क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की कहानी आजादी के बाद के सिकंदराबाद की पृष्ठभूमि पर आधारित है। जादल (नानी) और उसकी मां शमक्का (सोनाली कुलकर्णी) एक बेहद शोषित और हाशिए पर धकेले गए कबीले से ताल्लुक रखते हैं। इस कबीले पर स्थानीय सामंत मलिक (मोहन बाबू) का क्रूर और अमानवीय शासन है। कबीले के लोगों से उनकी मूलभूत पहचान, सम्मान और आजादी छीन ली गई है। कहानी में मुख्य मोड़ तब आता है जब किशोरावस्था में जादल की मां को सरेआम अपमानित किया जाता है। इस घटना से उपजा गुस्सा जादल के जीवन का मुख्य उद्देश्य बन जाता है। जैसे-जैसे जादल बड़ा होता है, उसकी निजी बदले की लड़ाई पूरे कबीले को सामंती दमन से आजाद कराने के ‘मसीहा’ वाले मिशन में बदल जाती है।
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निर्देशन और स्क्रीनप्ले: बिखराव और लॉजिक की कमी
फिल्म ‘द पैराडाइज़’ में सबसे बड़ी कमी इसका निर्देशन और स्क्रीनप्ले का बिखराव है, जिसके कारण कहानी दर्शकों को अपने साथ जोड़ने में पूरी तरह विफल रहती है। निर्देशक श्रीकांत ओडेला ने फिल्म को ‘वॉम्ब ऑफ स्कार्स’ और ‘वॉम्ब ऑफ वॉर’ जैसे भारी-भरकम और आकर्षक अध्यायों (Chapters) में विभाजित तो किया है, लेकिन यह प्रयोग फिल्म को एक सुसंगत ढांचा देने के बजाय उसे और अधिक दिशाहीन तथा बिखरा हुआ बना देता है।
स्क्रीनप्ले में गहराई और भावनात्मक प्रवाह की जगह अत्यधिक और अनावश्यक हिंसा को दे दी गई है। शोषित कबीले की पीड़ा और सामाजिक असमानता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, कहानी बार-बार अमानवीय और क्रूर दृश्यों में उलझकर रह जाती है। गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं पर होने वाले अत्याचारों को जिस तरह बार-बार स्क्रीन पर दिखाया गया है, वह कहानी को कोई सिनेमाई मजबूती प्रदान नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे एक ‘टॉर्चर पोर्न’ जैसा रूप ले लेता है जो दर्शकों को सिर्फ असहज करता है।
इसके अलावा, फिल्म में तार्किकता और लॉजिक की भारी कमी साफ झलकती है। एक तरफ जहां निर्देशक एक बहुत ही कठोर, वास्तविक और क्रूर दुनिया रचने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ एक्शन दृश्यों में भौतिकी और गुरुत्वाकर्षण के नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं। कहानी में कई तरह के परस्पर विरोधी विषयों—जैसे सामंतवाद, व्यक्तिगत बदला, पूरे कबीले के लिए ‘मसीहा’ बनना और कानूनी व्यवस्था से लड़ाई—को एक साथ ठूंसने की कोशिश की गई है। इस अति-उत्साह के चक्कर में किसी भी एक विषय या भावना को उभरने का पर्याप्त समय नहीं मिलता।
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तकनीकी स्तर पर भी पटकथा में भारी ढिलाई दिखती है; उदाहरण के लिए, मुख्य किरदार के कुत्ते वाले सीन्स में घटिया AI तकनीक का इस्तेमाल और गंभीर भावनात्मक दृश्यों में बैकग्राउंड की लापरवाही यह साबित करती है कि ओडेला के पास एक बड़ा विजन तो था, लेकिन वे उसे एक लॉजिकल, कड़ाकेदार और प्रभावकारी स्क्रीनप्ले में बदलने में बुरी तरह चूक गए।
अभिनय और संगीत: नानी और अनिरुद्ध का प्रयास
फिल्म ‘द पैराडाइज़’ में यदि कोई पहलू इसे पूरी तरह बिखरने से बचाता है और दर्शकों को बांधे रखने का काम करता है, तो वह नानी का सधा हुआ अभिनय और अनिरुद्ध रविचंदर का धमाकेदार बैकग्राउंड म्यूजिक है। ‘नैचुरल स्टार’ नानी ने ‘जादल’ के अपने इस सबसे आक्रामक और जटिल किरदार में खुद को पूरी तरह झोंक दिया है। वे परदे पर जब भी आते हैं, अपनी जबरदस्त स्क्रीन प्रेजेंस, संवाद अदायगी और आंगिक अभिनय से दृश्य में जान फूंक देते हैं। एक शोषित पुत्र से लेकर पूरे कबीले का ‘मसीहा’ बनने तक के भावनात्मक और शारीरिक परिवर्तन को उन्होंने बहुत ही ईमानदारी से जिया है। लेकिन त्रासदी यह है कि एक अभिनेता के तौर पर उनका यह शानदार प्रयास एक बेहद कमजोर, दिशाहीन और ढीली पटकथा की बलि चढ़ जाता है; एक बिखरी हुई कहानी को सिर्फ अपने दम पर खींच पाना नानी जैसे मंझे हुए कलाकार के लिए भी मुमकिन नहीं हो पाया।
संगीत पक्ष की बात करें तो अनिरुद्ध रविचंदर का बैकग्राउंड स्कोर (BGM) कई दृश्यों में कमाल का रोमांच पैदा करता है और सिनेमाघरों में एक अलग ही ऊर्जा भर देता है। खासकर एक्शन और हीरो-इंट्रोडक्शन सीन्स में उनका संगीत फिल्म के गिरते स्तर को उठाने की पूरी कोशिश करता है। हालांकि, समस्या यह आती है कि जब स्क्रीनप्ले में ही भावनाएं और लॉजिक गायब हों, तो सिर्फ तेज और प्रभावशाली संगीत भी लंबे समय तक दर्शकों को जोड़कर नहीं रख पाता।
वहीं दूसरी ओर, नानी को छोड़कर बाकी के कलाकारों को पटकथा में इतना कम स्पेस दिया गया है कि वे फिल्म में कोई खास वजन नहीं जोड़ पाते। मुख्य खलनायक ‘मलिक’ के रूप में दिग्गज अभिनेता मोहन बाबू के पास करने के लिए लगभग कुछ नहीं था; नानी के साथ उनका कोई ऐसा बड़ा या रोंगटे खड़े कर देने वाला आमना-सामना नहीं हो पाता जो किसी बड़े कमर्शियल ड्रामा की जान होता है। सोनाली कुलकर्णी ने मां ‘शमक्का’ के भावुक रोल में अपनी तरफ से बेहतरीन काम किया है और नानी के साथ उनका रिश्ता फिल्म की थोड़ी-बहुत इमोशनल रीढ़ बनता है। हालांकि, राघव जुयाल और कायडू लोहार जैसे किरदार सिर्फ नाममात्र के लिए शामिल लगते हैं और उनका प्रदर्शन एक विशालकाय कहानी में पूरी तरह बेअसर साबित होता है।
अंतिम फैसला
‘द पैराडाइज़’ में कुछ रचनात्मक विचार जरूर देखने को मिलते हैं, जैसे शोषित कबीले की सामाजिक स्थिति को दर्शाने वाले शुरुआती सीन। हालांकि, लगभग तीन घंटे की यह फिल्म अत्यधिक खून-खराबे, कमजोर विलेन और बिखरी हुई पटकथा के कारण एक निराशाजनक अनुभव बनकर रह जाती है। नानी के प्रशंसकों के लिए उनका अभिनय देखने लायक है, लेकिन कुल मिलाकर यह फिल्म निर्देशक श्रीकांत ओडेला के लिए एक गंवाया हुआ मौका नजर आती है।
रेटिंग: 2.5/5 स्टार
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