उपभोक्ता आयोग ने कहा कि यदि बैंक को कंपनी की राशि पर कोई संदेह था भी तो उसका सही तरीका नोटों को बैंकिंग चैनल में लाना था. बैंक को राशि स्वीकार करनी चाहिए थी और फिर सक्षम अधिकारियों को इसकी रिपोर्ट करनी चाहिए थी.
यह मामला नोटबंदी के दौरान का है.
बैंक ने यह कहते हुए पैसा जमा करने से मना किया था कि कंपनी का खाता ‘संदिग्ध’ और ‘हाई-रिस्क’ श्रेणी में है. हालांकि, आयोग ने पाया कि बैंक का फैसला पूरी तरह से एकतरफा लिया था. बैंक ने न केवल सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाईं, बल्कि आरबीआई (RBI) की उन अधिसूचनाओं को भी नजरअंदाज कर दिया जो ग्राहकों को अपनी राशि बैंक में जमा कराने का अधिकार देती थीं.
पहले जमा करा लिए 1.3 करोड़
कंपनी ने नोटबंदी के दौरान बैंक ने प्रोक्योर लॉजिस्टिक्स सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के खाते में 1.3 करोड़ रुपये जमा कर दिए. लेकिन इसके बाद 3,19,58,500 रुपये की नगदी को यह कहकर लेने से इंकार कर दिया कि कंपनी का खाता संदिग्ध है.
आयोग ने मानी बैंक की लापरवाही
जे.राजेंद्र और ए.के. मेंदीरत्ता की बेंच ने कह कि कंपनी को हुआ यह नुकसान ‘अपरिवर्तनीय’ है और इसके लिए सीधे तौर पर बैंक की मनमानी जिम्मेदार है. यदि बैंक को कंपनी की जमा राशि पर कोई संदेह था भी तो उसका सही तरीका नोटों को बैंकिंग चैनल में लाना था. बैंक को राशि स्वीकार करनी चाहिए थी और फिर सक्षम अधिकारियों को इसकी रिपोर्ट करनी चाहिए थी. कंपनी ने अपनी ऑडिटेड बैलेंस शीट और पिछले वर्षों का पूरा हिसाब बैंक को सौंपा था, फिर भी बैंक ने बिना किसी वैध आधार के उसे नकदी जमा करने से रोका.
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