2025 में भारत ने इस क्षेत्र को अनाज, फल, सब्जियां और डेयरी उत्पाद मिलाकर भारी-भरकम निर्यात किया था. भारत के कुल वैश्विक कृषि निर्यात का 21.8 प्रतिशत हिस्सा अकेले पश्चिम एशिया क्षेत्र में जाता है. वहां रहने वाली बड़ी भारतीय आबादी और भौगोलिक नजदीकी ने खाड़ी देशों को भारतीय उत्पादों के लिए एक स्वाभाविक बाजार बना दिया है. अब यह बाजार युद्ध की भेंट चढ़ता दिख रहा है.
चावल पर सबसे ज्यादा असर
भारत ने पिछले साल पश्चिम एशिया को 4.43 अरब डॉलर का चावल निर्यात किया, जो हमारे कुल वैश्विक चावल निर्यात का 36.7 प्रतिशत है. इसका सीधा मतलब यह है कि अगर युद्ध लंबा खिंचा तो पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के किसानों की आय पर सीधी चोट पड़ेगी. बासमती की महक जो खाड़ी के देशों में बिखरती थी, अब शिपिंग रूट बंद होने के कारण गोदामों में ही दब सकती है.
भारत ने पश्चिम एशिया में पिछले साल 7.48 अरब डॉलर के अनाज और मसाले भेजे थे. इसके अलावा जायफल, इलायची और जावित्री का 295.5 मिलियन डॉलर का निर्यात हुआ. 163 मिलियन डॉलर का जीरा और धनिया भेजा गया. हल्दी और अदरक का भी एक्सपोर्ट 173 मिलियन डॉलर रहा. 240.7 मिलियन डॉलर की कॉफी और 410.1 मिलियन डॉलर की चाय भेजी गई थी.
डेयरी और प्रोसेस्ड फूड: ₹1.35 अरब डॉलर का दांव
भारत का प्रोसेस्ड फूड और कोको उत्पादों का कारोबार भी इस क्षेत्र में काफी फल-फूल रहा था, जो लगभग 1.35 अरब डॉलर तक पहुंच गया था. वहीं, मछली और मांस उत्पादों का निर्यात 1.81 अरब डॉलर रहा. डेयरी सेक्टर की बात करें, तो भारत के कुल डेयरी निर्यात का करीब 28.9 प्रतिशत हिस्सा (281.1 मिलियन डॉलर) इसी क्षेत्र को जाता है. इसके अलावा, मादक और गैर-मादक पेय पदार्थों के मामले में तो हमारी निर्भरता और भी ज्यादा है, जहां कुल निर्यात का 43.3 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया ही खरीदता है.
बढ़ गई हैं दिक्कतें
जीटीआरआई के अजय श्रीवास्तव के अनुसार, युद्ध के कारण अब सबसे बड़ी चुनौती बीमा लागत और शिपिंग रूट को लेकर है. जब युद्ध छिड़ता है, तो जहाजों का बीमा कराना महंगा हो जाता है और माल ले जाने वाले कंटेनरों को लंबे और सुरक्षित रास्तों का चुनाव करना पड़ता है. इससे न केवल लागत बढ़ती है, बल्कि माल पहुंचने में देरी भी होती है. ताजे फल और सब्जियां जैसे उत्पाद इस देरी को बर्दाश्त नहीं कर सकते, जिससे करोड़ों का माल खराब होने का डर बना रहता है.
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