क्लासरूम से वाशरूम तक पहुंचाते थे दोस्त
आकाश गुप्ता के जीवन का सफर चुनौतियों से भरा रहा है. वे बताते हैं कि बचपन में जब पोलियो ने उनके चलने की क्षमता छीन ली, तो उनके माता-पिता ने उन्हें घर से स्कूल तक पहुंचाया. लेकिन स्कूल के भीतर की चुनौती और भी बड़ी थी. उस दौर में स्कूलों में न तो रैम्प थे और न ही व्हीलचेयर की सुविधा. ऐसे में उनके स्कूल के दोस्त फरिश्ता बनकर सामने आए. आकाश भावुक होकर याद करते हैं कि कैसे उनके दोस्त उन्हें अपने कंधों पर उठाकर क्लासरूम तक ले जाते थे, और जरूरत पड़ने पर वॉशरूम तक पहुंचाने में भी संकोच नहीं करते थे. दोस्तों के इसी निस्वार्थ प्रेम और आकाश के अटूट जज्बे ने उन्हें पढ़ाई छोड़ने नहीं दी.
केंद्रीय विद्यालय में देते हैं स्पेशल शिक्षा
आज आकाश गुप्ता केंद्रीय विद्यालय में टीजीटी वर्क एक्सपीरियंस के पद पर तैनात हैं. वे बच्चों को सिर्फ किताबी थ्योरी नहीं पढ़ाते, बल्कि काम करके सीखना सिखाते हैं. आकाश बताते हैं कि वर्क एक्सपीरियंस विषय अब बदल चुका है. पहले जहाँ इसे सिर्फ क्राफ्ट और गार्डनिंग तक सीमित माना जाता था, आज इसमें रोबोटिक्स, गार्डेनिंग, क्राफ्टिंग,डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स और एनालॉग इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे आधुनिक विषय शामिल हैं. उन्होंने बताया कि केंद्रीय विद्यालय में यह पद TGT-Work Experience (TGT-WE) के नाम से होता है. इस विषय के शिक्षक कक्षा 6 से 12 तक के छात्रों को पढ़ाते हैं.
बीटेक (इलेक्ट्रिकल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स) की डिग्री रखने वाले आकाश अपनी तकनीकी समझ से बच्चों को मोटर, सर्किट और छोटी मशीनों की कार्यप्रणाली समझाते हैं. उनका मानना है कि जब बच्चा अपने हाथों से कोई सर्किट जोड़ता है या कोई मॉडल बनाता है, तो उसका आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है.
नई शिक्षा नीति से हो रहा सुधार
अपने शिक्षण अनुभव को साझा करते हुए आकाश कहते हैं कि जब उन्होंने करियर शुरू किया था, तब दिव्यांग शिक्षकों के लिए बुनियादी सुविधाएं बहुत कम थीं. लेकिन नई शिक्षा नीति 2020 आने के बाद स्थिति में काफी सुधार हुआ है. अब स्कूलों में सुगम्य भारत अभियान के तहत रैम्प, लिफ्ट और दिव्यांग-अनुकूल टॉयलेट्स अनिवार्य हो गए हैं, जिससे न केवल छात्रों बल्कि शिक्षकों के लिए भी राह आसान हुई है.
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