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सीईओ हासाबिस ने एजीआई की तुलना ‘सिंगुलैरिटी’ से की, यानी वो पल जहां से पलटकर देखना मुमकिन नहीं होगा।- फाइल फोटो
गूगल डीपमाइंड के सीईओ डेमिस हासाबिस ने हाल ही में एक ऐसी बात कही जो सुनने में उतनी ही रोमांचक है, जितनी डरावनी। उन्होंने कहा कि इंसान जैसी सोच रखने वाली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एजीआई अब महज कुछ साल दूर है। स्टैनफर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, ‘शायद 2030, एक-दो साल कम या ज्यादा लग सकते हैं।’ यह सुनकर खुद उन्हें भी हैरानी होती है।
हासाबिस ने एजीआई की तुलना ‘सिंगुलैरिटी’ से की, यानी वो पल जहां से पलटकर देखना मुमकिन नहीं होगा। उनके मुताबिक यह ‘एक नए मानव युग’ की शुरुआत होगी। और इसीलिए वे बार-बार यह कहते हैं कि नए दौर का सामना करने की तैयारी अभी से होनी चाहिए क्योंकि वक्त कम बचा है। हासाबिस इकलौते नहीं हैं जो इस तरह की बातें कर रहे हैं।
ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन का कहना है कि एआई की वजह से लाखों नौकरियां जा सकती हैं। एंथ्रोपिक के सीईओ डेरियो अमोदेई ने तो यहां तक कह चुके हैं कि अगले पांच वर्षों में आधे एंट्री-लेवल वाइट-कॉलर काम गायब हो सकते हैं। हां, यह भी सच है कि हाल के दिनों में इन तमाम दिग्गजों ने अपनी ‘कयामत की भाषा’ में थोड़ी नरमी लाई है, लेकिन मुख्य संदेश वही है। हासाबिस ने यह भी माना कि उनके कुछ साथी अपनी भविष्यवाणियों में ‘बहुत ज्यादा निश्चित’ हो जाते हैं। यह ठीक नहीं। उन्होंने एजीआई को सिर्फ खतरे का पर्याय नहीं बताया। उनके मुताबिक यही टेक्नोलॉजी मेडिकल साइंस में क्रांति ला सकती है। यह आर्थिक बदलाव की वजह बन सकती है और एक ऐसी दुनिया की नींव रख सकती है जहां ‘अभाव’ शब्द का अर्थ बदल जाए, जिसे भविष्यवादी ‘पोस्ट-स्कार्सिटी वर्ल्ड’ कहते हैं।
युवाओं और छात्रों को उनका सीधा संदेश है- चाहे आप ‘ह्यूमैनिटीज’ पढ़ते हों या साइंस-टेक्नोलॉजी की ट्रेनिंग ले रहे हों, इस तकनीक से भागिए मत, इसे अपनाइए। उन्होंने सबसे दिलचस्प बात ये कही, ‘भविष्य अभी लिखा नहीं गया है, लेकिन अगले कुछ साल तय कर देंगे कि वो वास्तव में कैसा दिखेगा।’
एजीआई- जब मशीनें भी इंसान की तरह हर काम में माहिर होंगी
एजीआई यानी आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस। यह एआई का वो स्तर है जब मशीन हर काम इंसान जितनी या उससे भी बेहतर क्षमता से कर सके। अभी का एआई किसी एक काम में माहिर होता है, एजीआई हर काम में माहिर होगा। हासाबिस का अनुमान है कि यह 2030 तक हकीकत बन सकता है। सैम ऑल्टमैन और डेरियो अमोदेई भी इसी समयसीमा के आसपास इशारा कर चुके हैं। एजीआई के संभावित फायदे- बीमारियों का इलाज, आर्थिक बदलाव, अभावमुक्त दुनिया। लेकिन इसके साथ नौकरियां कम होने के खतरे, नियंत्रण का सवाल, समाज पर अप्रत्याशित प्रभाव जैसी आशंकाएं भी जुड़ी हुई हैं। दुनिया के पास तैयारी के लिए शायद पांच साल भी नहीं हैं।
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