ट्रिपल इंजन सरकार की अवधारणा का सबसे बड़ा लाभ वित्तीय समन्वय के रूप में सामने आया है। दिल्ली सरकार को अब पूंजीगत व्यय के लिए ऋण अपेक्षाकृत कम ब्याज दर पर उपलब्ध हो रहा है। पहले जहां ब्याज दर 13-14 प्रतिशत तक पहुंच जाती थी, वहीं अब लगभग सात प्रतिशत पर ऋण मिलना संभव हुआ है। केंद्र सरकार द्वारा 21 हजार करोड़ रुपये तक की ऋण सीमा निर्धारित किए जाने से आधारभूत ढांचे के विकास में धनाभाव की आशंका कम हुई है। यही नहीं, प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन तथा पीएम भीम योजना जैसी केंद्रीय योजनाओं की समयावधि बढ़वाने में भी दिल्ली सरकार को सफलता मिली है। आयुष्मान भारत जैसी जनकल्याणकारी योजना का लाभ अब राजधानी के अधिक से अधिक नागरिकों तक पहुंच रहा है, जिससे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा की ठोस गारंटी मिल रही है।
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स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार के संकेत अवश्य दिखाई दिए हैं। मोहल्ला क्लीनिक मॉडल पर उठे प्रश्नों और अधूरी स्वास्थ्य परियोजनाओं के बीच नई सरकार ने अस्पतालों के आधुनिकीकरण, बेड क्षमता बढ़ाने और डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। यदि यह प्रयास निरंतरता से जारी रहा तो दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी के अनुरूप विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी पारदर्शिता और गुणवत्ता सुधार का दावा किया गया है। पिछले वर्षों में शिक्षा मॉडल को लेकर जहां एक ओर प्रशंसा हुई, वहीं भवनों की गुणवत्ता, संसाधनों के उपयोग और परिणामों पर सवाल भी उठे। नई सरकार के लिए यह चुनौती है कि वह शिक्षा को राजनीतिक विमर्श से ऊपर उठाकर वास्तविक गुणवत्ता सुधार की दिशा में कार्य करे।
परिवहन और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी गति लाने का प्रयास हुआ है। मेट्रो नेटवर्क के विस्तार, बस बेड़े के आधुनिकीकरण और सड़कों के सुधार की योजनाएं केंद्र और राज्य के समन्वय से आगे बढ़ रही हैं। दिल्ली मेट्रो पहले से ही राजधानी की जीवनरेखा रही है, अब किराए में राहत या छात्रों के लिए विशेष प्रावधान जैसे कदम यदि लागू होते हैं तो इससे आम जनता को सीधा लाभ मिलेगा। यातायात जाम की समस्या के समाधान के लिए फ्लाईओवर, अंडरपास और स्मार्ट ट्रैफिक प्रबंधन प्रणाली पर ध्यान देना आवश्यक है। एक वर्ष में कुछ परियोजनाओं को गति मिली है, किंतु राजधानी जैसे विशाल महानगर में ठोस परिणामों के लिए निरंतर प्रयास अपेक्षित हैं।
सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरण और वायु प्रदूषण की है। बीते दशक में दिल्ली विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में गिनी जाने लगी। यह केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का संकट है। मुख्यमंत्री ने वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए ठोस योजनाओं का उल्लेख किया है-जैसे हरित आवरण बढ़ाना, निर्माण कार्यों पर निगरानी, सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहन और पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय। परंतु यह भी सत्य है कि प्रदूषण जैसी जटिल समस्या का समाधान केवल घोषणाओं से संभव नहीं, इसके लिए कठोर क्रियान्वयन, क्षेत्रीय सहयोग और जनसहभागिता की आवश्यकता होगी। यमुना की सफाई भी दिल्ली की अस्मिता से जुड़ा प्रश्न है। वर्षों से यमुना शुद्धिकरण के नाम पर योजनाएं बनती रहीं, बजट खर्च होता रहा, पर परिणाम संतोषजनक नहीं रहे। वर्तमान सरकार ने यमुना को स्वच्छ और पर्यटन योग्य बनाने का संकल्प दोहराया है। यदि सीवेज प्रबंधन, औद्योगिक अपशिष्ट नियंत्रण और नदी तट के पुनर्विकास की योजनाएं समयबद्ध तरीके से लागू होती हैं, तो यह दिल्ली की छवि को नया आयाम दे सकती हैं। यमुना का पुनर्जीवन केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक पुनरुत्थान का भी अवसर है।
महिलाओं और बेटियों के लिए घोषित योजनाएं-जैसे ‘लखपति बिटिया योजना’-सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में सकारात्मक कदम मानी जा सकती हैं। यदि इन योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्रों तक पारदर्शिता से पहुंचता है, तो यह परिवारों की आर्थिक सुरक्षा और शिक्षा के अवसरों को बढ़ा सकता है। मुफ्त एलपीजी सिलेंडर जैसी पहल घरेलू अर्थव्यवस्था में राहत देती है, विशेषकर निम्न आय वर्ग के लिए। किंतु इन योजनाओं की सफलता क्रियान्वयन की गुणवत्ता पर निर्भर करेगी। एक वर्ष की अवधि किसी भी सरकार के लिए बहुत बड़ी नहीं होती, विशेषकर तब जब उसे पिछली सरकारों की अधूरी परियोजनाओं और व्यवस्थागत खामियों को भी दुरुस्त करना हो। यह भी सच है कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच विकास का वास्तविक आकलन कठिन हो जाता है। नई सरकार ने पूर्ववर्ती शासन की कमियों-जैसे कथित भ्रष्टाचार, अधूरी इमारतें, प्रदूषण नियंत्रण में विफलता को सुधारने का दावा किया है। किंतु जनता अब केवल आरोप नहीं, परिणाम देखना चाहती है। आने वाले वर्षों के लिए सरकार के सामने स्पष्ट लक्ष्य होने चाहिए-स्वच्छ वायु, स्वच्छ यमुना, सुगम यातायात, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य और पारदर्शी प्रशासन। राजधानी होने के नाते दिल्ली को केवल भारत का प्रशासनिक केंद्र नहीं, बल्कि आदर्श शहरी मॉडल बनना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि बजट में आवंटित राशि का पूर्ण और पारदर्शी उपयोग हो, परियोजनाएं समयबद्ध पूरी हों और जनभागीदारी को प्रोत्साहन मिले।
ट्रिपल इंजन सरकार का वास्तविक अर्थ तभी सिद्ध होगा जब समन्वय का लाभ जमीन पर दिखाई दे। केंद्र और राज्य के बीच टकराव की राजनीति के स्थान पर सहयोग की भावना यदि कायम रहती है, तो दिल्ली विकास की नई ऊंचाइयों को छू सकती है। एक वर्ष में कुछ सकारात्मक संकेत अवश्य मिले हैं, परंतु अभी लंबी यात्रा शेष है। सरकार को अपनी उपलब्धियों का प्रचार करने के साथ-साथ कमियों का ईमानदार आत्ममंथन भी करना होगा। दिल्ली की जनता जागरूक है और अपेक्षाएं भी बड़ी हैं। वह केवल वादों से संतुष्ट नहीं होगी, उसे परिणाम चाहिए। यदि रेखा गुप्ता सरकार अपने संकल्पों को धरातल पर उतारने में सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में दिल्ली सचमुच एक स्वच्छ, स्वस्थ, सुरक्षित और आधुनिक महानगर के रूप में उभर सकती है। यही समय है जब बजट की घोषणाओं को विकास की वास्तविक कहानी में बदला जाए और राजधानी को समस्याओं के प्रतीक से समाधान के मॉडल में परिवर्तित किया जाए।
– ललित गर्ग
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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