वहीं, ट्रेंट (Trent) का प्रदर्शन और भी ज्यादा चौंकाने वाला रहा। टाटा ग्रुप की इस रिटेल कंपनी का मार्केट कैप करीब 19.2 गुना बढ़कर ₹1.59 लाख करोड़ हो गया, जो पहले सिर्फ ₹8,303 करोड़ था। कंपनी का रेवेन्यू भी ₹2,157 करोड़ से बढ़कर ₹20,074 करोड़ हो गया। इसी तरह मुनाफा ₹87 करोड़ से बढ़कर ₹1,746 करोड़ पहुंच गया, यानी ट्रेंट (Trent) ने कारोबार और शेयर बाजार, दोनों मोर्चों पर निवेशकों को जबरदस्त रिटर्न दिया। यही वजह है कि इसे टाटा ग्रुप के सबसे बड़े मल्टीबैगर शेयरों में गिना जा रहा है।
इसके अलावा टाटा कंज्यूमर का मार्केट कैप करीब 12 गुना बढ़ा, जबकि इंडियन होटल्स का बाजार मूल्य 8 गुना से ज्यादा और टाटा पावर का 5 गुना से अधिक बढ़ा। टाटा स्टील ने भी करीब ₹1.83 लाख करोड़ की मार्केट वैल्यू जोड़ी। वहीं, टाटा मोटर्स ने लगभग ₹1.48 लाख करोड़ की अतिरिक्त वैल्यू बनाई। हालांकि, हर कंपनी की कहानी एक जैसी नहीं रही। टाटा केमिकल्स की मार्केट वैल्यू में इस अवधि में सिर्फ करीब 15% की वृद्धि हुई, जबकि रैलिस इंडिया के मार्केट कैप में गिरावट भी देखने को मिली।
दिलचस्प बात यह है कि FY26 के दौरान टाटा कंपनियों का कुल रेवेन्यू पिछले साल के मुकाबले 5.1% घटा, लेकिन कुल मुनाफा 71% बढ़ गया। इसमें टाटा मोटर्स की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही। आंकड़ों के अनुसार, टाटा मोटर्स का मुनाफा ₹28,380 करोड़ से बढ़कर ₹86,532 करोड़ हो गया और यह FY26 में टाटा की लिस्टेड कंपनियों के कुल मुनाफे का आधे से ज्यादा हिस्सा रहा। टाटा स्टील का मुनाफा भी तीन गुना से अधिक बढ़ा, जबकि टाइटन का मुनाफा 55% और टाटा कंज्यूमर का करीब 23% बढ़ा। दूसरी तरफ TCS का मुनाफा सिर्फ 1.4% बढ़ा और टाटा पावर, वोल्टास तथा टाटा एलेक्सी जैसी कुछ कंपनियों के प्रदर्शन में गिरावट देखने को मिली।
अब सबसे बड़ा सवाल टाटा ग्रुप के अगले दौर को लेकर है। चंद्रशेखरन फरवरी 2027 तक अपने पद पर बने रहेंगे, लेकिन उनके बाद नेतृत्व किसके हाथ में जाएगा और ग्रुप की रणनीति किस दिशा में जाएगी, इस पर निवेशकों की नजर रहेगी। नेतृत्व में बदलाव का असर पहले ही टीसीएस के शेयर पर दिखाई दिया, जब खबरों के बाद शेयर में करीब 4% की गिरावट आई और कंपनी के मार्केट कैप से लगभग ₹35,000 करोड़ कम हो गए। हालांकि, एक्सपर्ट का मानना है कि लंबी अवधि में निवेशकों के लिए सिर्फ चेयरमैन बदलना ही महत्वपूर्ण नहीं होगा, बल्कि अलग-अलग टाटा कंपनियों का वास्तविक कारोबारी प्रदर्शन ज्यादा मायने रखेगा।
चंद्रशेखरन का टाटा ग्रुप से रिश्ता भी काफी पुराना है। उन्होंने 1987 में टीसीएस में इंटर्न के तौर पर शुरुआत की थी और 2009 में कंपनी के सीईओ बने। इसके बाद 2017 में उन्होंने टाटा संस की कमान संभाली। वह टाटा परिवार से संबंधित नहीं हैं और टाटा संस के पहले गैर-पारसी चेयरमैन भी रहे। उनके कार्यकाल में टाटा ग्रुप ने सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, रियल एस्टेट और अन्य नए क्षेत्रों में भी बड़ा दांव लगाया है। हालांकि, इन कारोबारों में भारी निवेश की जरूरत है और इनमें से कई कंपनियां अभी लिस्टेड नहीं हैं।
आने वाले समय में चंद्रशेखरन के उत्तराधिकारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस ग्रुप की इसी रफ्तार को बनाए रखना होगी। एयर इंडिया में लगातार हो रहे घाटे, जगुआर लैंड रोवर की चुनौतियों, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़े डेटा लीक और कुछ अन्य कारोबारों की मुश्किलों के बीच नए नेतृत्व को कई बड़े फैसले लेने होंगे। इसके बावजूद ₹8.53 लाख करोड़ से बढ़कर ₹25.21 लाख करोड़ तक पहुंचा लिस्टेड टाटा साम्राज्य बताता है कि चंद्रशेखरन के दौर में ग्रुप ने निवेशकों के लिए कितनी बड़ी संपत्ति बनाई है। अब असली परीक्षा यह होगी कि उनके बाद टाटा की कंपनियां इसी प्रदर्शन को बरकरार रख पाती हैं या नहीं।
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