भारत में सूरी वंश के संस्थापक शेरशाह सूरी की 22 मई को मृत्यु हो गई थी। उन्होंने कई युद्ध लड़े और जीते। शेरशाह सूरी के युद्ध कौशल और बहादुरी के आगे मुगल नहीं टिक पाते थे। बताया जाता है कि पहले शेरशाह सूरी मुगल शासक बाबर के लिए एक सैनिक के रूप में काम करते थे। लेकिन कुछ सालों बाद उन्होंने सूरी वंश की स्थापना की और बाबर के बेटे हुमायूं के परास्त किया था। जिस कारण हुमायूं को भारत छोड़ना पड़ा था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर शेरशाह सूरी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में…
जन्म और परिवार
पंजाब के होशियारपुर शहर में बजवाड़ा नामक स्थान पर 1486 को शेरशाह सूरी का जन्म हुआ था। उनका असली नाम फरीद खां था और उनके दादा इब्राहिम खान सूरी नारनौल क्षेत्र में एक जागीरदार थे। बचपन में शेरशाह को उनकी सौतेली मां बहुत सताती थी, जिस कारण उन्होंने घर छोड़कर जौनपुर से पढ़ाई की थी।
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ऐसे बने शेरशाह सूरी
बताया जाता है कि कम उम्र में फरीद खां ने अकेले एक शेर का शिकार किया था। जिसके बाद उनका नाम शेरशाह पड़ा और सूरी नाम उनके गृहनगर से लिया गया था। जिसके बाद उनको शेरशाह सूरी कहा जाने लगा।
बाबर की सेना में सिपाही
साल 1518 में शेरशाह सूरी, बाबर के साथ चंदेरी के अभियान में गया था। बाबर की सेना में रहने के दौरान शेरशाह ने हिंदुस्तान की गद्दी पर बैठने का सपना संजो लिया था। बाद में बिहार के एक छोटे सरगना जलाल खां के दरबार में शेरशाह को उपनेता का काम मिल गया। वहीं बाबर के निधन के बाद हुमायूं बंगाल को जीतना चाहता था। जिसके बीच में शेरशाह सूरी का क्षेत्र पड़ता था। ऐसे में हुमायूं ने शेरशाह से लड़ने का मन बना लिया और तब तक बिहार के अलावा बंगाल पर भी सूरी का नियंत्रण हो चुका था।
साल 1537 में हुमायूं ने बंगाल जीतने के लिए सूरी पर हमला कर दिया। दोनों ओर की सेनाएं चौसा में एक दूसरे के सामने थीं। लड़ाई शुरू होने से पहले शेरशाह ने हुमायूं के पास एक दूत भेजा और उस दूत ने दोनों के बीत समझौता करवा दिया। इस समझौते में यह सुनिश्चित हुआ कि मुगल शासन के झंडे के नीचे बिहार और बंगाल पर शेरशाह सूरी का शासन रहेगा।
हुमायूं को हराया
वहीं 17 मई 1540 को एक बार फिर हुमायूं और शेरशाह की सेनाएं आमने-सामने आ गईं। हुमायूं की सेना में 40 हजार से ज्यादा सैनिक थे और शेरशाह की सेना में 15 हजार सिपाही थे। एक महीने तक दोनों सेनाएं बिना लड़े एक-दूसरे के आमने-सामने थीं। शेरशाह की सेना पर इसका असर नहीं हुआ, लेकिन हुमायूं की सेना का राशन-पानी खत्म होने लगा।
ऐसे में सैनिकों ने बिना लड़े हुमायूं का साथ छोड़ना शुरूकर दिया और देखते-देखते शेरशाह सूरी ने बिना युद्ध के जीत हासिल कर ली। इसके बाद शेरशाह ने हुमायूं को लाहौर खदेड़कर आगरा की सत्ता पर कब्जा कर लिया। आगरा से शेरशाह सूरी ने 5 सालों तक हिंदुस्तान पर शासन किया था।
मृत्यु
वहीं 1544 में शेरशाह ने कालिंजर के किले पर हमला करने की ठानी। वहीं 22 मई 1545 को उसने किले पर हमला बोल दिया। इस दौरान हमले में एक बम दीवार से टकराया और वापस आकर रखे बमों के ऊपर फट गया। इस कारण शेरशाह लगभग आधा जल गया था। लेकिन उसके आदेश पर हमला जारी रखा गया और अपनी जीत की खबर सुनते ही शेरशाह सूरी ने हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कर लीं।
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