हिंदी के प्रति अमित शाह का लगाव केवल औपचारिक राजभाषा-नीति तक सीमित नहीं दिखाई देता। वर्ष 2019 में हिंदी दिवस के अवसर पर उन्होंने हिंदी को स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से जोड़ा था। गत वर्ष 2025 में भी श्री शाह ने हिंदी दिवस पर आयोजित अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में हिंदी के संवर्धन से जुड़े कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने पर बल दिया था।
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पिछले एक वर्ष में माननीय गृह मंत्री जी के नेतृत्व में राजभाषा विभाग ने हिंदी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के लिए भी कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। जून 2025 में भारतीय भाषा अनुभाग की शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाना और उन्हें तकनीक तथा प्रशासन से जोड़ना है। इस पहल से राजभाषा विभाग के काम का दायरा भी व्यापक हुआ है। विभाग ने नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियों यानी नराकासों के काम को प्रोत्साहित करने के लिए ‘नराकास प्रोत्साहन सम्मान’ की व्यवस्था भी शुरू की है। इससे उन नराकासों को आगे आने का अवसर मिलेगा, जो अपने क्षेत्र में राजभाषा के काम को बेहतर ढंग से आगे बढ़ा रही हैं।
तकनीक के क्षेत्र में भी राजभाषा विभाग ने नई पहल की है। ‘भारती – बहुभाषी अनुवाद सारथी’ के माध्यम से हिंदी से भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद को आसान बनाने की दिशा में काम हुआ है। इसके साथ ‘हिंदी शब्द-सिंधु’ जैसे शब्दकोश को भी विकसित किया गया है। ‘हिंदी शब्द-सिंधु’ में विभिन्न भारतीय भाषाओं के शब्दों को शामिल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य हिंदी को दूसरी भारतीय भाषाओं से जोड़ना है, न कि उनसे अलग करना। इन प्रयासों से साफ है कि राजभाषा का काम अब केवल सरकारी कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग तक सीमित नहीं है। यह भाषा, तकनीक और भारतीय भाषाओं के बीच नए संबंध बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।
श्री शाह के हिंदी प्रेम का एक उल्लेखनीय पक्ष यह भी है कि वे हिंदी को भारतीय भाषाओं की प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उनके साथ चलने वाली भाषा के रूप में देखते हैं। अमित शाह का हिंदी प्रेम हिंदी के विकास के साथ भारतीय भाषाओं के सम्मान और संरक्षण के रूप में आगे बढ़ता है। कहना न होगा कि यह दृष्टि भारतीय भाषायी एकता को मजबूत करनेवाली है। हिंदी की वास्तविक शक्ति उसकी आत्मीयता, समावेशिता और संवादधर्मिता में है। भारत में हिंदी का विस्तार तभी सार्थक होगा, जब वह दूसरी भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान और संवाद का भाव लेकर आगे बढ़े। हिंदी का भारतीय भाषाओं से संबंध वर्चस्व का नहीं, आदान-प्रदान का होना चाहिए। भारतीय भाषाओं का इतिहास भी प्रतिस्पर्धा का इतिहास नहीं, बल्कि परस्पर आदान-प्रदान का इतिहास है। हिंदी ने दूसरी भारतीय भाषाओं से असंख्य शब्द, मुहावरे, साहित्यिक संस्कार और विचार ग्रहण किए हैं। दूसरी ओर हिंदी के माध्यम से भी अनेक भारतीय भाषाओं का साहित्य व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचा है। इसलिए हिंदी को संपर्क और सेतु की भाषा के रूप में विकसित किया जा सका है।
श्री शाह का यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है कि हिंदी की समृद्धि भारतीय भाषाओं की समृद्धि से जुड़ी है। भारतीय भाषाओं की विविधता का सम्मान बनाए रखना ही भारत की भाषायी वास्तविकता के अनुरूप है। श्री अमित शाह का यह विचार आज विशेष रूप से प्रासंगिक है। श्री शाह के लिए हिंदी का समर्थन किसी एक क्षेत्रीय पहचान का विस्तार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर संचार की एक साझा भाषा को मजबूत करने का प्रयास है।
भारत की भाषायी परंपरा में हिंदी का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि उसे देश के बड़े भूभाग में समझा और बोला जाता है, बल्कि इसलिए भी है कि उसने विभिन्न प्रदेशों, समुदायों और भाषायी संस्कृतियों के बीच संवाद का माध्यम बनने की ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन अनुवाद, सोशल मीडिया और डिजिटल प्रकाशन के दौर में हिंदी के सामने अभूतपूर्व अवसर हैं। यदि हिंदी में उच्चस्तरीय वैज्ञानिक, तकनीकी, दार्शनिक और सामाजिक विज्ञान संबंधी सामग्री का पर्याप्त निर्माण होता है, तो वह ज्ञान की भाषा के रूप में अपनी भूमिका और मजबूत कर सकती है। साथ ही यही तकनीक अन्य भारतीय भाषाओं के विकास के लिए भी इस्तेमाल की जानी चाहिए।
श्री शाह उन गुजरातीभाषी मनीषियों की पांत में आ गए हैं जिनमें स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक की हिंदी के प्रति आग्रह की एक ऐसी परंपरा दिखाई देती है, जिसमें हिंदी को राष्ट्रीय संवाद और जनजागरण की भाषा बनाने की आकांक्षा प्रमुख रही है।
हिंदी के अनेक हिंदीतरभाषियों ने अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए हिंदी को अपनाया। दयानंद सरस्वती ने संस्कृत के प्रकांड विद्वान होने के बावजूद अपने सामाजिक और धार्मिक सुधार के संदेश को केवल संस्कृत के विद्वत् वर्ग तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने जनसाधारण तक पहुँचने के लिए हिंदी का सहारा लिया। उनकी प्रसिद्ध कृति सत्यार्थ प्रकाश मूलतः हिंदी में लिखी गई। इसी तरह महात्मा गांधी मूलतः गुजरातीभाषी थे किंतु हिंदी में अखबार निकाले और हिंदी के महत्व को एक अलग राजनीतिक और राष्ट्रीय संदर्भ प्रदान किया। दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार के लिए उन्होंने अपने पुत्र देवदास गांधी को भेजा और 1918 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना के प्रयासों को आगे बढ़ाया।
वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक संवाद में हिंदी का व्यापक प्रयोग दिखाई देता है। वे देश-विदेश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों से संवाद करते हुए हिंदी का प्रयोग करते हैं और भारतीय भाषाओं के महत्व पर भी जोर देते रहे हैं।
दयानंद सरस्वती, गांधी, नरेंद्र मोदी और अमित शाह – इन चारों की हिंदी संबंधी दृष्टियों को एक साथ देखने पर हिंदी के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण सूत्र निकलता है: हिंदी जितनी जनभाषा होगी, उतनी ही प्रभावी होगी; जितनी समावेशी होगी, उतनी ही स्वीकार्य होगी; और जितनी भारतीय भाषाओं से जुड़ेगी, उतनी ही समृद्ध होगी।
हिंदी प्रेम का सर्वोच्च रूप हिंदी को दूसरों पर थोपना नहीं, बल्कि उसे ऐसा सक्षम माध्यम बनाना है जो भारत की विविध आवाजों को एक-दूसरे तक पहुँचाए। दयानंद ने हिंदी को जनजागरण का माध्यम बनाया, गांधी ने उसे राष्ट्रीय संवाद की शक्ति दी और आज हिंदी के सामने डिजिटल युग में विश्वव्यापी संवाद की नई संभावनाएँ हैं। इन पड़ावों को जोड़कर देखा जाए तो हिंदी की यात्रा केवल एक भाषा की यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय समाज में संवाद, जागरण और आत्मविश्वास की यात्रा भी है। भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती, वह समाज की स्मृति, संस्कृति और सामूहिक चेतना को भी अपने भीतर संजोए रहती है। भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में भाषा का प्रश्न इसलिए और अधिक संवेदनशील हो जाता है।
– प्रो. संजय द्विवेदी
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हैं)
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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