देखा जाये तो शुरुआत में ऐसा लगा था कि मक्का पैक्ट एक ऐसा भू-राजनीतिक प्रयोग बनकर उभर रहा है, जिसके तार पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया और संभवतः बंगाल की खाड़ी तक फैल सकते हैं। समझौते का मूल संदेश यह था कि तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा। लेकिन इस घोषणा के पीछे जितनी बड़ी सामरिक महत्वाकांक्षा है, उतनी ही गहरी अस्पष्टता भी है। इसी अस्पष्टता में पाकिस्तान की सबसे बड़ी उम्मीद छिपी है और भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक सवाल भी है। सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में एक नया “इस्लामिक नाटो” बनने जा रहा है, या फिर यह राजनीतिक संदेश, सामरिक दबाव और प्रतिरोधक क्षमता का एक बड़ा लेकिन सीमित प्रयोग भर है?
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देखा जाये तो मक्का समझौते की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी भौगोलिक और सामरिक असंगति है। पाकिस्तान न तो पश्चिम एशिया का हिस्सा है और न ही खाड़ी क्षेत्र का। तुर्किये की सुरक्षा चिंताएं सीरिया, इराक, कुर्द उग्रवाद, शरणार्थियों और अपनी दक्षिणी सीमाओं से जुड़ी हैं। सऊदी अरब के सामने ईरान, यमन के हूती और क्षेत्रीय अस्थिरता की चुनौतियां हैं। पाकिस्तान की प्राथमिक चुनौती बिल्कुल अलग है। ऐसे में सवाल उठता है कि तीनों देशों की साझा “दुश्मन की परिभाषा” आखिर क्या है?
यही कारण है कि इस समझौते को एक मजबूत सैन्य गठबंधन की बजाय फिलहाल स्ट्रैटेजिक सिग्नलिंग और डिटरेंस का प्रयोग कहना अधिक उचित होगा। यहां इतिहास भी कई सवाल खड़े करता है। 2015 में हूती हमलों के दौरान पाकिस्तान ने सऊदी अरब की रक्षा के लिए सीधे सैन्य हस्तक्षेप से दूरी बनाई थी। 2019 में अबकैक और खुरैस के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले के समय भी कोई स्वचालित पाकिस्तानी सैन्य प्रतिक्रिया नहीं हुई। दूसरी तरफ, जब पाकिस्तान और तालिबान के बीच सीमा तनाव हुआ, तब सऊदी अरब ने पाकिस्तान को सैन्य सहायता नहीं दी। ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि जब पुराने द्विपक्षीय समझौते संकट के समय सीधे सैन्य कार्रवाई में नहीं बदले, तो नया त्रिपक्षीय समझौता वास्तव में कितना असरदार साबित होगा?
लेकिन भारत के लिए खतरे का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि तुर्किये या सऊदी अरब वास्तव में पाकिस्तान के लिए युद्ध लड़ेंगे या नहीं? सामरिक गारंटी युद्ध शुरू होने से पहले ही राजनीतिक व्यवहार बदल देती है। पाकिस्तान को यह संदेश मिल सकता है कि उसके पीछे अब एक व्यापक सुरक्षा ढांचा खड़ा है। खासकर तब, जब तुर्किये लगातार पाकिस्तान का राजनीतिक और सैन्य समर्थन करता रहा है, जिसमें ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी उसका रुख भारत के खिलाफ स्पष्ट था।
यही नहीं, 31 अगस्त को इस्तांबुल में हुई बैठक में इस समझौते को और मजबूत बनाने पर भी चर्चा हुई। इसमें एक स्थायी सचिवालय बनाने, सैन्य सहयोग बढ़ाने, रक्षा उद्योग में साझेदारी करने और मिलकर रक्षा उपकरण तैयार करने की बात हुई। रियाद में सचिवालय बनाने और शुरुआती वर्षों में पाकिस्तानी महासचिव नियुक्त करने की योजना से साफ है कि इस समझौते को एक स्थायी और संगठित ढांचा देने की कोशिश की जा रही है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार की सऊदी अरब, तुर्किये और मिस्र के विदेश मंत्रियों से हालिया बातचीत भी बताती है कि इस दिशा में कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं।
अब सबसे संवेदनशील मोर्चा है बांग्लादेश। यदि ढाका इस समझौते में शामिल होता है, तो मामला भारत के लिए पश्चिमी सीमा तक सीमित नहीं रहेगा। पाकिस्तान से जुड़ा एक सामूहिक रक्षा ढांचा भारत की पूर्वी सीमा और बंगाल की खाड़ी तक पहुंच सकता है। भारत की 4096 किलोमीटर लंबी पूर्वी सीमा के संदर्भ में यह रणनीतिक समीकरण बदल सकता है। यही कारण है कि नई दिल्ली कथित रूप से बैकचैनल कूटनीति के जरिए ढाका की वास्तविक मंशा टटोल रही है कि क्या बांग्लादेश वास्तव में सैन्य प्रतिबद्धता चाहता है या इस मंच का उपयोग केवल कूटनीतिक और आर्थिक लाभ के लिए कर रहा है?
यहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की असली ताकत सामने आती है। भारत किसी एक खेमे में बंद देश नहीं है। वह SCO में चीन और पाकिस्तान के साथ बैठता है, अमेरिका, फ्रांस और इजरायल के साथ गहरे सुरक्षा संबंध रखता है और अमेरिका, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वॉड का सदस्य है। भारत की नीति साफ है। हर मंच पर मौजूद रहो, लेकिन किसी की रणनीतिक कैद में मत जाओ।
इसके अलावा, तुर्किये के SCO में पूर्ण सदस्य बनने की महत्वाकांक्षा के बीच भारत के पास ‘सहमति’ नामक एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक हथियार है। दरअसल, SCO में किसी नए देश को सदस्य बनाने के लिए मौजूदा सदस्य देशों की सहमति जरूरी होती है। ऐसे में भारत का रुख साफ है। अगर तुर्किये NATO, मक्का समझौते और SCO, तीनों का हिस्सा बनना चाहता है, तो उसे यह भरोसा देना होगा कि पाकिस्तान के साथ उसका रक्षा समझौता SCO के भीतर भारत के खिलाफ किसी दबाव या रणनीतिक फायदा उठाने का माध्यम नहीं बनेगा। माना जा रहा है कि भारत को तुर्किये से तीन स्पष्ट आश्वासन चाहिए। एक तो पाकिस्तान को तुर्किये के जरिए SCO में अप्रत्यक्ष प्रभाव नहीं मिलेगा। साथ ही SCO की सदस्यता किसी बाहरी रक्षा प्रतिबद्धता का विस्तार नहीं बनेगी और भारत-पाकिस्तान संकट में तुर्किये की संस्थागत स्थिति मक्का समझौते का हथियार नहीं बनेगी।
इसके अलावा, सऊदी अरब के मामले में भी भारत को भावनाओं नहीं बल्कि हितों के आधार पर चलना होगा। ऊर्जा, निवेश और IMEC जैसे संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यदि रियाद पाकिस्तान के साथ नई सुरक्षा प्रतिबद्धता जोड़ता है तो भारत को अपनी ऊर्जा आपूर्ति, निवेश और रणनीतिक साझेदारियों में विविधता बढ़ानी होगी।
देखा जाए तो मक्का पैक्ट को लेकर भारत को डरने की नहीं, बल्कि सतर्क और तैयार रहने की जरूरत है। पाकिस्तान को किसी दूसरे देश का समर्थन मिलने से उसे भारत के खिलाफ खुली छूट नहीं मिल जाएगी। भारत की जवाबी कार्रवाई की नीति अब स्पष्ट है और सीमा पार आतंकवाद का जवाब देने की उसकी क्षमता किसी नए रक्षा समझौते से कम नहीं होगी। मक्का समझौते की सबसे बड़ी ताकत उसका राजनीतिक प्रतीकवाद है और सबसे बड़ी कमजोरी उसकी अस्पष्टता है। लेकिन भारत की ताकत यह है कि नई दिल्ली केवल युद्धक्षेत्र में नहीं, कूटनीतिक गलियारों में भी लड़ना जानती है।
बहरहाल, अंकारा अपने गठबंधन चुन सकता है, रियाद अपनी प्राथमिकताएं तय कर सकता है और पाकिस्तान नई ढाल तलाश सकता है, लेकिन भारत अपनी संप्रभुता और रणनीतिक हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। मोदी की कूटनीति का स्पष्ट संदेश है कि भारत किसी भी गठबंधन से न डरता है, न दबाव में आता है; लेकिन जो भी गठबंधन भारत के हितों को चुनौती देगा, उसे कूटनीति से लेकर रणनीतिक मोर्चे तक भारत के मजबूत जवाब का सामना करना होगा।
-नीरज कुमार दुबे
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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