आजकल सोशल मीडिया पर घंटों स्क्रॉल करना आम बात हो गई है, लेकिन इसी आदत से जुड़े दो नए शब्द तेजी से चर्चा में हैं- डूमस्क्रॉलिंग (Doomscrolling) और ब्लूमस्क्रोलिंग (Bloomscrolling). खासकर Gen Z में यह ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है और इसका सीधा असर मेंटल हेल्थ पर पड़ सकता है. जानिए क्या है इन दोनों के बीच फर्क और क्यों अब लोग नेगेटिव स्क्रॉलिंग छोड़ पॉजिटिव कंटेंट की ओर बढ़ रहे हैं.
डूमस्क्रॉलिंग (Doomscrolling) और ब्लूमस्क्रोलिंग (Bloomscrolling). (फोटो- AI)
डूमस्क्रॉलिंग का मतलब है मोबाइल पर लगातार ऐसी खबरें या पोस्ट देखते रहना जो नेगेटिव हों. जैसे एक्सीडेंट, क्राइम, विवाद, बुरी खबरें या डर पैदा करने वाला कंटेंट. कई बार लोग सिर्फ अपडेट रहने के लिए सोशल मीडिया खोलते हैं, लेकिन धीरे-धीरे वही नेगेटिव खबरें देखते रहते हैं और घंटों निकल जाते हैं. एक्सपर्ट्स के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक ऐसा कंटेंट देखता रहता है तो दिमाग पर इसका असर पड़ सकता है. इससे स्ट्रेस, एंग्जायटी और ओवरथिंकिंग बढ़ने लगती है.
ब्लूमस्क्रोलिंग क्या है?
ब्लूमस्क्रोलिंग को डूमस्क्रॉलिंग का पॉजिटिव वर्जन माना जाता है. इसमें लोग जानबूझकर ऐसा कंटेंट देखते हैं जो उन्हें अच्छा फील कराए. जैसे मोटिवेशनल वीडियो, नेचर क्लिप, क्यूट पेट वीडियो, इंस्पायरिंग स्टोरी या पॉजिटिव न्यूज. ऐसे कंटेंट से दिमाग को थोड़ा रिलैक्स महसूस होता है और मूड भी बेहतर हो सकता है. कई मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि पॉजिटिव कंटेंट देखने से दिमाग में “फील-गुड” केमिकल एक्टिव होते हैं, जिससे मन हल्का महसूस करता है.
Gen Z में क्यों बढ़ रहा है ये ट्रेंड
Gen Z वो जनरेशन है जो स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के साथ ही बड़ी हुई है. इंस्टाग्राम रील्स, शॉर्ट वीडियो और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन की वजह से लोग अनजाने में काफी देर तक फोन पर लगे रहते हैं. ऐसे में कई युवा अब अपने सोशल मीडिया फीड को थोड़ा पॉजिटिव बनाने की कोशिश कर रहे हैं. वे ऐसे अकाउंट फॉलो करते हैं जो मोटिवेशन, हेल्थ, फिटनेस या पॉजिटिव लाइफस्टाइल से जुड़े होते हैं.
मेंटल हेल्थ के लिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट
मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि सोशल मीडिया खुद समस्या नहीं है, बल्कि उसे इस्तेमाल करने का तरीका ज्यादा मायने रखता है. अगर कोई व्यक्ति लगातार नेगेटिव खबरों में उलझा रहता है तो उसका असर मूड और सोच पर पड़ सकता है. वहीं अगर कंटेंट थोड़ा पॉजिटिव और बैलेंस्ड हो तो सोशल मीडिया इंस्पिरेशन और सीखने का जरिया भी बन सकता है. इसलिए जरूरी है कि लोग अपने स्क्रीन टाइम पर ध्यान दें. सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें, लेकिन जरूरत से ज्यादा नहीं. अगर फीड में पॉजिटिव कंटेंट बढ़ाया जाए और नेगेटिव चीजों से दूरी रखी जाए, तो डिजिटल लाइफ भी ज्यादा हेल्दी और बैलेंस्ड बन सकती है और इससे आपकी मेंटल हेल्थ भी सही रहती है.
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विविधा सिंह न्यूज18 हिंदी (NEWS18) में पत्रकार हैं. इन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में बैचलर और मास्टर्स की डिग्री हासिल की है. पत्रकारिता के क्षेत्र में ये 3 वर्षों से काम कर रही हैं. फिलहाल न्यूज18…और पढ़ें
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