हम आपको याद दिला दें कि केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष जिस हरित क्षेत्र हवाई अड्डे को मंजूरी दी थी, वह अगले पांच वर्षों में तैयार होने की उम्मीद है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह हवाई अड्डा भारतीय नौसेना के संचालन नियंत्रण में रहेगा। यानी यह केवल नागरिक उड़ानों का केंद्र नहीं होगा, बल्कि हिंद महासागर में भारत की सैन्य शक्ति का नया अग्रिम मोर्चा बनेगा। यह दोहरे उपयोग वाला हवाई अड्डा भारत की समुद्री निगरानी क्षमता, सैन्य पहुंच और त्वरित कार्रवाई की ताकत को कई गुना बढ़ा देगा।
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हम आपको बता दें कि ग्रेट निकोबार की यह परियोजना चार बड़े स्तंभों पर आधारित है। इनमें अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, आधुनिक नगर, ऊर्जा संयंत्र और नौसैनिक हवाई अड्डा शामिल हैं। यह पूरा ढांचा भारत को उस समुद्री क्षेत्र में स्थायी उपस्थिति देगा, जहां से दुनिया के दो तिहाई तेल व्यापार और आधा कंटेनर यातायात गुजरता है। ग्रेट निकोबार केवल चालीस किलोमीटर दूर स्थित है उस सिक्स डिग्री चैनल से, जो अदन की खाड़ी से मलक्का जलडमरूमध्य तक फैले समुद्री व्यापार मार्ग का सबसे संवेदनशील हिस्सा माना जाता है।
यही वह इलाका है जहां चीन लगातार अपनी घुसपैठ बढ़ा रहा है। हिंद महासागर क्षेत्र में कई बाहरी ताकतें आर्थिक और सैन्य दबदबा बनाने में जुटी हैं। ऐसे में मोदी सरकार का यह कदम भारत को दक्षिण पूर्वी हिंद महासागर में निर्णायक बढ़त देगा। यानि अब भारत इस पूरे क्षेत्र में सुरक्षा साझेदार और संकट के समय सबसे पहले सहायता पहुंचाने वाली ताकत के रूप में उभरेगा।
रक्षा सूत्रों का साफ कहना है कि यह परियोजना तीस वर्ष पहले ही पूरी हो जानी चाहिए थी, लेकिन पिछली सरकारों की सुस्ती और दूरदृष्टि की कमी के कारण भारत ने बहुमूल्य समय गंवा दिया। अब मोदी सरकार उस रणनीतिक भूल को सुधार रही है। यह परियोजना भारत को अपने सैन्य संसाधनों की तेज आवाजाही, अग्रिम रसद आपूर्ति और समुद्री निगरानी में अभूतपूर्व क्षमता देगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रेट निकोबार के आसपास समुद्र में विशाल हाइड्रोकार्बन भंडार भी हो सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो यह परियोजना भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी ऐतिहासिक साबित होगी। यानी यह केवल सैन्य ताकत का सवाल नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता का भी बड़ा आधार बनेगी।
साथ ही मोदी सरकार ने उन आलोचनाओं को भी करारा जवाब दिया है, जिनमें इस परियोजना को केवल व्यावसायिक योजना बताकर बदनाम करने की कोशिश की जा रही थी। रक्षा सूत्रों ने साफ कहा है कि इसे केवल कारोबारी परियोजना कहना भौगोलिक अज्ञानता का प्रमाण है। यह परियोजना सामरिक, आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भारत के भविष्य की धुरी है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि सभी परियोजनाएं पूरी पारदर्शिता और विधिवत ठेका प्रक्रिया के तहत संचालित की जा रही हैं।
हम आपको बता दें कि परियोजना के विभिन्न हिस्सों पर तेजी से काम चल रहा है। कंटेनर बंदरगाह के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। नगर परियोजना पर व्यय वित्त समिति की बैठक हो चुकी है, जबकि द्रवीकृत प्राकृतिक गैस आधारित ऊर्जा संयंत्र की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार कर ली गई है। इससे स्पष्ट है कि मोदी सरकार केवल घोषणाएं नहीं कर रही, बल्कि जमीन पर तेजी से अमल भी कर रही है।
इसके साथ ही पर्यावरण को लेकर उठे सवालों पर भी सरकार ने तथ्यात्मक जवाब दिया है। पर्यावरण प्रभाव आकलन के अनुसार पूरे द्वीप के केवल 166.1 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को विकास के लिए चिन्हित किया गया है, जबकि 81.74 प्रतिशत क्षेत्र राष्ट्रीय उद्यान, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र, वन और जनजातीय संरक्षण क्षेत्रों के रूप में सुरक्षित रहेगा। वन क्षेत्र के उपयोग में भी आधे से अधिक हिस्से को हरित क्षेत्र के रूप में सुरक्षित रखा जाएगा, जहां पेड़ों की कटाई नहीं होगी।
इसके साथ ही वन्यजीवों, प्रवाल भित्तियों और मैंग्रोव संरक्षण के लिए तीस वर्षों में दो हजार दो सौ बीस करोड़ रुपये से अधिक का विशेष संरक्षण कार्यक्रम भी तैयार किया गया है। लेदरबैक कछुए, निकोबार मेगापोड और मगरमच्छों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
इस तरह स्पष्ट है कि ग्रेट निकोबार परियोजना मोदी सरकार का केवल विकास अभियान नहीं, बल्कि भारत की समुद्री शक्ति का नया शंखनाद है। यह वह मास्टरस्ट्रोक है जो आने वाले दशकों में हिंद महासागर की रणनीतिक तस्वीर बदल सकता है। भारत अब अपने समुद्री हितों की रक्षा केवल तटों से नहीं करेगा, बल्कि समुद्र के बीचोंबीच अपनी निर्णायक उपस्थिति दर्ज कराएगा।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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