गाली इन दिनों राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में हैं। जंतर-मंतर पर प्रधानमंत्री मोदी को लेकर दी खुलेआम गंदी गालियां इसका बहाना बनीं हैं। हैरत की बात है कि इसमें कई प्रोफेसर और पत्रकार भी शामिल हो गए हैं और इन गालियों को उचित ठहराने की दौड़ का हिस्सा बन गए हैं। इसे लड़कियों की क्रांतिकारी अभिव्यक्ति बताया जा रहा है तो कई गालीबाजों को नई गालियां रचने का सुझाव दे रहा है। उनके हिसाब से सारी गालियां पुरूषों द्वारा रची गई हैं, लिहाजा लड़कियों को नई तरह की गाली पुराण रचना चाहिए। इसके खिलाफ का समाज का एक बड़ा तबका इस नई प्रवृत्ति की मुखालफत कर रहा है। उसका कहना है कि गालियां भले हीं समाज में सदा से चली आ रही हैं, लेकिन कम से कम उनकी सार्वजनिक स्वीकृति नहीं रही है।
गालियों के समर्थकों में सबसे बड़ी संख्या खुद को क्रांतिकारी मानने वाले वामपंथी हैं। प्रगतिशील लेखक संघ भारत में वामपंथी विचारधारा के लिहाज से गठित हुआ था। उसके पहले अध्यक्ष उपन्यास सम्राट प्रेमचंद थे। गाली विमर्श के संदर्भ में प्रेमचंद का लिखे एक लेख का अंश याद आ रहा है। उन्होंने लिखा है, ‘‘हर जाति का बोलचाल का ढ़ंग उसकी नैतिक स्थिति का पता देता है। अगर इस दृष्टि से देखा जाए तो हिन्दुस्तान सारी दुनिया की तमाम जातियों में सबसे नीचे नजर आएगा। बोलचाल की गंभीरता और सुथरापन जाति की महानता और उसकी नैतिक पवित्रता को व्यक्त करती है और बदजवानी नैतिक अंधकार और जाति के पतन का पक्का प्रमाण है। जितने गन्दे शब्द हमारी जबान से निकलते हैं शायद ही किसी सभ्य जाति की ज़बान से निकलते हों।’’
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इसमें दो राय नहीं कि हर सफल आंदोलन के बाद आंदोलनकारी नायक और विजेता के रूप में उभरते हैं। इस लिहाज से काकरोच जनता पार्टी के नेता जंतर-मंतर आंदोलन के फिलहाल के विजेता तो हैं हीं। इस तर्क से उनका साथ देने वाला वाला समूह भी उसी वर्ग का माना जाएगा। इतिहास हमेशा विजेताओं का ही गुणगान करता है, उसकी सफलता की बलैया लेता है। चूंकि काकरोच जनता पार्टी के नेता चूंकि हीरो हैं, इसलिए उनकी ओर से दी गई गालियों को उनके गुणों के रूप में देखने की कोशिश हो रही है। तर्क दिया जा रहा है कि भारतीय समाज में शादी-ब्याह और मुंडन-जनेऊ के मौके पर प्यार से गालियां दी जातीं हैं। लिहाजा से जंतर-मंतर की गालियां भी उन्हीं गालियों की तरह स्नेह की अभिव्यक्ति हैं। लेकिन क्या सचमुच ऐसा ही है ? गंभीरता से विचार करेंगे तो इसका जवाब ना में मिलता है। इस अश्लील अभिव्यक्ति का मकसद देश के संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए हिकारत और घृणा का प्रदर्शन है। मोदी देश के वामपंथी और कांग्रेसी इकोसिस्टम एवं संस्कृति और परंपराभंजकों के निशाने पर तब से हैं, जब आज के जेन जी के अधिसंख्य जन्मे भी नहीं होंगे। अतीत में मोदी के खिलाफ कठोर शब्दों का इस्तेमाल जरूर होता था, लेकिन उनमें गालियां नहीं थीं। जंतर-मंतर का हालिया आंदोलन इसी बुनियाद पर आगे की कड़ी है।
बचाव में उतरे वामपंथियों का तर्क है कि ये गालियां नई नहीं हैं। कई तो खुद का उदाहरण देते हुए कहने से नहीं चूक रहे कि वे भी गाली देते हैं या फिर उनके दोस्तों के बीच गालियों का खूब आदान-प्रदान होता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वे ऐसी ही गालियां अपने ही बच्चों के मुख से अपने ही घरों में सुनना पसंद करेंगे। सवाल यह भी है कि क्या इन गालीबाजों को भविष्य में वे अपने परिवार का दामाद या बहू के रूप हिस्सा बनाना पसंद करेंगे। सवाल यह भी है कि क्या वे अपने ही बच्चों से स्नेह के तौर पर अपने ही माता-पिता को ऐसी गालियां दिलाना स्वीकार करेंगे। निश्चित तौर पर इन सवालों का जवाब ना में है।
हर समाज में गालियां किसी न किसी रूप में रही हैं। लेकिन वे कभी सार्वजनिक स्वीकार्यता और विमर्श का विषय नहीं रही हैं। गालियां संस्कार से जुड़ी हैं। भाषाशास्त्री शब्द शक्ति की बात करते हैं। शब्द शक्ति में श्लील और अश्लील को लेकर भाषा शास्त्री स्पष्ट विभाजन स्वीकार करते हैं। वे मानते हैं कि श्लील ही सार्वजनिक चर्चा और अभिव्यक्ति का माध्यम होता है। आधुनिक साहित्य में गालियों का प्रयोग वामपंथी विचारधारा के बढ़ते असर के साथ बढ़ा। लेकिन प्रेमचंद के किसी कहानी या उपन्यास में कहीं गाली या अश्लील शब्द का प्रयोग नहीं मिलता। सच तो यह है कि गालियां कभी यथार्थ नहीं होती। हिंदी साहित्य में यथार्थवाद की अभिव्यक्ति के लिए गालियों के प्रयोग की शुरूआत हुई। लेकिन आधुनिक यथार्थवादी चिंतन से पहले के साहित्य में कभी गालियों का प्रयोग नहीं होता दिखता।
तर्क दिया जा रहा है कि जेन जी की यही भाषा है। वह ऐसे ही खुद को अभिव्यक्त करता है। ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या वह परीक्षा में भी वह गालियों को अपनी जवाब में शामिल करता है?और क्या वह स्वीकार्य होगा? उनके समर्थन में उतरे दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यापक कक्षाओं में गालियों के धाराप्रवाह प्रयोग को स्वीकार करेंगे। सवाल यह भी है कि जो पत्रकार इसका समर्थन कर रहे हैं, क्या वे अपने अखबारों और अपने स्टूडियो में उन गालियों के इस्तेमाल को तैयार होंगे? निश्चित तौर पर इन सभी सवालों का जवाब ना में है। फिर यह सवाल क्यों ना उठे कि गालियों का महिमा मंडन क्यों?
तर्क यह भी है कि जेन जी इसी तरह सोचता है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि समूचे देश का जेन जी एक जैसा नहीं है, उसकी एक मातृभाषाएं नहीं है। जरूरी नहीं कि दिल्ली और चंडीगढ़ के जेन जी की तरह मुंबई और बंगलुरू का जेन जी भी सोचता हो। जिस तरह हर इलाके के लिए लोगों का खान-पान, रहन-सहन और बोली-बानी अलग-अलग हैं, कुछ इसी तरह हर इलाके के जेन जी की सोच भी अलग है। कुछ हजार या लाख जेन जी भले ही गालियां देने में फख्र महसूस कर रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि अब भी देश के जेन जी का बड़ा हिस्सा संस्कारी है और उसे सार्वजनिक तौर पर गालियां बकने से परहेज है।
मार्क्सवादी हिंदी लेखक जगदीश्वर चतुर्वेदी ने एक जगह लिखा है कि गालियों को वैध ठहराने की कोशिश पुनरूत्थानवादी सोच की खूबी है। वह पुराने असभ्य रूपों,भाषिक प्रयोगों, आदतों और संस्कारों को बनाये रखता है। मार्क्सवादी राष्ट्रीय विचारधारा को पुनरूत्थानवादी ही मानते हैं। तो क्या मान लें कि गालियों को उचित ठहराने वाले मार्क्सवादी भी अब पुनरूत्थानवादी हो गए हैं? समूचे भारतीय इतिहास और साहित्य में कहीं क्या गाली दी जाती थी, इसका प्रयोग नहीं दिखता।
गालियां हमेशा से गलत और असभ्य मानी जाती रही हैं। महाभारत में शिशुपाल का प्रकरण आता है। जिसकी सौ गालियों को कृष्ण बर्दाश्त करते हैं, लेकिन शिशुपाल जब सौ की सीमा पार करता है तो उसका वध कर देते हैं। जाहिर है कि कृष्ण के दौर में गालियां असभ्यता की निशानी थी। उनका महिमा मंडन नहीं होता था। मध्यकाल में जरूर गालियों को प्रतिष्ठा मिलने के संकेत मिलते हैं। फिर भी उनकी सार्वजनिक स्वीकार्यता नहीं दिखती। ऐसे में प्रश्न यह है कि भारतीय समाज प्रधानमंत्री को सार्वजनिक तौर पर दी जाने वाली गालियों और असभ्यता को क्यों स्वीकार किया जाए? नई पीढ़ी को असभ्य बनाने की प्रक्रिया को बढ़ावा क्यों दिया जाए। सभ्यता के साथ भी कड़ी से कड़ी आलोचना करने और कठोर बातें बोलने के लिए उन्हें योग्य क्यों न बनाया जाए। उनके परिवारों को क्यों न चेताया जाए कि असभ्यता की ओर बढ़ रहे अपने बच्चों के कदम को रोकें और उन्हें जिम्मेदार नागरिक और परिवारी बनाने की दिशा में आगे बढ़ें।
– उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं..
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