प्रधानमंत्री ने नक्सली हिंसा की कीमत भी याद दिलाई। उन्होंने बताया कि वर्षों तक “लाल आतंक” ने देश के अनेक हिस्सों को भय में रखा और माओवादी हिंसा के खिलाफ अभियानों में 3,500 से अधिक सुरक्षा कर्मियों की जान गई। उन्होंने कहा कि 2014 में सत्ता में आने के बाद उनकी सरकार ने नक्सलवाद को समाप्त करने का संकल्प लिया था और अब सशस्त्र नक्सलवाद अंतिम सांसें गिन रहा है।
इसे भी पढ़ें: ‘दिमागी नक्सली’ यानी सियासी तापमान ब़ढ़ाने वाले शब्द
जहां तक दिमागी नक्सल टिप्पणी के निहितार्थों की बात है तो सबसे पहले इसकी अवधारणा को समझना जरूरी है। दुनिया के अनेक उग्रवादी आंदोलनों का अनुभव बताता है कि किसी हिंसक विचारधारा की चुनौती केवल हथियारबंद दस्तों से नहीं होती। उसके लिए वैचारिक समर्थन, प्रचार, वैधता, भर्ती और सामाजिक सहानुभूति का वातावरण भी महत्वपूर्ण होता है। यदि कोई व्यक्ति सचमुच लोकतांत्रिक व्यवस्था को नकारता है, हिंसक माओवादी आंदोलन को वैचारिक समर्थन देता है या संवैधानिक व्यवस्था के स्थान पर हिंसा को राजनीतिक साधन मानता है, तो उसके विचारों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी पहले “अर्बन नक्सल” जैसे शब्द का इस्तेमाल कर चुके हैं।
उधर, दिमागी नक्सल टिप्पणी पर सवाल उठाते हुए पी. चिदम्बरम या अरविंद केजरीवाल जैसे नेता जो खुद को गर्व से दिमागी नक्सल बता कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं उन्हें केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू के बयान को सुनना चाहिए। किरेन रिजिजू ने साफ कहा है कि प्रधानमंत्री का आशय सिर्फ उन लोगों के लिए है जो माओवाद का समर्थन करते हैं और संविधान को अस्वीकार करते हैं, अलगाववादियों का समर्थन करते हैं या पूर्वोत्तर को भारत के बाकी हिस्से से अलग करने की कोशिशों के पक्ष में हैं। साथ ही भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने दिमागी नक्सल टिप्पणी के दायरे को और विस्तार देते हुए ऐसे लोगों का उल्लेख किया है जो नक्सलियों को वैचारिक समर्थन देते हैं, सुरक्षा बलों की मौत का जश्न मनाते हैं, संसद की जगह सड़क के संघर्ष को राजनीतिक समाधान मानते हैं अथवा राष्ट्रीय एकता से जुड़े सवालों पर ऐसे विचार रखते हैं जोकि खतरनाक हैं।
इस राजनीतिक रस्साकशी के बीच ही “Dimagi Naxal Party” नाम का एक इंस्टाग्राम अकाउंट भी सामने आया है जिसका नारा “Think | Research | Resist” बताया गया है। इस सोशल मीडिया खाते ने बहुत कम समय में लाखों की संख्या में फॉलोअर जुटा लिए और खुद को एक स्थापित राजनीतिक दल की बजाय मुख्यतः सोशल मीडिया आधारित व्यंग्यात्मक आंदोलन के रूप में पेश किया। इसकी पोस्टों में स्वतंत्र चिंतन, प्रतिरोध और भगत सिंह की विचारधारा का संदर्भ भी दिखाई देता है। देखना होगा कि आगे चलकर दिमागी नक्सल पार्टी कॉकरोच जनता पार्टी जैसी लोकप्रियता हासिल कर पाती है या फिर सोशल मीडिया से शुरू होकर इसी मंच तक सिमट जाती है।
उधर, गर्व से खुद को दिमागी नक्सल बताने वाले नेताओं के खिलाफ नक्सल हिंसा से पीड़ित लोग भी खड़े हो गये हैं। पीड़ितों ने कहा है कि इस तरह की टिप्पणियां केवल “फॉलोअर्स बढ़ाने” या किसी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए नहीं की जानी चाहिए। बस्तर शांति समिति के तत्वावधान में दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में माओवादी हिंसा के पीड़ितों ने अपनी आपबीती साझा की। माओवादी हिंसा में घायल हुए सीआरपीएफ जवान रुद्रेश सिंह ने कहा कि नक्सली हिंसा में वर्षों के दौरान सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवाई है, जबकि बड़ी संख्या में लोग गंभीर रूप से घायल हुए और अपने शरीर के अंग खो चुके हैं। उन्होंने कहा, “यह कोई मजाक नहीं है।” रुद्रेश सिंह छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में नक्सल विरोधी अभियान के दौरान आईईडी विस्फोट और माओवादियों की गोलीबारी में घायल हुए थे। उन्होंने बताया कि इस घटना के बाद उनका एक पैर घुटने के नीचे से काटना पड़ा। रुद्रेश सिंह ने चिदंबरम की टिप्पणी पर नाराजगी जताते हुए कहा कि दिल्ली में वातानुकूलित कमरे में बैठकर ‘मैं दिमागी नक्सली होने पर गर्व करता हूं’ कहना बेहद गैर-जिम्मेदाराना है। उन्होंने कहा कि ऐसी टिप्पणियां किसी के फॉलोअर्स बढ़ाने या किसी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए नहीं की जानी चाहिए।
साथ ही बस्तर क्षेत्र से आए अन्य नक्सली हिंसा पीड़ितों ने भी चिदंबरम के बयान की आलोचना की। उन्होंने कहा कि उनकी टिप्पणी से वे “गहराई से आहत” हैं। बस्तर के एक अन्य पीड़ित सियाराम रामटेके ने चिदंबरम की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि वे उनकी टिप्पणी को सहन नहीं कर सके, इसलिए दिल्ली आए हैं। उन्होंने कहा, “जब कोई पूर्व गृह मंत्री और एक वरिष्ठ राजनीतिक नेता इस तरह का बयान देता है, तो हमारे साथ कौन खड़ा होगा?” रामटेके ने कहा कि नक्सली हिंसा से बचे लोग किसी तरह अपना जीवन आगे बढ़ा रहे हैं और वे चाहते हैं कि ‘दिमागी नक्सली’ उसी रास्ते पर वापस जाने की कोशिश न करें। उन्होंने कहा, “हमें शांति के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए। बस्तर विकास चाहता है और सभी को इसका समर्थन करना चाहिए।”
बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि यदि कोई व्यक्ति सचमुच हिंसक माओवादी विचारधारा, संविधान विरोधी गतिविधियों या सशस्त्र विद्रोह का समर्थन करता है, तो उसकी जवाबदेही तय होनी ही चाहिए। देश को ऐसे किसी भी नेटवर्क से सावधान रहना चाहिए जो युवाओं को हिंसा, अलगाववाद या लोकतांत्रिक संस्थाओं के खिलाफ उकसाए। प्रधानमंत्री ने दिमागी नक्सल संबंधी जो टिप्पणी की है उसको व्यंग्य या कटाक्ष के रूप में नहीं बल्कि एक चेतावनी के रूप में देखना चाहिए और देश को हिंसक माओवादी विचारधारा और उसके संभावित समर्थन नेटवर्क के प्रति सचेत रहना चाहिए। खैर…आइये देखते हैं प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में क्या कहा था फिर आपको दिखाएंगे दिमागी नक्सल टिप्पणी और इसके निहितार्थों को समझाते हुए केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू, योग गुरु बाबा रामदेव और भाजपा सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी क्या कह रहे हैं।
Discover more from Hindi News Blogs
Subscribe to get the latest posts sent to your email.