रामचरितमानस में ‘रावण’ दस सिरों वाला दैत्य नहीं है, बल्कि उन तामसिक गुणों का प्रतीक है, जो मनुष्य के नैतिक आचरण को कमजोर करते हैं। रावण उस तामसिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जो सत्ता के मद में चूर होकर लोक-लाज व मर्यादा को पैरों तले कुचल देती है। भगवान शिव माता पार्वती को रावण के इसी मद और लोभ का वर्णन करते हुए कहते हैं : “जौ भरि जियत रहा दससीसा।
तौ भरि कोउ न नवाइहि ईसा॥” अर्थात : रावण का अहंकार इतना प्रबल था कि उसने जीवित रहते किसी के आगे सिर नहीं झुकाया, यहां तक कि ईश्वर के सामने भी नहीं।
मानस के बालकांड में तुलसीदास जी ने उस भयावह स्थिति का वर्णन किया है, जहां मानवता सिसक रही थी। रावण के अत्याचारों से त्रस्त होकर जब धर्म, नीति और संस्कृति का लोप होने लगा, तब तुलसी ने उस ‘विवेक’ को पुकारा, जो मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में खड़ा रहने का साहस देता है। जब पाप की अति हुई, तो पीड़ित मानवता और देवताओं ने मिलकर उस परात्पर ब्रह्म का आह्वान किया जो ‘असंग’ होकर भी ‘सगुण’ रूप धारण करता है। राम का अवतार किसके लिए हुआ? तुलसी उत्तर देते हैं बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥ अर्थात : राम का अवतार रक्षण, सृजन और मर्यादा की पुनर्स्थापना के लिए हुआ था। तुलसी के राम ‘दीनबंधु’ हैं। उनका अवतार हुआ- मर्यादा की पुनर्स्थापना के लिए, खोए हुए सामाजिक संतुलन को बहाल करने के लिए और उस वैचारिक अहंकार को कुचलने के लिए जिसने समाज को ऊंच-नीच के खानों में बांट दिया था। राम ने महलों के ऐश्वर्य को त्यागकर वन के उन पथों को चुना, जहां निषादराज, शबरी और जटायु जैसे उपेक्षित पात्र प्रतीक्षा कर रहे थे। तुलसी द्वारा रोपित ‘रामत्व’ के बीज को आधुनिक भारत के जन-जागरण नायकों ने पल्लवित किया। गांधी ने ‘राम-राज्य’ की अवधारणा को स्वाधीनता संग्राम का केंद्र बनाया, तो उनका उद्देश्य राजनैतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त जाति-पांति, संप्रदाय और धार्मिक मान्यताओं के संघर्ष रूपी ‘आधुनिक रावणत्व’ का अंत करना था। सागर तुल्य यह कथन सदैव स्मरण रखना चाहिए
अहंकार की लंका कितनी ही स्वर्णमयी क्यों न हो, वह मर्यादा के एक दीये के सामने नहीं टिक सकती। राम का आगमन इस पृथ्वी पर इसलिए हुआ ताकि मनुष्य अपने भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों को जीतकर ‘मनुष्यता’ को प्राप्त कर सके। सियावर रामचंद्र की जय।
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