ग्रीनलैंड को लेकर पिछले कई महीनों से अमेरिका और डेनमार्क के बीच तनाव चरम पर था। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की नजरें लंबे वक्त से ग्रीनलैंड पर थी। ट्रंप का कहना था कि आर्कटिक में रूस और चीन की बढ़ती मौजूदगी के बीच ग्रीनलैंड अमेरिका की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। ट्रंप तो ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने की मांग तक कर चुके थे। लेकिन अब कहानी में बड़ा मोड़ आ गया। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान अमेरिका डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने एक त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए और इस समझौते का मतलब ग्रीनलैंड का अमेरिका में विलय नहीं। ग्रीनलैंड डेनमार्क के साम्राज्य के भीतर एक स्वायत क्षेत्र बना रहेगा। लेकिन इसके बदले अमेरिका को ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी काफी बढ़ाने का रास्ता मिल गया है। सबसे पहले अगर इस समझौते की बात कर लें तो अमेरिका ग्रीनलैंड में गोल्डन डोम मिसाइल डिफेंस सिस्टम स्थापित कर सकता है। यह सिस्टम अमेरिका की तरफ आने वाले बैलेस्टिक मिसाइल खतरों से सुरक्षा के लिए बनाया जा रहा है। इसके अलावा अमेरिका को ग्रीनलैंड में दो और सैन्य साइट्स खोलने की अनुमति का रास्ता मिला है। इनमें से एक नजा स्वार्क है जो कभी अमेरिकी सैन्य एयरबेस से रह चुका है। दूसरा है मेस्टर्स विंग जहां फिलहाल डेनमार्क की स्पेशल फोर्स यूनिट की गतिविधियां होती हैं।
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ध्यान देने वाली बात यह है कि अमेरिका की ग्रीनलैंड में पहले से ही एक बड़ी सैनी मौजूदगी है। वहां पिटोफिक स्पेस बेस मौजूद है जो अमेरिका के लिए अंतरिक्ष और मिसाइल निगरानी के लिहाज से बेहद अहम है। और अब इस नए समझौते के बाद अमेरिका भविष्य में और सैन्य सुविधाओं की मांग कर सकता है। हालांकि इसके लिए आपसी सहमति जरूरी होगी। अब एक सवाल कि आखिरकार अमेरिका को ग्रीनलैंड में इतनी दिलचस्पी क्यों है? इसके लिए ग्रीनलैंड की लोकेशन को समझना जरूरी है। ग्रीनलैंड उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच आर्कटिक में स्थित है। यह इलाका रूस के बेहद करीब है और आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की गतिविधियां बढ़ने के बीच अमेरिका इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानता है। इसके अलावा ग्रीनलैंड प्राकृतिक संसाधन और खनिजों से समृद्ध है और यही वजह है कि अमेरिका वहां रूस और चीन की सैन्य या रणनीतिक मौजूदगी को लेकर चिंतित है। नए समझौते में यह भी तय किया गया कि नेटो से बाहर के देशों को ग्रीनलैंड में सैन्य ठिकाने स्थापित करने की इजाजत नहीं होगी। इसके साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों जैसे महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर और प्राकृतिक संसाधन की निकासी में कुछ विदेशी निवेश पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। यानी अमेरिका की चिंता सिर्फ सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं है। ग्रीनलैंड में चीन या रूस जैसे देशों के रणनीतिक और आर्थिक प्रभाव को रोकना इस समझौते का अहम हिस्सा है।
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वहीं समझौते पर हस्ताक्षर के बाद ट्रंप ने इसे अमेरिकी सुरक्षा के लिहाज से अहम बताया। ट्रंप ने कहा कि यह समझौता लंबे समय से चल रही कोशिशों का नतीजा है और अब अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड मिलकर काम करेंगे। यूएन में अपने संबोधन के दौरान भी ट्रंप ने यह कहा कि इस समझौते से ग्रीनलैंड की सुरक्षा और वहां की दूसरी जरूरत पर अमेरिका को परमानेंट कंट्रोल मिलेगा। ट्रंप ने साफ किया कि अमेरिका नहीं चाहता कि उसका कोई प्रतिद्वंदी ग्रीनलैंड में सैन्य मौजूदगी बनाए। या संवेदनशील क्षेत्रों में ऐसा निवेश करें जिससे उसे रणनीतिक प्रभाव हासिल हो सके और इसके बाद ट्रंप ने वह बात भी कही जो बताती है कि अमेरिका ग्रीनलैंड में कितनी बड़ी सैन्य मौजूदगी चाहता है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका जल्द ही ग्रीनलैंड में बड़ी सैन्य मौजूदगी विकसित करने की प्रक्रिया शुरू करेगा और दो बड़े सैन्य ठिकाने बनाए जाएंगे। करीब 75 साल पहले ग्रीनलैंड की रक्षा को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच समझौता हुआ था और अब उससे भी बड़ा समझौता किया जा रहा है। फ्रेडरिकन ने इसे ऐसा समझौता बताया जो हमेशा तक चल सकता है। उन्होंने कहा कि इससे अमेरिका, ग्रीनलैंड, डेनमार्क और नेटो की साझा सुरक्षा मजबूत होगी।
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