(कुशान सरकार)
नयी दिल्ली, तीन अगस्त जब किशोर उम्र के आकिब नबी को बीसीसीआई के तेज गेंदबाजी शिविर में हिस्सा लेने का मौका मिला तब वह बायो साइंस विषय के साथ 12वीं बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। इस शिविर में ऑस्ट्रेलिया के महान तेज गेंदबाज ग्लेन मैकग्रा उन्हें तेज गेंदबाजी की बारीकियां सिखाने वाले थे। नबी के पिता गुलाम नबी डार एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे और शिक्षा को सबसे अधिक महत्व देते थे।
वह चाहते थे कि उनका बेटा पढ़ाई पर ध्यान दे और क्रिकेट के लिए पढ़ाई बीच में ना छोड़े। आखिरकार डार मान गए। उनका यह फैसला नबी की जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।
करीब 13 साल बाद दाएं हाथ के तेज गेंदबाज नबी ने इतिहास रचते हुए जम्मू-कश्मीर के पहले ऐसे क्रिकेटर बनने का गौरव हासिल किया जिन्हें भारत की टेस्ट टीम में जगह मिली। घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन के दम पर उन्हें श्रीलंका दौरे के लिए भारतीय टीम में चुना गया। नबी के पहले क्लब कप्तान जुबैर डार ने उस घटना को याद करते हुए कहा, ‘‘उनके पिता बीसीसीआई के शिविर में भेजने के सख्त खिलाफ थे जबकि वहां ग्लेन मैकग्रा जैसे महान गेंदबाजी कोच थे।
उनका कहना था कि नबी को पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए और मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी करनी चाहिए। मुझे उन्हें समझाना पड़ा कि मैकग्रा जैसे दिग्गज से सीखने का यह मौका गंवाना नहीं चाहिए।’’
नबी के करीबी दोस्त जुबैर मानते हैं कि उनके पिता ने आखिरकार बेटे के जुनून को समझा और सही फैसला लिया। उन्होंने कहा, ‘‘जब मैं उनके पिता को मनाने में सफल हुआ तो उन्होंने कहा कि नबी श्रीनगर से चेन्नई ट्रेन से नहीं जाएगा।
एक सरकारी शिक्षक होने के बावजूद उन्होंने करीब 10 हजार रुपये की व्यवस्था की और उसे हवाई जहाज से भेजा। कुछ महीने पहले जब नबी को आईपीएल में रिकॉर्ड अनुबंध मिला तो उनके पिता ने उसी घटना को याद किया और कहा कि अच्छा हुआ मैंने आपकी बात मान ली थी।’’
पुरानी यादों में भावुक होते हुए जुबैर ने कहा कि सबसे अच्छी बात यह है कि सफलता और पहचान मिलने के बावजूद नबी बिल्कुल नहीं बदले। उन्होंने कहा, ‘‘वह अपने काम से काम रखने वाले इंसान हैं।
बहुत कम बोलते हैं और आज भी पहले जैसे ही सरल हैं। आईपीएल शिविर के लिए रवाना होने से पहले भी वह अचानक मेरे घर मिलने आ गए थे। यह सब उनकी वर्षों की मेहनत का नतीजा है।’’
बारामूला शहर से करीब आठ किलोमीटर दूर स्थित शीरी गांव के रहने वाले नबी की सादगी ने पहली ही मुलाकात में जुबैर को प्रभावित कर दिया था।
नबी से जुड़ी यादों का जिक्र करते हुए जुबैर ने बताया कि उस समय कश्मीर में केवल श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में ही टर्फ विकेट था। उन्होंने कहा, ‘‘जिला स्तर के एक मैच के लिए हम वहां पहुंचे तो नबी ने कहा कि भाई, मैं पूरी रात सो नहीं पाया क्योंकि पहली बार शेर-ए-कश्मीर मैदान पर खेलने जा रहा हूं।’’
हालांकि शुरुआत बेहद शर्मनाक रही। जुबैर ने बताया, ‘‘पहली ही गेंद डालते समय उनका पैर फिसल गया और सीधे पिच के बीचों-बीच जा गिरे।
जब हम दौड़कर पहुंचे तो देखा कि उन्होंने स्पाइक्स की जगह साधारण जूते पहन रखे थे। उन्हें पता ही नहीं था कि गेंदबाजी के लिए स्पाइक्स पहननी होती हैं। इसके बाद दूसरे छोर पर गेंदबाजी कर रहे हमारे सीनियर खिलाड़ी अपना ओवर पूरा करके उन्हें अपनी स्पाइक्स दे देते थे।’’
नबी की मासूमियत का एक और किस्सा सुनाते हुए जुबैर ने कहा कि एक बार जम्मू-कश्मीर क्रिकेट संघ (जेकेसीए) के दो अलग-अलग गुटों द्वारा आयोजित चयन शिविरों में उन्होंने एक ही दिन हिस्सा ले लिया।
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