मध्य प्रदेश की राजनीति में दतिया विधानसभा उपचुनाव के नतीजे ने भारतीय जनता पार्टी को ऐसा राजनीतिक संदेश दिया है, जिसकी गूंज अब पूरे प्रदेश में सुनाई दे रही है। विधानसभा अध्यक्ष और भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेंद्र सिंह तोमर के एक विवादित बयान से शुरू हुआ विवाद आखिरकार सार्वजनिक माफी तक पहुंच गया। भाजपा की आंतरिक समीक्षा में यह संकेत मिलने के बाद कि कुशवाहा समाज की नाराजगी पार्टी की हार का बड़ा कारण बनी, तोमर ने स्वयं आगे आकर अपने शब्द वापस लिए और कहा कि उन्होंने कभी सपने में भी इस समाज का अपमान करने की नहीं सोचा।
पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब 31 जुलाई को मुरैना में भाजपा के जिला अध्यक्ष कमलेश कुशवाहा के निवास पर आयोजित एक कार्यक्रम में नरेंद्र सिंह तोमर ने कुशवाहा समाज को संबोधित करते हुए कहा कि यह समाज बीच-बीच में “गुलाटी खाता रहा” और इसी कारण उसने अपनी “विश्वसनीयता को खंडित” किया। उन्होंने यह भी कहा कि एक समय ऐसा था जब कुशवाहा समाज भाजपा का मजबूत समर्थक माना जाता था और भाजपा ने उस दौर में भी समाज को सम्मान दिया, जब अन्य राजनीतिक दल उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की स्थिति में नहीं थे। उन्होंने पूर्व नेता कालीचरण कुशवाहा को टिकट दिए जाने का उदाहरण भी प्रस्तुत किया।
इसे भी पढ़ें: Article 370 पर बदजुबानी कर रहे थे जरदारी और शहबाज शरीफ, मोदी ने खुद आगे आकर दिया करारा जवाब
हालांकि, कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही राजनीतिक भूचाल आ गया। कुशवाहा समाज के विभिन्न संगठनों और प्रतिनिधियों ने इस टिप्पणी को पूरे समाज की राजनीतिक निष्ठा पर सवाल बताकर तीखी आपत्ति जताई। कांग्रेस ने भी इसे तुरंत बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इसे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का अपमान बताते हुए कहा कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह की भाषा शोभा नहीं देती और उन्होंने नरेंद्र सिंह तोमर से सार्वजनिक माफी की मांग की।
इस बीच, दतिया विधानसभा उपचुनाव के परिणाम ने भाजपा की मुश्किलें और बढ़ा दीं। कांग्रेस उम्मीदवार कुंवर घनश्याम सिंह ने भाजपा प्रत्याशी आशीष तिवारी को 6,016 वोटों के अंतर से पराजित कर दिया। भाजपा की आंतरिक समीक्षा में यह बात सामने आई कि दतिया के लगभग 12 प्रतिशत मतदाता रहे कुशवाहा समाज का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस की ओर खिसक गया, जिसने चुनावी परिणाम को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। इसके बाद भाजपा संगठन ने हार की व्यापक समीक्षा शुरू की। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वरिष्ठ नेताओं और चुनाव प्रभारियों के साथ बैठक की, दतिया जिला इकाई को भंग किया गया, समीक्षा समितियां गठित की गईं और संगठनात्मक कमजोरियों के साथ-साथ संभावित अंदरूनी असंतोष की भी जांच शुरू हुई।
इसी राजनीतिक आत्ममंथन के बीच नरेंद्र सिंह तोमर ने कुशवाहा समाज के नाम हस्ताक्षरित पत्र जारी कर अपने बयान पर खेद व्यक्त किया। उन्होंने लिखा कि कमलेश कुशवाहा के घर आयोजित कार्यक्रम पारिवारिक वातावरण में था और उसी संदर्भ में बातचीत हुई थी। उन्होंने कहा कि उनका और कुशवाहा समाज का रिश्ता परस्पर पूरक है तथा उन्होंने जीवनभर इस समाज का सम्मान किया है और आगे भी करते रहेंगे। यदि उनके शब्दों से किसी की भावना आहत हुई है तो वह अपने शब्द वापस लेते हैं और इसके लिए खेद प्रकट करते हैं। उनका यह बयान भाजपा के भीतर बढ़ी राजनीतिक बेचैनी और सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम केवल एक बयान और माफी तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश की बदलती सामाजिक-राजनीतिक राजनीति का संकेत भी देता है। राज्य की कुल आबादी में अन्य पिछड़ा वर्ग लगभग आधी हिस्सेदारी रखता है और कुशवाहा समाज इस वर्ग का एक प्रभावशाली हिस्सा माना जाता है। ग्वालियर-चंबल अंचल के मुरैना, दतिया, भिंड और ग्वालियर जैसे जिलों से लेकर बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र तक इस समाज की उल्लेखनीय उपस्थिति है। कई विधानसभा सीटों पर यह समाज जीत-हार तय करने की क्षमता रखता है।
विशेष रूप से दतिया जैसी सीट पर, जहां कुशवाहा मतदाता लगभग 12 प्रतिशत हैं, किसी भी दल के लिए इस समाज की अनदेखी राजनीतिक जोखिम बन सकती है। यही कारण है कि भाजपा ने पिछले दो दशकों में ओबीसी सामाजिक समीकरणों के केंद्र में कुशवाहा समाज को महत्वपूर्ण स्थान दिया। दूसरी ओर कांग्रेस भी अब इस वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर तेजी से काम कर रही है। पार्टी ने सतना विधायक सिद्धार्थ कुशवाहा के नेतृत्व में बूथ स्तर तक व्यापक अभियान चलाया, जिसका असर दतिया उपचुनाव में दिखाई दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुशवाहा समाज मध्य प्रदेश में केवल एक बड़ा वोट बैंक नहीं, बल्कि एक प्रभावी “स्विंग फैक्टर” भी है। यदि समाज को सम्मान, पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भागीदारी का संदेश मिलता है तो वह किसी भी दल के साथ मजबूती से खड़ा हो सकता है। लेकिन उपेक्षा या अपमान की भावना पैदा होने पर उसका रुख तेजी से बदलने की क्षमता भी रखता है। यही वजह है कि नरेंद्र सिंह तोमर के “गुलाटी” वाले बयान के बाद भाजपा को सार्वजनिक रूप से डैमेज कंट्रोल करना पड़ा।
बहरहाल, दतिया उपचुनाव ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि मध्य प्रदेश की आगामी राजनीतिक लड़ाई केवल नेताओं के भाषणों या चुनावी नारों से नहीं जीती जाएगी। सामाजिक सम्मान, प्रतिनिधित्व और ओबीसी वर्गों के साथ मजबूत संवाद आने वाले चुनावों की दिशा तय करेगा। नरेंद्र सिंह तोमर की सार्वजनिक माफी इस बात का प्रमाण है कि मध्य प्रदेश की राजनीति में कुशवाहा समाज अब केवल एक वोट बैंक नहीं, बल्कि सत्ता का समीकरण बदलने वाली निर्णायक राजनीतिक ताकत बन चुका है।
-नीरज कुमार दुबे
Discover more from Hindi News Blogs
Subscribe to get the latest posts sent to your email.