आज ईरान-अमेरिका जंग को पूरे 88 दिन हो गए. दोहा में एक तरफ अमेरिकी और ईरानी वार्ताकार शांति समझौते की बारीकियों पर उलझ रहे हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने दक्षिणी ईरान में मिसाइल ठिकानों और माइन बिछा रही नौकाओं पर नए हमले कर दिए हैं. ईरान का कहना है कि अमेरिका ने ‘युद्धविराम का उल्लंघन’ किया और वो इसका ‘भारी जवाब’ देने को तैयार . होर्मुज स्ट्रेट अभी भी बंद है, तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास मंडरा रही हैं और IMF ने चेतावनी दे दी है कि अगर जंग लंबी खिंची तो दुनिया मंदी की चपेट में आ सकती है. आइए समझते हैं, पिछले तीन महीनों में इस जंग ने दुनिया का नक्शा कैसे बदल डाला…
28 फरवरी: जब रातों-रात बदल गया सब कुछ
28 फरवरी 2026 को अमेरिकी और इजराइली लड़ाकू विमानों ने मिलकर ईरान पर हमला कर दिया. रॉकेट, मिसाइलें और ड्रोन तेहरान, करमानशाह, तबरेज, क़ोम और इस्फ़हान जैसे बड़े शहरों पर एक साथ बरसने लगे. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर खुद ऐलान किया, ‘हमने ईरान पर बड़ा सैन्य अभियान शुरू कर दिया है.’ व्हाइट हाउस का तर्क था कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल प्रणाली अमेरिकी सुरक्षा के लिए सीधा खतरा बन चुकी थी.
लेकिन जिसे ट्रंप ‘एक छोटी और विजयी जंग’ समझ रहे थे, वो तीन महीने में एक ऐसे क्षेत्रीय तूफान में बदल गई जिसने तेल की सप्लाई चेन से लेकर आम आदमी की रसोई तक सबकी कमर तोड़कर रख दी. BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान की राजधानी तेहरान के डाउनटाउन इलाके में तीन बड़े धमाके हुए थे, जिनकी आवाज कई किलोमीटर दूर तक सुनाई दी.
ईरान ने दिया मुंहतोड़ जवाब
ईरान भी चुप बैठने वालों में से नहीं था. उसकी एलीट रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने तुरंत पलटवार किया और बहरीन, जॉर्डन, कतर, कुवैत, UAE और सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें और ड्रोन दागे. अमेरिकी रक्षा विभाग के मुताबिक, अमेरिका अब तक 10,000 से ज्यादा ईरानी सैन्य ठिकानों को निशाना बना चुका है, जबकि इजरायल ने 3,000 से ज्यादा टारगेट हिट किए हैं. दूसरी तरफ, ईरान का दावा है कि वो अब तक 87 से ज्यादा बार जवाबी हमले कर चुका है.
इस जंग ने लेबनान, यमन, इराक, सीरिया और पूरे खाड़ी इलाके को अपनी चपेट में ले लिया. अल जजीरा के मुताबिक, 20 मई 2026 तक अकेले ईरान में 3,468 लोग मारे जा चुके थे और 26,500 से ज्यादा घायल हो चुके थे. लेबनान में 3,042 लोगों की मौत हुई और 9,300 से ज्यादा जख्मी हुए. इजरायल में 26, अमेरिका के 13 सैनिक और खाड़ी देशों में 12 से ज्यादा लोगों की जान गई.
होर्मुज की नाकेबंदी और तेल की बौखलाई कीमतें
इस जंग का सबसे बड़ा और तुरंत दिखने वाला असर होर्मुज स्ट्रेट पर पड़ा. ये एक संकरा सा समुद्री रास्ता है, लेकिन दुनिया का करीब 20% समुद्री तेल इसी से होकर गुजरता है. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के मुताबिक, 2025 की पहली छमाही में इस रास्ते से रोजाना करीब 2.09 करोड़ बैरल तेल गुजरता था.
ईरान ने जंग के शुरुआती दिनों में ही इस रास्ते पर नाकेबंदी कर दी, जिसके बाद तेल की सप्लाई चेन पूरी तरह से गड़बड़ा गई. ट्रेड इंटेलिजेंस फर्म Kpler के आंकड़ों के मुताबिक, 1 मार्च से 23 मार्च के बीच होर्मुज से सिर्फ 144 कमर्शियल जहाज गुजरे, जो जंग से पहले के मुकाबले 95% की भारी गिरावट थी. नतीजतन, ब्रेंट क्रूड का भाव अप्रैल के आखिर में 138 डॉलर प्रति बैरल तक उछल गया. फिलहाल, 27 मई को ये 100 डॉलर के आसपास मंडरा रहा है. EIA के मुताबिक, अप्रैल में इराक, सऊदी अरब, कुवैत, UAE, कतर और बहरीन का करीब 1.05 करोड़ बैरल प्रतिदिन का उत्पादन ठप रहा.
भारत के लिए ‘परफेक्ट स्टॉर्म’
भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, इस जंग की चपेट में सबसे बुरी तरह आया. होर्मुज की नाकेबंदी ने भारत की सप्लाई लाइन को सीधे तौर पर हिट किया. विवश होकर, भारतीय रिफाइनरियों ने अफ्रीका और लैटिन अमेरिका का रुख किया और नाइजीरिया, अंगोला, ब्राजील और वेनेजुएला से तेल खरीदना शुरू कर दिया. इतना ही नहीं, अमेरिका से एक अस्थायी छूट मिलने के बाद भारत ने सात साल बाद पहली बार ईरान से सीधे क्रूड खरीदना भी शुरू कर दिया. लेकिन इससे राहत नहीं मिली.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की बढ़ती कीमतों का बोझ आखिरकार आम भारतीय उपभोक्ता पर आ ही गया. सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) ने मई 2026 में पेट्रोल और डीजल के दामों में लगातार चौथी बार बढ़ोतरी की. दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये प्रति लीटर और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गया. ONGC की निदेशक (अन्वेषण) सुषमा रावत ने ANI को बताया, ‘सरकार ने 75 दिनों तक जनता को राहत दी, इस दौरान कीमत नहीं बढ़ाई गई. लेकिन तेल कंपनियों को हर दिन करीब 1,000 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा था. कब तक इसे झेला जाता?’
महंगे तेल ने रुपये की भी कमर तोड़ दी. जंग शुरू होने के बाद से डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हुआ है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2026 में अब तक रुपया 7% से ज्यादा लुढ़क चुका है और 27 मई को ये 95.75 के स्तर पर पहुंच गया. एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये जल्द ही 100 के पार जा सकता है.
बिखरती दुनिया: NATO में दरार, चीन का फायदा
इस जंग ने दुनिया के देशों को एक बार फिर दो खेमों में बांट दिया है. एक तरफ अमेरिका है, जिसे अपने NATO सहयोगियों से खुला समर्थन मिलने की उम्मीद थी, लेकिन हुआ इसके ठीक उलट. फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन और पोलैंड जैसे ताकतवर यूरोपीय देशों ने इस जंग में अमेरिका का साथ देने से साफ इनकार कर दिया. स्पेन ने तो अमेरिकी लड़ाकू विमानों को अपना एयरस्पेस इस्तेमाल करने तक की इजाजत नहीं दी. इस नाराजगी के चलते ट्रंप प्रशासन इन ‘नाकारा’ सहयोगियों के खिलाफ कार्रवाई तक की धमकी दे चुका है.
दूसरी तरफ चीन और रूस हैं. चीन, जो पहले से ही ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, उसे इस संकट में भी फायदा होता दिख रहा है. वो लगातार ईरान से भारी डिस्काउंट पर तेल खरीद रहा है और युआन या बार्टर सिस्टम के जरिए भुगतान करके डॉलर की सर्वोच्चता को चुनौती दे रहा है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये जंग जितनी लंबी खिंचेगी, चीन की सौदेबाजी की ताकत उतनी ही बढ़ेगी.
अर्थव्यवस्था पर ब्रेक और मंदी का डर
इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) ने अप्रैल में चेतावनी दी थी कि अगर ये जंग और लंबी चली, तो दुनिया मंदी के दौर में जा सकती है. अपने सबसे आशावादी अनुमान में भी IMF ने 2026 के लिए ग्लोबल ग्रोथ का अनुमान घटाकर 3.1% कर दिया है. लेकिन दूसरी तस्वीर में, ग्लोबल ग्रोथ 2% तक गिर सकती है और महंगाई दर 6% से ऊपर जा सकती है.
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) का कहना है कि जंग के दौरान 80 से ज्यादा एनर्जी फैसिलिटी डैमेज हो चुके हैं और इनकी रिकवरी में 2 साल तक का समय लग सकता है. IEA ने ये भी चेतावनी दी है कि अगर जंग अगले महीने खत्म भी हो जाती है, तब भी तेल बाजार अक्टूबर 2026 तक ‘गंभीर रूप से अंडरसप्लाइड’ रहेगा.
IMF के मुताबिक, अकेले ईरान की GDP इस साल 6.1% तक सिकुड़ सकती है. वहीं, कतर (8.6%), इराक (6.8%), कुवैत (0.6%) और बहरीन (0.5%) जैसे खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी बुरा असर पड़ने का अनुमान है.
एक नाजुक समझौता या महाविनाश की ओर?
विदेश मामलों के जानकार और NEHU के प्रोफेसर डॉ. प्रसेनजीत बिस्वास कहते हैं, ’87 दिनों के इस संघर्ष के बाद, अब दोनों तरफ से शांति की कोशिशें तेज हैं. कतर की राजधानी दोहा में एक नाजुक समझौते पर बातचीत चल रही है, जिसके तहत होर्मुज स्ट्रेट को धीरे-धीरे खोला जाएगा और अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटाएगा. बदले में ईरान को अपने अरबों डॉलर की फ्रोजन संपत्ति तक पहुंच मिलेगी और सीमित तेल निर्यात की इजाजत दी जाएगी. सबसे अहम मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम है, जिसमें तेहरान 60 दिनों के भीतर अपना अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम सरेंडर कर सकता है.’
27 मई 2026 को अमेरिकी सेना ने दक्षिणी ईरान में एक बार फिर ‘डिफेंसिव अटैक’ किए, जिसमें मिसाइल लॉन्च साइट्स और माइन बिछाने वाली नौकाओं को निशाना बनाया गया. ईरान ने इसे ‘युद्धविराम का खुला उल्लंघन’ बताते हुए कड़ा जवाब देने की चेतावनी दी है.
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत दौरे के दौरान कहा कि ‘डील होने में अभी कुछ दिन और लग सकते हैं.’ वहीं, ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई का कहना है कि ‘घड़ी की सुइयां पीछे नहीं घुमाई जा सकतीं.’ ट्रंप ने खुद सोशल मीडिया पर लिखा, ‘या तो एक अच्छी डील होगी या फिर हमें इससे दूसरे तरीके से निपटना होगा.’
दुनिया सांस थामे देख रही है. ये जंग, जिसने तेल के मोल और दुनिया के बंटवारे की असलियत दिखा दी है, आखिर किस मोड़ पर जाकर थमेगी? फिलहाल इस सवाल का जवाब होर्मुज की लहरों में ही छिपा है.
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