टाटा समूह के भीतर नेतृत्व और कंपनी के संचालन को लेकर चल रहे विवाद के बीच राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एसपी) के प्रमुख शरद पवार ने टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका को लेकर अपनी बात रखी है। पवार ने कहा है कि टाटा समूह की पुरानी सामाजिक सोच और संस्थागत व्यवस्था को बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने टाटा ट्रस्ट्स को मिले अधिकारों का कंपनी के फैसलों में सम्मान किए जाने की बात कही है।
शरद पवार ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर मराठी भाषा में एक संदेश शेयर किया है। इसमें उन्होंने टाटा समूह की विरासत और उसके सामाजिक कामकाज का जिक्र किया है। पवार के मुताबिक, जमशेदजी टाटा और टाटा परिवार ने कारोबार को केवल मुनाफे तक सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज के लिए काम करने की सोच को भी महत्व दिया है। उनका कहना है कि इसी वजह से टाटा ट्रस्ट्स की संस्थागत भूमिका को सुरक्षित रखना जरूरी है।
यह बयान ऐसे समय आया है, जब टाटा सन्स के निदेशक मंडल के हालिया फैसलों को लेकर टाटा ट्रस्ट्स और कंपनी के बीच मतभेद खुलकर सामने आए हैं। 17 सितंबर को हुई बैठक में निदेशक मंडल ने एन. चंद्रशेखरन को टाटा सन्स के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में एक और पांच साल के लिए बनाए रखने का फैसला किया था। मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में पूरा होना है। बोर्ड में प्रस्ताव के पक्ष में चार मत पड़े, जबकि टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा ने इसके खिलाफ मतदान किया था।
मौजूद जानकारी के अनुसार, इसी बैठक में टाटा सन्स को शेयर बाजार में लिस्टिंग करने की दिशा में भी आगे बढ़ने का फैसला किया गया है। भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से टाटा सन्स को लिस्टिंग करने से जुड़े नियमों के कारण यह मुद्दा पहले से चर्चा में है। कंपनी के बोर्ड के फैसलों पर अंतिम प्रक्रिया और शेयरधारकों की भूमिका आगे महत्वपूर्ण रहने वाली है।
शरद पवार ने अपने संदेश में टाटा ट्रस्ट्स की हिस्सेदारी का भी उल्लेख किया है। सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट समेत संबंधित ट्रस्ट्स के पास टाटा सन्स में करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। टाटा समूह की यह व्यवस्था सामान्य कारोबारी कंपनियों से अलग है, क्योंकि ट्रस्ट्स से जुड़ा धन लंबे समय से शिक्षा, स्वास्थ्य, शोध और कला जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली संस्थाओं को समर्थन देता रहा है।
इन संस्थाओं में मुंबई का टाटा मेमोरियल अस्पताल, टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान, टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान और राष्ट्रीय प्रदर्शन कला केंद्र शामिल हैं। पवार ने कहा है कि टाटा ट्रस्ट्स की सामाजिक प्रतिबद्धता और संस्थागत भूमिका को बनाए रखना देश और महाराष्ट्र के विकास से भी जुड़ा विषय है।
गौरतलब है कि चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर टाटा ट्रस्ट्स ने अलग रुख अपनाया है। ट्रस्ट्स का कहना है कि टाटा सन्स की नियमावली के तहत अध्यक्ष की नियुक्ति या दोबारा नियुक्ति के लिए ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों की जरूरी सहमति होनी चाहिए। ट्रस्ट्स के दो नामित निदेशकों में नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन शामिल हैं। 17 सितंबर की बैठक में नोएल टाटा ने प्रस्ताव का विरोध किया, जबकि वेणु श्रीनिवासन ने समर्थन किया था।
टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले की वैधता पर भी सवाल उठाया है। ट्रस्ट्स का कहना है कि दोनों नामित निदेशकों की अलग-अलग राय होने की स्थिति में अध्यक्ष की दोबारा नियुक्ति से जुड़ा प्रस्ताव नियमों के मुताबिक मान्य नहीं माना जा सकता। ट्रस्ट्स ने इस मामले में पूर्व प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ से मिली कानूनी राय का भी उल्लेख किया है।
दूसरी ओर, टाटा सन्स ने अपने बोर्ड के फैसले को बहुमत से पारित बताया है। कंपनी की ओर से कहा गया है कि चंद्रशेखरन ने बोर्ड के अनुरोध पर अपने पहले के फैसले पर दोबारा विचार किया और फिर उन्हें अगले पांच साल के लिए अध्यक्ष बनाए जाने का प्रस्ताव मंजूर किया गया।
बता दें कि टाटा समूह में ट्रस्ट्स की भूमिका लंबे समय से उसकी पहचान का अहम हिस्सा रही है। यही वजह है कि मौजूदा विवाद केवल अध्यक्ष पद तक सीमित नहीं है, बल्कि कंपनी के संचालन, शेयरधारकों के अधिकार और टाटा समूह की भविष्य की संरचना से भी जुड़ा हुआ है। शरद पवार ने भी अपने बयान में इसी संस्थागत व्यवस्था और सामाजिक विरासत को बनाए रखने पर जोर दिया।
फिलहाल टाटा सन्स के बोर्ड के फैसलों और टाटा ट्रस्ट्स की आपत्तियों के बीच आगे की प्रक्रिया पर नजर बनी हुई है। आने वाले समय में शेयरधारकों की बैठक और कंपनी के नियमों से जुड़े कदम इस विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
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