यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025 के करीब 100 चयनित ओबीसी अभ्यर्थियों को तब तगड़ा झटका लगा जब उन्हें कई दिनों के इंतजार के बाद भी अपॉइंटमेंट लेटर नहीं मिला। उनका नाम सर्विस लिस्ट में नहीं आया।
परीक्षा पास की लेकिन नियुक्ति नहीं मिली
सतेज जैसे अभ्यर्थी सालों की कड़ी मेहनत से यूपीएससी में पास हुए। वे परीक्षा पास कर चुके थे और नियुक्ति के लिए अनुशंसित भी किए गए थे। समस्या बाद में सामने आई जब सर्विस आवंटन के लिए उनके OBC नॉन-क्रीमी लेयर स्टेटस की जांच हुई।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार कई सफल अभ्यर्थियों के माता-पिता PSU, बैंक या अन्य संस्थानों में काम करते थे। चूंकि उनके माता-पिता के पदों की सरकारी पदों के साथ समकक्षता औपचारिक रूप से तय नहीं की गई थी इसलिए कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने आय/संपत्ति संबंधी मानदंड लागू किया और इन अभ्यर्थियों को क्रीमी लेयर में माना। इसके कारण उन्हें OBC आरक्षण के तहत सर्विस अलोकेशन में शामिल नहीं किया ग
इस मामले में सरकार के फैसले के खिलाफ छात्रों ने पहले केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण और बाद में हाईकोर्ट गए। इस मामले में दिल्ली, केरल और मद्रास हाईकोर्ट ने छात्रों के हक में फैसला दिया था। इसके खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या बदला
11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहिथ नाथन एवं अन्य मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता की सैलरी या आय को अकेले आधार बनाकर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई OBC अभ्यर्थी क्रीमी लेयर में आता है या नहीं। इसके लिए माता-पिता के पद की स्थिति और श्रेणी को भी ध्यान में रखना होगा।
विवाद की जड़ 1993 के डीओपीटी ऑफिस मेमोरेंडम और 2004 में जारी एक स्पष्टीकरण से जुड़ी है। मूल व्यवस्था में संबंधित आय/संपत्ति परीक्षण के संदर्भ में वेतन और कृषि आय को बाहर रखा गया था। लेकिन 2004 के स्पष्टीकरण के बाद PSU और निजी क्षेत्र में काम करने वाले अभिभावकों की सैलरी को भी क्रीमी लेयर तय करने में ध्यान में रखा जाने लगा, खासकर तब जब उनके पदों की सरकारी पदों से समानता औपचारिक रूप से तय नहीं हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस व्यवस्था से सरकारी और PSU/निजी क्षेत्र के समान स्थिति वाले कर्मचारियों के बच्चों के साथ असमान व्यवहार हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि सरकार द्वारा पदों की समानता तय नहीं किए जाने की वजह से अभ्यर्थियों को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।
कोर्ट ने प्रभावित अभ्यर्थियों के दावों पर दोबारा विचार करने और छह महीने के भीतर प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया। जरूरत पड़ने पर गलत तरीके से बाहर किए गए अभ्यर्थियों को नियुक्त करने के लिए सुपरन्यूमरेरी पोस्ट यानी अतिरिक्त पद बनाने का निर्देश भी दिया गया।
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से मांगा स्पष्टीकरण
केंद्र सरकार के DoPT की नई याचिका का मुख्य फोकस सिविल सेवा परीक्षा 2025 है। बात यह है कि CSE-2025 परीक्षा का रिजल्ट 11 मार्च के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पांच दिन पहले घोषित हो चुका था। अब यदि फैसले को उस चयन प्रक्रिया पर सीधे लागू किया गया, तो श्रेणी के अनुसार मेरिट और सर्विस के बंटवारे को फिर से दोबारा आमूल चूल प्रभावित करने की स्थिति बन सकती है। ऐसे में उसने शीर्ष अदालत से गाइडलाइन मांगी है और यह स्पष्ट करने की मांग की है कि फैसले को पहले से काफी हद तक पूरी हो चुकी CSE-2025 के परिणामों के साथ किस तरह लागू किया जाए?
8 लाख से अधिक वार्षिक आय वाले क्रीमी लेयर में
क्रीमी लेयर शब्द का इस्तेमाल ओबीसी समुदाय के उन लोगों के लिए किया जाता है, जो आर्थिक व सामाजिक रूप से काफी समृद्ध हो चुके हैं। क्रीमी लेयर अवधारणा की शुरुआत 1992 के प्रसिद्ध इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार मामले के बाद हुई थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को तो बरकरार रखा था, लेकिन संपन्न वर्ग को इससे बाहर रखने का आदेश दिया था। इसके बाद 1993 में सरकार ने इसे लागू करने के नियम बनाए थे। वर्तमान नियमों के अनुसार, यदि किसी ओबीसी परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है, तो उसे क्रीमी लेयर में माना जाता है। ऐसे उम्मीदवार सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के हकदार नहीं होते।
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