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भाजपा ने चुनाव से पहले अपने संकल्प पत्र में सरकार बनने के छह महीने के भीतर UCC लागू करने का वादा किया था।
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि 6 महीने में लव जिहाद और लैंड जिहाद के खिलाफ सख्त कानून लाए जाएंगे। साथ ही राज्य में उत्तराखंड और गुजरात की तरह समान नागरिक संहिता (UCC) लागू की जाएगी।
कोलकाता में विश्व हिंदू परिषद (VHP) के पूर्व अध्यक्ष अशोक सिंघल की जन्मशताब्दी समारोह के दौरान कही।
अधिकारी ने कहा कि BJP सरकार संविधान के अनुसार काम करेगी, लेकिन भारतीय संस्कृति, परंपरा और पूजा स्थलों पर हमले बर्दाश्त नहीं करेगी।
पश्चिम बंगाल सरकार ने UCC का मसौदा तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में हाईलेवल कमेटी बनाई है।
मई 2026 में असम विधानसभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) बिल पारित किया गया था। इसी के साथ असम देश का तीसरा ऐसा राज्य बन गया है। इससे पहले उत्तराखंड और गुजरात ऐसा कर चुके हैं।

संविधान के अनुसार काम करेंगे, संस्कृति पर हमला नहीं सहेंगे
अधिकारी ने कहा, “आप निश्चिंत रहें कि सरकार संविधान के अनुसार काम करेगी। लेकिन भारतीय संस्कृति, सनातनी परंपराओं, मंदिरों और मठों पर कोई हमला नहीं होने देगी।”
उन्होंने कहा कि सरकार उस विरासत पर भी हमला नहीं होने देगी, जिसे स्वामी विवेकानंद और महाप्रभु श्री चैतन्य जैसे आध्यात्मिक महापुरुषों ने आगे बढ़ाया है।
UCC पर बात करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि पश्चिम बंगाल इसे लागू करने में उत्तराखंड और गुजरात को फॉलो किया जाएगा।
उन्होंने सभा में कहा, “हमें 6 महीने दीजिए, हम लव जिहाद और लैंड जिहाद के खिलाफ सख्त कानून भी लाएंगे।”
UCC में शादी, तलाक, विरासत और गोद लेने के नियम शामिल होंगे
सरकारी अधिसूचना के मुताबिक, पश्चिम बंगाल UCC बिल का मकसद सभी समुदायों के लिए नागरिक कानूनों को एक जैसा करना है। इसमें शादी, तलाक, विरासत और गोद लेने से जुड़े मामले शामिल होंगे। 2026 के विधानसभा चुनाव में BJP ने UCC को अपने प्रमुख चुनावी वादों में शामिल किया था।
बंगाल में UCC क्यों जरूरी- 5 पॉइंट
- UCC का उद्देश्य: धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों की जगह शादी, तलाक, विरासत, गोद लेने जैसे नागरिक मामलों में समान नियम लागू करना।
- समर्थन में तर्क: समर्थकों के अनुसार इससे अलग-अलग समुदायों के लिए अलग नियम कम होंगे और खासकर महिला अधिकारों में समानता बढ़ सकती है।
- विरोध/चिंता: विरोध करने वालों का तर्क है कि अलग-अलग धार्मिक और आदिवासी समुदायों की परंपराओं को एक कानून में लाने से उनके व्यक्तिगत अधिकार और प्रथाएं प्रभावित हो सकती हैं।
- बंगाल में खास महत्व: मुस्लिम आबादी करीब 27% है, इसलिए UCC का असर राज्य की बड़ी आबादी के व्यक्तिगत कानूनों पर पड़ेगा; इसलिए कानून का मसौदा और उसके प्रावधान ज्यादा मायने रखेंगे।
- संवैधानिक आधार: संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को पूरे देश में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश देता है।
अब तक दो राज्यों में UCC बिल पारित, एक में लागू
जनवरी 2025: उत्तराखंड UCC लागू करने वाला पहला राज्य: 6 फरवरी 2024 को विधानसभा में UCC विधेयक पेश हुआ। 7 फरवरी 2024 को पारित हुआ। 11 मार्च 2024 को राष्ट्रपति ने UCC विधेयक को मंजूरी दी। क्रियान्वयन समिति ने 18 अक्टूबर 2024 को नियमावली सरकार को सौंपी। 20 जनवरी 2025 को नियमावली को कैबिनेट की मंजूरी मिली। इस तरह उत्तराखंड UCC लागू करने वाला पहला राज्य बन गया।
मार्च 2026: गुजरात UCC बिल पास करने वाला दूसरा राज्य बना: गुजरात विधानसभा में मार्च 2026 में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) बिल पास कराया गया था। गुजरात UCC बिल पास करने वाला देश का दूसरा राज्य बना है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने विधानसभा में समान नागरिक संहिता विधेयक पेश किया था। विधानसभा में बिल पर वोटिंग के दौरान कांग्रेस ने वॉकआउट कर दिया था। बिल बहुमत से पास हो गया।
मई 2026: असम UCC बिल पास करने वाला तीसरा राज्य बना: असम विधानसभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) बिल 27 मई को पेश किया गया था। यह बिल सदन से पारित भी हो गया। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के मुताबिक अनुसूचित जनजातियां (पहाड़ी) और अनुसूचित जनजातियां (मैदानी) UCC के दायरे से बाहर रहेंगी। साथ ही ‘पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों, प्रथाओं और अनुष्ठानों’ को भी इससे छूट दी जाएगी।
आजाद भारत से पहले गोवा में UCC
गोवा में पहले से ही UCC लागू है, लेकिन वहां इसे पुर्तगाली सिविल कोड के तहत लागू किया गया था। उत्तराखंड आजादी के बाद समान नागरिक संहिता लागू करने वाला पहला राज्य है।
सन् 1835 में, ब्रिटिश सरकार ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें आपराधिक साक्ष्य और अनुबंधों के संबंध में देश भर में एक समान कानून बनाने का आह्वान किया गया था। इसे सन् 1840 में लागू भी किया गया, लेकिन धर्म के आधार पर हिंदुओं और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों को अलग रखा गया। यहीं से समान नागरिक संहिता की मांग शुरू हुई।
1941 में बीएन राव समिति का गठन किया गया था, जिसने हिंदुओं के लिए एक समान नागरिक संहिता बनाने की बात कही थी।
आजादी के बाद, हिंदू संहिता विधेयक पहली बार 1948 में संविधान सभा में प्रस्तुत किया गया था। इसका उद्देश्य हिंदू महिलाओं को बाल विवाह, सती प्रथा और बुर्का जैसी गलत प्रथाओं से मुक्त करना था।
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