13 से 17 मई तक लगातार 5 दिन व्रत-पूजा और स्नान-दान के लिहाज से खास रहेंगे। 13 मई को अपरा एकादशी, 14 को गुरु प्रदोष, 15 को वृष संक्रांति, 16 मई को शनैश्चरी अमावस्या रहेगी और 17 मई से ज्येष्ठ महीने का अधिकमास शुरू होगा। इनमें एकादशी व्रत के दिन भगवान विष्णु की पूजा, प्रदोष में शिव पूजन होगा। संक्रांति पर सूर्य पूजा के साथ स्नान-दान किया जाएगा। शनैश्चरी अमावस्या पर शनि जयंती रहेगी और अधिकमास में भगवान विष्णु की पूजा होगी। 17 मई से 15 जून तक चलने वाले इस अधिकमास में शुभ कामों के लिए कोई मुहूर्त नहीं होगा। 13 मई: अपरा एकादशी, विष्णु पूजा और व्रत का दिन
इस दिन अपरा एकादशी है। इस एकादशी व्रत के बारे में श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था। ये बात ब्रह्मांड पुराण में लिखी हुई है। इस व्रत को पापों से मुक्त करने वाला और विष्णु कृपा देने वाला माना गया है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, विष्णु सहस्रनाम, गीता पाठ, तुलसी पूजा, दीपदान और जरूरतमंद लोगों को अन्न-वस्त्र दान करने की परंपरा है। पद्म पुराण के अनुसार एकादशी व्रत में अन्न नहीं खाया जाता है। इस दिन सुबह नहाकर व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु की पूजा करें। जल और पंचामृत से अभिषेक करें। पीले फूल, तुलसी दल, फल चढ़ाएं और आरती करें। 14 मई: गुरु प्रदोष, शिव पूजा का विशेष संध्या काल
14 मई को गुरुवार होने से यह गुरु प्रदोष रहेगा। इस दिन भगवान शिव की पूजा प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के आसपास संध्या काल में होती है। स्कंद पुराण के अनुसार प्रदोष व्रत में शिव पूजा, दीप, बिल्वपत्र और स्तुति से हर तरह के पाप खत्म होने की मान्यता है। शिव पुराण के अनुसार प्रदोष यानी त्रयोदशी तिथि में शाम को शिव पूजा करने से हर तरह के दोष खत्म हो जाते हैं। 15 मई: वृष संक्रांति, स्नान-दान और सूर्य पूजा का दिन
15 मई को सूर्य मेष से वृष राशि में प्रवेश करेगा। संक्रांति का समय सूर्य की एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करने का समय होता है। इस दिन स्नान, सूर्य को अर्घ्य, जप और दान की परंपरा है। धर्मशास्त्रीय परंपरा में संक्रांति को पुण्यकाल माना गया है। मत्स्य पुराण के अनुसार संक्रांति के समय किए गए दान के विशेष फल का जिक्र मिलता है। इसलिए इस दिन जल, अन्न, कपड़े, तिल, गुड़, छाता, पंखा और गर्मी से राहत देने वाली चीजों का दान दिया जाता है। इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर नहाएं। फिर तांबे के लोटे में जल भरकर उगते हुए सूरज को जल चढ़ाएं। जल में लाल फूल, रोली या अक्षत मिला सकते हैं। गर्मी के मौसम में जल, छाता, मटका, फल, शर्बत, अन्न और वस्त्र का दान करें। 16 मई: शनैश्चरी अमावस्या, शनि पूजा, पितृ तर्पण और वट सावित्री व्रत
16 मई, को शनि जयंती, अमावस्या और शनिवार का संयोग बन रहा है। शनैश्चरी अमावस्या होने से ये दिन स्नान-दान और पूजा-पाठ के लिहाज से बेहद खास रहेगा। पुराणों के अनुसार अमावस्या पितरों के लिए खास तिथि मानी जाती है। इस दिन सुबह स्नान के बाद पितरों के लिए जल में काला तिल मिलाकर तर्पण करें। पीपल या शनि मंदिर में सरसों के तेल का दीपक जलाएं। जरूरतमंद और दिव्यांग लोगों को भोजन करवाएं। तिल, तेल, काले कपड़े या जूते-चप्पल दान कर सकते हैं। सुहागिन महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा और परिक्रमा करती हैं। 17 मई: ज्येष्ठ अधिकमास की शुरुआत, विष्णु भक्ति और संयम का महीना
17 मई से अधिकमास शुरू होगा, ये 15 जून तक रहेगा। इसके कारण ज्येष्ठ महीना 30 की बजाय 60 दिनों का रहेगा। अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस महीने भगवान विष्णु की पूजा और दान करने की परंपरा है। अधिकमास की व्यवस्था चंद्र और सौर कैलेंडर में आए अंतर को बैलेंस करने के लिए बनाई गई है। इस महीने में शादी, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कामों के लिए मुहूर्त नहीं होते हैं। पूरा महीना भगवान विष्णु की भक्ति और पूजा-पाठ के लिए होता है।
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