रमज़ान का धार्मिक महत्व
इस्लामी मान्यता के अनुसार, रमज़ान वह महीना है जब पवित्र कुरआन का अवतरण पैगंबर मुहम्मद पर हुआ. यही वजह है कि इस महीने को रहमत, मग़फिरत और नजात का महीना कहा जाता है. रोज़ा, जिसे अरबी में “सौम” कहा जाता है, इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है. इसका मकसद सिर्फ शरीर को अनुशासित करना नहीं, बल्कि आत्मा को भी शुद्ध करना है. रोज़े के दौरान इंसान भूख और प्यास को महसूस कर जरूरतमंदों के दर्द को समझने की कोशिश करता है.
रोज़े के मुख्य नियम क्या हैं?
कौन रखे रोज़ा?
रमज़ान में हर बालिग, समझदार और शारीरिक रूप से सक्षम मुसलमान के लिए रोज़ा रखना फर्ज़ माना गया है. हालांकि, कुछ लोगों को छूट दी गई है जैसे बीमार व्यक्ति, गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं, सफर में रहने वाले लोग और मासिक धर्म के दौरान महिलाएं. बाद में वे छूटे हुए रोज़ों की क़ज़ा कर सकते हैं.
रोज़े का समय
रोज़ा फज्र (सुबह की नमाज़) से पहले सेहरी खाने के साथ शुरू होता है और सूर्यास्त पर इफ्तार के साथ खत्म होता है. सेहरी में हल्का लेकिन पौष्टिक भोजन करने की सलाह दी जाती है, ताकि दिनभर ऊर्जा बनी रहे. इफ्तार आमतौर पर खजूर और पानी से किया जाता है. कई परिवारों में यह पल बेहद भावुक होता है पूरा परिवार एक साथ बैठता है, दुआ पढ़ता है और फिर रोज़ा खोलता है.
किन बातों से रोज़ा टूटता है?
भोजन या पानी का जानबूझकर सेवन, धूम्रपान, और वैवाहिक संबंध रोज़े को तोड़ देते हैं. लेकिन जानबूझकर झूठ बोलना, चुगली करना, गुस्सा करना या किसी का दिल दुखाना भी रोज़े की रूह को कमजोर करता है. अक्सर बुज़ुर्ग कहते हैं, “सिर्फ पेट का नहीं, आंखों और ज़ुबान का भी रोज़ा रखो.” यानी बुराई से बचना भी उतना ही जरूरी है जितना खाने-पीने से परहेज.
क्या रोज़ा रखना कठिन है?
पहले कुछ दिन शरीर को ढलने में समय लगता है, खासकर गर्मियों में जब दिन लंबे होते हैं. कामकाजी लोगों के लिए यह चुनौतीपूर्ण हो सकता है. लेकिन कई लोग बताते हैं कि तीसरे-चौथे दिन से शरीर और मन दोनों तालमेल बिठा लेते हैं. दिल्ली के एक बैंक कर्मचारी आमिर कहते हैं, “शुरू में मुश्किल लगता है, लेकिन जब इरादा पक्का हो तो भूख कम और सुकून ज़्यादा महसूस होता है.” दरअसल, रोज़ा सिर्फ शारीरिक अभ्यास नहीं, मानसिक तैयारी भी है.
रोज़े का सामाजिक और मानवीय पहलू
रमज़ान में ज़कात और सदक़ा देने की परंपरा भी है. जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करते हैं. कई जगहों पर मस्जिदों में सामूहिक इफ्तार का आयोजन होता है, जहां अमीर-गरीब एक ही पंक्ति में बैठकर खाना खाते हैं. यह दृश्य सामाजिक बराबरी का प्रतीक बन जाता है. रोज़ा इंसान को याद दिलाता है कि भूख सिर्फ एक एहसास नहीं, बल्कि दुनिया के करोड़ों लोगों की रोज़मर्रा की हकीकत है.
रमज़ान की अवधि और चांद का महत्व
रमज़ान इस्लामी चंद्र कैलेंडर पर आधारित होता है. इसकी शुरुआत और समाप्ति चांद दिखने पर निर्भर करती है. आमतौर पर यह 29 या 30 दिनों का होता है. हर साल लोग बेसब्री से चांद देखने का इंतजार करते हैं. जैसे ही चांद नजर आता है, मस्जिदों से ऐलान होता है और सोशल मीडिया पर मुबारकबाद का सिलसिला शुरू हो जाता है.
रमज़ान के रोज़े के नियम सिर्फ परहेज़ की सूची नहीं हैं, बल्कि एक जीवनशैली का अभ्यास हैं. यह महीना सिखाता है कि संयम में भी शक्ति है, सादगी में भी संतोष है और भूख में भी आध्यात्मिक तृप्ति मिल सकती है. जो लोग पूरी निष्ठा और समझ के साथ रोज़ा रखते हैं, उनके लिए रमज़ान सचमुच आत्मिक बदलाव का अवसर बन जाता है.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
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