एक लोक कथा है। बहुत समय पहले एक राजा शिकार के लिए अपने सैनिकों के साथ जंगल में गया। शिकार करते-करते वह अपने साथियों से बिछड़ गया और जंगल में बहुत अंदर पहुंच गया। धीरे-धीरे शाम होने लगी और राजा को रास्ता समझ नहीं आया। वह अकेला, भूखा और थका हुआ था। राजा रास्ता खोजते-खोजते एक बड़े पेड़ के नीचे बैठ गया। वह बहुत परेशान था। तभी उसे पास के पेड़ से एक तोते की आवाज सुनाई दी। तोता जोर-जोर से बोल रहा था- “पकड़ो राजा को। यह अकेला है, इसे लूट लो।” तोते की बात सुनकर राजा डर गया। उसे लगा कि कहीं डकैत आ गए, तो उसकी जान खतरे में पड़ जाएगी। वह चुपचाप उठकर वहां से आगे निकल गया। थोड़ी दूर चलने के बाद राजा फिर बहुत थक गया। उसने एक और पेड़ के नीचे आराम करने का सोचा। जैसे ही वह वहां बैठा, उसे फिर एक तोते की आवाज सुनाई दी। यह तोता बहुत मीठे और आदर भरे शब्द बोल रहा था- “हमारे आश्रम में आपका स्वागत है। कृपया ठंडा जल ग्रहण करें और यहां विश्राम करें।” यह सुनकर राजा हैरान रह गया। उसने इधर-उधर देखा तो पास ही एक आश्रम दिखाई दिया। राजा आश्रम में पहुंचा। वहां एक संत बैठे हुए थे। राजा ने उन्हें प्रणाम किया और उसके साथ घटी पूरी घटना बताई। संत ने राजा को भोजन और पानी दिया। राजा ने भोजन के बाद संत से पूछा, “महाराज, एक ही जंगल में दो तोते इतने अलग-अलग कैसे बोलते हैं?” संत मुस्कुराए और बोले, “राजन, यह संगत का असर है। जो तोता डकैतों के पास रहता है, वह उन्हीं की बातें सीख गया है और जो तोता आश्रम में रहता है, वह साधु-संतों के अच्छे विचार सुनकर वही बोलने लगा है।” राजा को बात समझ आ गई। संत ने आगे कहा, “इसी तरह मनुष्य भी जिस संगत में रहता है, वैसा ही बन जाता है। अच्छे लोगों की संगत से अच्छे विचार आते हैं और बुरी संगत से बुरे।” राजा ने उस दिन एक बहुत बड़ा सबक सीखा कि जीवन में संगत बहुत महत्वपूर्ण होती है। किस्से की सीख इस कहानी से हमें जीवन प्रबंधन के कई महत्वपूर्ण सूत्र मिलते हैं। अगर हम इन्हें अपने जीवन में अपनाएं तो हमारा व्यक्तित्व बेहतर बन सकता है।
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