कैंची धाम और बाबा नीब करौरी (आम बोलचाल में बाबा नीम करौली के नाम से भी जाने जाते हैं) से जुड़ी उनके भक्तों के जीवन में ऐसी अनेक घटनाएं दर्ज हैं, जिन्हें वे गुरु कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव मानते हैं। ऐसी ही एक कहानी दिल्ली निवासी रवींद्र जोशी उर्फ ‘रब्बू दादा’ की है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन महाराजजी की सेवा में समर्पित कर दिया। विजय छाबरिया एवं डॉ. दीपक पटवर्धन की किताब ‘दिव्य अनुभूति’ के संस्मरण के अनुसार, रब्बू दादा न केवल बाबा के परम भक्त थे, बल्कि अमेरिका के ताओस से लेकर गुजरात के बावनिया तक कई मंदिरों के निर्माण और विग्रह स्थापना से भी जुड़े रहे। उनके अनुसार, महाराजजी से पहली मुलाकात ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी थी। साल 1958 की गर्मियों में रब्बू दादा नैनीताल में अपने चाचा के घर छुट्टियां बिताने पहुंचे थे। वहीं, हनुमानगढ़ी में बाबा के चमत्कारों और लीलाओं की चर्चा सुनकर उनके मन में उन्हें देखने की तीव्र इच्छा जगी। मई के अंत में जब बाबा के आने की खबर मिली, तो वे भी दर्शन के लिए पहुंच गए। तीन दिन तक अनदेखा करते रहे बाबा रब्बू दादा के अनुसार, हनुमानगढ़ी में बिताए शुरुआती तीन दिन किसी परीक्षा से कम नहीं थे। महाराजजी की नजर उन पर पड़ती, लेकिन वे तुरंत दूसरी ओर देखने लगते। न तो उनसे बात करते और न ही उन्हें वहां से जाने के लिए कहते। इस व्यवहार से रब्बू दादा के मन में कई सवाल उठने लगे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि बाबा उन्हें अनदेखा क्यों कर रहे हैं। चौथे दिन महाराजजी एक बीमार महिला भक्त से मिलने गए। अगले दिन आरती के समय उन्होंने पहली बार रब्बू दादा को अपने पास बुलाया। महाराजजी अचानक बोले, यह बच्चा सोच रहा है कि बाबा न मुझसे बात करते हैं और न मुझे जाने देते हैं। इतना कहकर उन्होंने रब्बू दादा के सिर पर जोर से थप्पड़ मारा। रब्बू दादा बताते हैं कि यह कोई साधारण थप्पड़ नहीं था, बल्कि गुरु का आशीर्वाद था। उनके अनुसार, उसी क्षण उनकी आंखों से आंसू बहने लगे, विचार शून्य हो गए और वे एक ऐसी अवस्था में पहुंच गए, जहां उन्हें अपने और गुरु के बीच कोई भेद महसूस नहीं हुआ। बाबा दिनभर 30-35 बार प्रसाद ग्रहण करते थे रब्बू दादा बताते हैं कि भक्त अक्सर अपने हाथों से बने व्यंजन लेकर आते थे। महाराजजी भक्तों की भावना का सम्मान करते हुए हर प्रसाद का थोड़ा-थोड़ा स्वाद लेते थे। कई बार वे दिनभर में 30 से 35 बार अलग-अलग भक्तों के हाथों बने प्रसाद ग्रहण करते और शेष श्रद्धालुओं में बांट देते थे। रब्बू दादा की शारदा मौसी भगवान कृष्ण की भक्त थीं, लेकिन साधु संतों पर उनका विश्वास नहीं था। एक दिन जब उन्होंने हनुमानगढ़ी में महाराजजी को देखा तो उन्हें बाबा के स्थान पर साक्षात श्रीकृष्ण के दर्शन हुए। इसके बाद उनकी सारी शंकाएं दूर हो गईं और वे बाबा की अनन्य श्रद्धालु बन गईं। एक बार रब्बू दादा रसोई में पूड़ियां तल रहे थे। अचानक उबलता घी उनके हाथ पर गिर गया और हाथ बुरी तरह झुलस गया। उन्होंने दर्द छिपाने की कोशिश की, लेकिन महाराजजी ने तुरंत पूछ लिया, “क्या हाथ जल गया?” रब्बू दादा के ‘हां’ कहते ही बाबा ने उनका हाथ अपने कंबल के भीतर लेकर दबाया और कहा, ‘ठीक हो गया, जा।’ इसके बाद दर्द और जलन तुरंत गायब हो गई। स्वप्न में देखा, सुबह वही दृश्य सामने था एक बार मैदानी क्षेत्रों के लिए रवाना होते समय रब्बू दादा ने पूछा कि अब दोबारा दर्शन कब होंगे। इस पर महाराजजी ने कहा, इलाहाबाद आना। एक दिन तेरा पूरा खानदान मेरे पास आएगा। रब्बू दादा बताते हैं कि आज उनका पूरा परिवार बाबा की भक्ति से जुड़ा हुआ है और उन्हें लगता है कि महाराजजी का यह वचन पूरी तरह सच साबित हुआ। इलाहाबाद में रहते हुए एक रात रब्बू दादा ने सपना देखा कि महाराजजी दादा मुखर्जी के घर की सीढ़ियों के पास खड़े हैं। अगली सुबह जब वे वहां पहुंचे तो बाबा ठीक उसी स्थान पर खड़े मिले, जैसा उन्होंने सपने में देखा था। यह घटना उनके जीवन की सबसे यादगार स्मृतियों में शामिल है। रब्बू दादा को एक समय रातभर ताश खेलने की आदत पड़ गई थी। एक दिन सेवा करते समय उनके मन में विचार आया कि क्या महाराजजी को उनकी इस आदत के बारे में पता होगा? तभी महाराजजी अचानक उनकी ओर मुड़े और बोले, अरे, मुझे तेरे बारे में सब पता है। रब्बू दादा इसे बाबा की अंतर्यामी शक्ति का प्रमाण मानते थे। यह लड़का कभी मेरी बात नहीं सुनता 1970 में रब्बू दादा का विवाह तय हुआ। महाराजजी ने उन्हें ट्रेन से जाने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने निजी बस बुक कर ली। रास्ते में बस दुर्घटनाग्रस्त होकर पलट गई। हालांकि, किसी को गंभीर चोट नहीं आई। विवाह के बाद जब वे बाबा के दर्शन करने पहुंचे तो महाराजजी ने मुस्कराते हुए कहा, यह लड़का कभी मेरी बात नहीं सुनता। इसे क्या पता, उस बस में बैठे लोगों को बचाने के लिए मुझे क्या-क्या करना पड़ा। 15 जून 1976 को हुई विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा महाराजजी के महाप्रयाण के बाद भक्तों ने कैंची धाम में उनकी मूर्ति स्थापित करने का निर्णय लिया। मूर्ति को जयपुर से लाने और स्थापना की जिम्मेदारी रब्बू दादा और विनोद जोशी को सौंपी गई थी। 15 जून 1976 को वैदिक विधि-विधान के साथ कैंची धाम में बाबा नीब करौरी के विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई। इसके बाद वृंदावन, लखनऊ, दिल्ली, शिमला और अन्य स्थानों पर भी बाबा के मंदिर स्थापित हुए। रब्बू दादा के अनुसार महाराजजी अपने भक्तों को कभी अकेला नहीं छोड़ते थे। उनके शब्दों में, उस एक थप्पड़ से मिला आशीर्वाद आज भी मेरे जीवन का सबसे बड़ा सहारा है। और शायद इसी भावना को महाराजजी अपने शब्दों में कहा करते थे- मैं यदि एक बार किसी का हाथ पकड़ लूं, तो उसे कभी नहीं छोड़ता। 1960 में शिप्रा नदी किनारे स्थापित हुआ था धाम कैंची धाम उत्तराखंड के नैनीताल जिले में भवाली के पास स्थित है। बाबा नीब करौरी महाराज ने 1960 के दशक में शिप्रा नदी के किनारे इस आश्रम और हनुमान मंदिर की स्थापना की थी। यह स्थान अपनी आध्यात्मिक शांति और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है। —————- कैंची धाम पार्ट-2 की ये खबर भी पढ़ें : बाबा नीब करौरी बोले- हमारा साथ पिछले 83 जन्मों का: कष्ट मिटाऊंगा तो फिर जन्म लेना पड़ेगा; पानी को घी बनाने की लीला दिखाई कैंची धाम में केवल मंदिर और आश्रम की ही नहीं, बल्कि बाबा नीब करौरी (आम बोलचाल में बाबा नीम करौली के नाम से भी जाने जाते हैं) के अनन्य भक्तों से जुड़ी कई अलौकिक कथाएं भी प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कहानी बरेली निवासी किशनचंद तिवारी (केसी तिवारी) की है, जिन्हें महाराजजी अपना 83 जन्मों का साथी बताते थे। पढ़ें पूरी खबर…
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