अर्जुन जैन ने पहली बार 2001 में 2 साल की जमकर तैयारी करने के बाद जेईई की परीक्षा दी थी। लेकिन इसमें वो असफल रहें। इसके बावजूद उन्होंने इंजीनियरिंग की राह नहीं बदली। पैसों की तंगी की वजह से कोटा में एक और साल कोचिंग कर पाना उनके लिए मुश्किल था।
जेईई में फेल, नहीं छोड़ी इंजीनियरिंग की राह
बता दें कि अर्जुन जैन ने पहली बार 2001 में 2 साल की जमकर तैयारी करने के बाद जेईई की परीक्षा दी थी। लेकिन इसमें वो असफल रहें। इसके बावजूद उन्होंने इंजीनियरिंग की राह नहीं बदली। पैसों की तंगी की वजह से कोटा में एक और साल कोचिंग कर पाना उनके लिए मुश्किल था। इसलिए उन्होंने बेंगलुरु के आरवी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग में एडमिशन ले लिया। यह फैसला आगे चलकर उनके करियर के लिए काफी अच्छा साबित हुआ। कॉलेज में अर्जुन ने अपनी पढ़ाई के अलावा कंप्यूटर साइंस को गहराई से समझना शुरू किया। वह IEEE जर्नल में प्रकाशित रिसर्च पेपर पढ़ने लगे और रिसर्च के क्षेत्र में उनकी रुचि बढ़ती गई।
दोबारा जेईई में आई 3363
इसके बावजूद उनका मन आईआईटी से पढ़ाई करने में लगा रहा। इसी दौरान उन्होंने एक बार फिर जेईई परीक्षा देने का फैसला किया। इस बार उन्होंने हॉस्टल के कमरे से ही तैयारी की। यह तैयारी कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ हो रही थी। हालांकि दूसरी कोशिश में उनकी AIR 3363 आई। इस रैंक के आधार पर उन्हें IIT-BHU में पेट्रोकेमिकल इंजीनियरिंग में सीट मिल गई। लेकिन कोर्स उनके रुचि मुताबिक नहीं थी। इस वजह से आईआईटी की सीट भी छोड़नी पड़ी। इसके बाद उन्होंने आरवी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी की और इसके बाद रिसर्च के क्षेत्र में आगे बढ़ते रहे।
पीएचडी के बाद बतौर रिचर्सर किया काम
इसके बाद अर्जुन जैन ने यूनिवर्सिटी ऑफ सारलैंड से कंप्यूटर साइंस में पीएचडीकी। पीएचड पूरी करने के बाद उन्होंने न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के कूरेंट इंस्टीट्यूट में पोस्टडॉक्टोरल रिसर्चर के तौर पर काम किया। उनकी रिसर्च का मुख्य फील्ड कंप्यूटर विजन और डीप लर्निंग रहा। पोस्टडॉक्टोरल रिसर्च के दौरान उन्होंने यैन लेकुन समेत कई रिसर्चर्स के साथ काम किया। उन्होंने डीप लर्निंग की मदद से इंसानों के शरीर की मुद्रा का अनुमान लगाने से जुड़ी तकनीकों पर रिसर्च की।
इतना ही नहीं रिसर्च के दौरान अर्जुन जैन ने अपना बिजनेस भी शुरू किया। उन्होंने परसेप्टिव कोड नाम की कंपनी बनाई, जो ह्यूमन पोज एस्टीमेशन पर उनके रिसर्च से विकसित तकनीक पर आधारित थी। बाद में इस तकनीक की इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) Mercedes ने खरीद ली। इसके बाद इस तकनीक का इस्तेमाल Mercedes के वाहन सिस्टम से जुड़े कामों में किया गया।
आईआईटी बॉम्बे के बने प्रोफेसर
उनका सफर और दिलचस्प तब हो गया, जब वो साल 2016 में IIT बॉम्बे में असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर शामिल हुए। कभी यहां से उनका पढ़ाई करने का सपना हुआ करता था। इसके बाद अर्जुन जैन ने अकादमिक रिसर्च और इंडस्ट्री, दोनों क्षेत्रों में काम किया। उन्होंने Apple में सीनियर रिसर्चर के तौर पर काम किया, जहां उनका काम कंप्यूटर विजन और वाहनों से जुड़ी सेंसिंग तकनीकों पर केंद्रित था। Apple में काम करने के बाद उन्होंने बेंगलुरु में फास्ट कोड एआई की स्थापना की। उनका काम AI, कंप्यूटर विज़न और रिसर्च-आधारित तकनीकों से जुड़ा रहा।
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