहर करीब 12 बजे का समय पितरों के लिए किए जाने वाले पूजन कर्मों के लिए शुभ माना जाता है। इसे कुतप काल कहते हैं। इस समय में गाय के गोबर से बने कंडे को जलाकर धूप दी जाती है। जब कंडे से धुआं निकलना बंद हो जाए, तब उस पर गुड़ और घी अर्पित कर सकते हैं। कुछ लोग पितरों की प्रसन्नता के लिए खीर-पुड़ी का भोग भी लगाते हैं। पितरों का स्मरण करते हुए हथेली में जल लेकर अंगूठे की ओर से जल अर्पित करने की परंपरा है। इसके बाद कुछ समय शांत बैठकर पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए और ऊँ पितृभ्यो नम: मंत्र का जाप करना चाहिए। पितरों को धूप देने के बाद जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना शुभ माना जाता है। इसके अलावा घर के बाहर गाय, कुत्ते और कौओं के लिए भी भोजन रखना चाहिए। गौशाला में दान करना भी पुण्यदायी माना गया है।
नदी स्नान न कर पाएं, तो क्या करें?
अमावस्या पर गंगा, यमुना, नर्मदा और शिप्रा जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि इस दिन तीर्थ स्नान करने से व्यक्ति के जाने-अनजाने में किए गए गलत कर्मों का फल कम होता है। अगर किसी वजह से नदी में स्नान करना संभव न हो, तो घर पर ही स्नान के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है। स्नान करते समय सभी तीर्थों और देवी-देवताओं का ध्यान करने से भी पुण्य प्राप्त होने की मान्यता है।
मंगलवार और अमावस्या के योग में करें ये शुभ काम
आषाढ़ अमावस्या और मंगलवार के योग में हनुमान जी के सामने दीपक जलाकर हनुमान चालीसा का पाठ कर सकते हैं। श्रद्धा के अनुसार राम नाम का जप और सुंदरकांड का पाठ भी किया जा सकता है। ज्योतिष में मंगलवार का कारक मंगल ग्रह को माना जाता है। मंगल को ग्रहों का सेनापति कहते हैं। यह मेष और वृश्चिक राशि का स्वामी माना गया है। जिन लोगों की कुंडली में मंगल कमजोर स्थिति में होता है, वे मंगल दोष को शांत करने के लिए मंगलवार को मंगल देव की पूजा कर सकते हैं। इस ग्रह की पूजा शिवलिंग रूप में की जाती है, इसलिए शिवलिंग पर लाल फूल, लाल गुलाल, बिल्व पत्र, धतूरा और आंकड़े के फूल चढ़ाए जा सकते हैं। इस दौरान ऊं भों भौमाय नम: मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है। शाम को सूर्यास्त के बाद घर के आंगन में तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाएं। तुलसी की परिक्रमा करके देवी तुलसी से सुख-शांति की प्रार्थना करनी चाहिए।
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