देखा जाये तो पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका की विदेश नीति में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। ट्रंप प्रशासन के दौरान “अमेरिका फर्स्ट” की नीति ने सहयोगी देशों में असहजता पैदा की। कई देशों को लगा कि वॉशिंगटन अब भरोसेमंद साथी नहीं रहा। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। चीन की आर्थिक और सैन्य ताकत जिस तेजी से बढ़ी है, उसने अमेरिका को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि एशिया में उसका प्रभाव बनाए रखने के लिए भारत जैसी लोकतांत्रिक और उभरती शक्ति के साथ मजबूत रिश्ते जरूरी हैं।
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दरअसल, चीन केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धी नहीं रहा। वह अब वैश्विक सप्लाई चेन, तकनीक, रक्षा उत्पादन और सामरिक निवेश के जरिए दुनिया पर अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। दक्षिण चीन सागर से लेकर ताइवान तक, बीजिंग का आक्रामक रवैया अमेरिका के लिए चुनौती बन चुका है। ऐसे में भारत अमेरिका के लिए एक स्वाभाविक विकल्प बनकर उभरा है। भारत एक ऐसा देश है जिसकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, जिसके पास विशाल बाजार है और जो लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करता है।
अमेरिका यह भी समझ चुका है कि केवल सैन्य शक्ति से चीन को रोका नहीं जा सकता। इसके लिए आर्थिक नेटवर्क, तकनीकी साझेदारी और भरोसेमंद औद्योगिक ढांचा जरूरी है। यही कारण है कि सेमीकंडक्टर, रक्षा निर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्रिटिकल मिनरल्स और डिजिटल टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भारत के साथ साझेदारी बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
उधर, भारत के लिए भी यह अवसर कम महत्वपूर्ण नहीं है। लंबे समय तक भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दी। लेकिन अब नई दिल्ली समझ रही है कि वैश्विक शक्ति संतुलन में सक्रिय भूमिका निभाए बिना अपने हित सुरक्षित नहीं रखे जा सकते। यही वजह है कि भारत क्वॉड जैसे मंचों में सक्रिय है और अमेरिका, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग बढ़ा रहा है। हालांकि, भारत की चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ नजदीकी बढ़ाते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति भी बनाए रखे। रूस के साथ रक्षा संबंध हों या पश्चिम एशिया में संतुलन, भारत किसी एक खेमे में पूरी तरह शामिल होने से बचता रहा है। यही उसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत भी है।
एक चीज और उभर कर आ रही है कि अमेरिका को अब भारत के साथ संबंधों में सिर्फ रणनीतिक भाषा नहीं, बल्कि व्यावहारिक निवेश की भी जरूरत है। अगर वॉशिंगटन वास्तव में चीन का प्रभाव कम करना चाहता है, तो उसे भारत में निर्माण, तकनीक और औद्योगिक ढांचे को मजबूत करने में गंभीर निवेश करना होगा। केवल भाषणों और समझौतों से बात नहीं बनेगी। देखा जाये तो भारत के भीतर कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां अमेरिकी निवेश बड़ा बदलाव ला सकता है। उच्च तकनीक, रक्षा उपकरण निर्माण, डिजिटल डेटा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला के क्षेत्र में भारत तेजी से आगे बढ़ सकता है। इससे दोनों देशों को फायदा होगा। एक तो अमेरिका को चीन पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी दूसरा भारत को वैश्विक उत्पादन केंद्र बनने का मौका मिलेगा।
लेकिन इस साझेदारी की असली परीक्षा भरोसे पर होगी। अमेरिका का पिछला रिकॉर्ड कई बार अस्थिर रहा है। अफगानिस्तान से अचानक वापसी और बदलती नीतियों ने उसके सहयोगियों को सतर्क किया है। भारत इसलिए हर कदम सोच-समझकर उठा रहा है। वैसे भी आज की दुनिया में गठबंधन केवल युद्ध लड़ने के लिए नहीं बनते, बल्कि तकनीक, व्यापार, डेटा और सप्लाई चेन पर नियंत्रण के लिए भी बनते हैं। अमेरिका और भारत के रिश्ते अब इसी नए दौर में प्रवेश कर चुके हैं। यह संबंध केवल दो देशों के बीच साझेदारी नहीं, बल्कि एशिया और दुनिया की नई शक्ति संरचना का आधार बन सकता है। मार्को रुबियो की यात्रा इसी बदलती भू-राजनीति का संदेश है। संकेत साफ है कि अमेरिका को अब भारत की जरूरत महसूस हो रही है। और भारत भी यह समझ चुका है कि वैश्विक राजनीति में अब निर्णायक खिलाड़ी बनकर उतरने का समय आ गया है।
इसके अलावा, हाल के घटनाक्रमों ने यह भी साफ़ कर दिया है कि अमेरिका की चीन नीति उतनी सफल नहीं रही, जितनी ट्रंप प्रशासन उम्मीद कर रहा था। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हाल ही में चीन दौरे पर गए थे, लेकिन वहां उन्हें कोई बड़ी रणनीतिक सफलता हासिल नहीं हुई। व्यापार, तकनीक और भू-राजनीतिक तनाव जैसे मुद्दों पर बीजिंग ने अमेरिकी दबाव के सामने झुकने के संकेत नहीं दिए। विश्लेषकों का मानना है कि इसी के बाद वॉशिंगटन को दोबारा यह एहसास हुआ कि एशिया में चीन का संतुलन केवल भारत के सहयोग से ही संभव है। यही वजह है कि ट्रंप के सुर अब बदले-बदले नजर आ रहे हैं। ट्रंप की चीन यात्रा के तुरंत बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत पहुंचे और उन्होंने भारत को “नेचुरल पार्टनर” बताते हुए रिश्तों को नई दिशा देने की बात कही। माना जा रहा है कि ट्रंप ने अपने बेहद करीबी सहयोगियों में गिने जाने वाले भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और विदेश मंत्री मार्को रुबियो को भारत के साथ रिश्तों को फिर से मजबूत करने की जिम्मेदारी दी है। खुद सर्जियो गोर ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ट्रंप भारत और प्रधानमंत्री मोदी के साथ संबंधों को बेहद अहम मानते हैं। दरअसल, अमेरिका अब समझ चुका है कि चीन के साथ “प्रतिस्पर्धा और सहयोग” की उसकी रणनीति सीमित परिणाम दे रही है, जबकि भारत के साथ मजबूत साझेदारी इंडो-पैसिफिक में उसे कहीं अधिक स्थिर और भरोसेमंद आधार दे सकती है।
संभवतः यह भी एक कारण है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अपने दौरे के दौरान साफ शब्दों में कहा कि भारत अब अमेरिका के “सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगियों” में शामिल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बैठकों के बाद रुबियो ने संकेत दिए कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से लंबित व्यापार समझौता अब अंतिम चरण में पहुंच चुका है और आने वाले कुछ हफ्तों में इस पर सहमति बन सकती है। रुबियो ने यह भी स्पष्ट किया कि यह साझेदारी केवल टैरिफ या व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य टेक्नोलॉजी, निवेश, सप्लाई चेन और सामरिक सुरक्षा में गहरा सहयोग स्थापित करना है। क्वॉड को लेकर भी अमेरिका अब केवल औपचारिक बैठकों से आगे बढ़कर उसे वास्तविक आर्थिक और सामरिक गठबंधन के रूप में विकसित करना चाहता है, जिसमें समुद्री सुरक्षा, क्रिटिकल मिनरल्स और चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला प्रमुख एजेंडा होंगे। रुबियो के बयानों से यह साफ झलकता है कि वाशिंगटन अब भारत को केवल दक्षिण एशिया की शक्ति नहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक रणनीति के केंद्रीय स्तंभ के रूप में देख रहा है।
बहरहाल, यह पूरा घटनाक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संतुलित और दूरदर्शी कूटनीति की बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। पिछले लगभग एक वर्ष से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत के खिलाफ तीखे बयान, व्यापारिक दबाव और कई असहज संकेत लगातार सामने आते रहे, लेकिन नई दिल्ली ने कभी भी भावनात्मक प्रतिक्रिया या सार्वजनिक बयानबाजी का रास्ता नहीं चुना। मोदी सरकार ने संयम, धैर्य और रणनीतिक चुप्पी बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी। भारत न तो अमेरिकी दबाव के आगे झुका और न ही संबंधों को टकराव की दिशा में जाने दिया। इसकी बजाय सही समय का इंतजार करते हुए भारत ने अपनी आर्थिक ताकत, वैश्विक प्रतिष्ठा और रणनीतिक महत्व को और मजबूत किया। आज स्थिति यह है कि वही अमेरिका, जो कभी भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा था, अब रिश्तों को सुधारने और भारत को अपना सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बताने पर मजबूर है। यह केवल कूटनीतिक जीत नहीं, बल्कि उस आत्मविश्वासी भारत की तस्वीर है जिसने दुनिया को दिखा दिया कि मजबूत राष्ट्र शोर से नहीं, बल्कि धैर्य, संतुलन और सही रणनीति से अपनी जगह बनाते हैं।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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