सुप्रीम कोर्ट में नीट-पीजी 2025 कट-ऑफ मामले पर केंद्र ने बताया कि दाखिला सिस्टम के ऑडिट और सुधार के लिए डीजीएचएस (DGHS) की अगुवाई में 12 सदस्यों की कमेटी बनाई गई है।
कमेटी का क्या होगा काम?
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच इस पूरे मामले की सुनवाई कर रही थी। अदालत में सरकार का पक्ष रखते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि 23 जुलाई को ही एक नोटिफिकेशन जारी करके 12 सदस्यों वाले इस पैनल को बना दिया गया है। इसके चेयरमैन खुद DGHS होंगे।
अगर इस कमेटी के काम की बात करें, तो इसका मुख्य मकसद नीट के जरिए होने वाले दाखिले के सिस्टम का एक अंदरूनी ऑडिट करना है। कमेटी यह पता लगाएगी कि मौजूदा ढांचे में क्या कमियां हैं और उन्हें सुधारने के लिए कौन से व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की इस बात को रिकॉर्ड पर लिया और पैनल को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए आठ हफ्ते का समय दिया है। बेंच ने यह भी कहा कि रिपोर्ट आने के बाद इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। साथ ही, अदालत ने सुझाव दिया कि जरूरत पड़ने पर इस पैनल में नेशनल कमीशन फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन (NCISM) और नेशनल कमीशन फॉर होम्योपैथी (NCH) के सदस्यों को भी शामिल किया जा सकता है।
क्यों मचा है कट-ऑफ घटने पर बवाल?
आपको बता दें कि इस साल नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने 13 जनवरी को एक नोटिस जारी किया था। इसमें नीट-पीजी 2025-2026 की तीसरे राउंड की काउंसलिंग के लिए मिनिमम क्वालिफाइंग परसेंटाइल को बहुत ज्यादा कम कर दिया गया था। सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के लिए कट-ऑफ 50वें परसेंटाइल से लुढ़ककर 7वें परसेंटाइल पर आ गई।
इसी फैसले के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन, डॉ. सौरव कुमार, डॉ. लक्ष्य मित्तल और डॉ. आकाश सोनी जैसे कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। याचिकाकर्ताओं की तरफ से सीनियर वकील पिंकी आनंद और वकील सत्यम सिंह राजपूत ने अदालत में दलील दी कि इतनी बड़ी कटौती संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का सीधा उल्लंघन है। शीर्ष अदालत ने भी शुरुआत में यह चिंता जताई थी कि क्या क्वालिफाइंग मार्क्स में इतनी तेज गिरावट से पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन के स्टैंडर्ड यानी स्तर पर बुरा असर पड़ेगा।
सरकार का हलफनामा
इन तमाम आपत्तियों के जवाब में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के DGHS ने अदालत में अपना हलफनामा पेश किया। सरकार का सीधा सा तर्क है कि कट-ऑफ घटाने का फैसला कोई मनमानी नहीं है, बल्कि एक्सपर्ट्स की राय और जनहित को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
सरकार ने साफ किया कि यह कोई पहली बार नहीं है जब ऐसा हुआ है। 2017 में नीट-पीजी की शुरुआत के बाद से ही, जब भी सीटें खाली रहने का खतरा होता है, कट-ऑफ में बदलाव किया जाता है। पिछले साल यानी 2023 में तो सभी कैटेगरी के लिए कट-ऑफ को घटाकर जीरो कर दिया गया था।
केंद्र का कहना है कि नीट-पीजी के अंकों से किसी डॉक्टर की काबलियत तय नहीं होती। जो उम्मीदवार यह परीक्षा दे रहे हैं, वे पहले ही अपनी एमबीबीएस (MBBS) की डिग्री पूरी कर चुके हैं और अपनी जरूरी इंटर्नशिप भी कर चुके हैं। आसान शब्दों में कहें तो, नीट-पीजी कोई ऐसी परीक्षा नहीं है जो यह बताए कि आप अच्छे डॉक्टर हैं या नहीं, बल्कि यह सिर्फ सीमित पीजी सीटों के बंटवारे के लिए एक मेरिट लिस्ट बनाने का जरिया है।
खाली सीटों का गणित
अदालत में पेश किए गए आंकड़ों से यह पूरी तस्वीर और साफ हो जाती है। सरकार ने बताया कि शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए दाखिले का गणित कुछ इस तरह था। कुल सीटें लगभग 70,000 थीं। इसके लिए कुल उम्मीदवार 2,24,029 थे। इसके अलावा ऑल इंडिया कोटा (AIQ) सीटें 31,742 थीं। हैरानी की बात यह रही कि नीट-पीजी काउंसलिंग के दूसरे राउंड के बाद भी AIQ के तहत 9,621 सीटें खाली रह गईं। इनमें से 5,213 सीटें तो सीधे तौर पर सरकारी मेडिकल कॉलेजों (AIQ और DNB सीटों को मिलाकर) में खाली थीं।
सरकार ने इन आंकड़ों के जरिए यह साबित करने की कोशिश की कि कट-ऑफ इसलिए नहीं घटाई गई ताकि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को फायदा पहुंचाया जा सके। बल्कि यह फैसला इसलिए लिया गया ताकि जनता के पैसे से चल रहे सरकारी संस्थानों में भी सीटें खाली न रहें और उनका सही इस्तेमाल हो सके।
कितने छात्रों को मिला इसका फायदा?
नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन (NBEMS) ने भी सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कट-ऑफ परसेंटाइल कम करने के इस एक फैसले से 95,913 अतिरिक्त उम्मीदवार नीट-पीजी 2025 की काउंसलिंग के लिए योग्य हो गए। सरकार ने यह भी दलील दी है कि अदालतों को आमतौर पर एक्सपर्ट कमेटियों द्वारा लिए गए ऐसे अकादमिक और नीतिगत फैसलों में दखल नहीं देना चाहिए, जब तक कि वह फैसला पूरी तरह से मनमाना या किसी नियम के खिलाफ न हो। अब सभी की निगाहें उस आठ हफ्ते के समय पर टिकी हैं जिसके बाद हाई-पावर कमेटी अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी।
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