ट्रंप ने पिछले साल से ही दुनिया भर के देशों पर टैरिफ लगाने शुरू किए थे. उन्होंने नेशनल इमरजेंसी का हवाला देकर ये कहा कि विदेशी खतरे से अमेरिका को बचाने के लिए ये जरूरी हैं. उन्होंने, कनाडा और मैक्सिको से आने वाले ज्यादातर सामान पर 25 प्रतिशत टैरिफ, चीन से कई सामानों पर 10 प्रतिशत या उससे ज्यादा भी लगाया, और सभी देशों पर 10 प्रतिशत से ज्यादा का रेसिप्रोकल टैरिफ भी लगाया था. ये टैरिफ फेंटानिल क्राइसिस जैसी समस्याओं से जोड़कर लगाए गए थे. लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि IEEPA राष्ट्रपति को टैक्स या टैरिफ लगाने की इजाजत नहीं देता. कोर्ट ने ये भी कहा कि राष्ट्रपति को ऐसे फैसले के लिए कांग्रेस से साफ-साफ मंजूरी लेनी होगी. कोर्ट ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पॉवर्स एक्ट (IEEPA) के तहत लगाए गए ग्लोबल टैरिफ को असंवैधानिक घोषित करने के फैसले के बाद Kobeissi Letter (फाइनेंशियल रिसर्च और कमेंट्री सर्विस है और ग्लोबल कैपिटल मार्केट्स पर रिचर्स और राय देती है) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इसके बारे में पूरी जानकारी दी है. आपको बता दें कि यूएस सुप्रीम कोर्ट का ट्रंप टैरिफ पर फैसला आने के बाद यूएस मार्केट में थोड़ी हलचल देखने को मिली.
यूएस मार्केट पर क्या असर पड़ा?
यूएस मार्केट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शुरुआत में थोड़ी तेजी दिखी. S&P 500 इंडेक्स करीब 1 प्रतिशत ऊपर चढ़ गया और 688.94 के लेवल पर पहुंच गया, जो पिछले सेशन के क्लोज से 0.65 प्रतिशत की बढ़त थी. सिल्वर के दाम भी 5 प्रतिशत तक उछल गए. लेकिन कुल मिलाकर मार्केट का रिएक्शन बहुत तेज नहीं रहा, यानी म्यूटेड ही देखने को मिला. आईईईपीए वाले टैरिफ तो रद्द हो गए, लेकिन सेक्शन 301, सेक्शन 232 जैसे दूसरे कानूनों के तहत कई टैरिफ पहले से बने रहेंगे. ट्रंप ने भी बैकअप प्लान की बात की है, जैसे नया 10 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ या कांग्रेस से मंजूरी लेना.
यूएस डॉलर इंडेक्स में फैसला आने पर पहले गिरावट आई, लेकिन दो घंटे के अंदर ही वो रिकवर हो गया और अनचेंज्ड रह गया. बॉन्ड मार्केट की बात करें तो 10 ईयर नोट यील्ड 1 बेसिस पॉइंट बढ़कर 4.089 प्रतिशत पर पहुंच गया. 30 ईयर यील्ड 4.730 प्रतिशत और 2 ईयर यील्ड 3.474 प्रतिशत पर है. पिछले साल 2025 के ट्रेड वॉर में बॉन्ड मार्केट ही सबसे आगे चलकर संकेत देता था, और अभी भी वो कोर्ट के फैसले को पूरी तरह नहीं मानता हुआ नजर आया है. निवेशक सोचते हैं कि ट्रंप किसी न किसी तरीके से टैरिफ को बनाए रखेंगे, चाहे पुराने कानूनों से या फिर नए प्लान से. इसीलिए बॉन्ड यील्ड में ज्यादा गिरावट नहीं आई और मार्केट में स्थिरता बनी हुई है.
यूएस का पूरा बाजार ऊपर नहीं नजर आया है. बड़ी कंपनियों के शेयरों में लिक्विडिटी यानी पैसा आ रहा है, लेकिन छोटे और मिडकैप शेयरों पर दबाव बना हुआ है. इससे ये भी मतलब निकलकर आ रहा है कि निवेशक सुरक्षित और मजबूत माने जाने वाले ऑप्शन में ही पैसा लगा रहे हैं. बाजार ऊपर से मजबूत दिख रहा है, लेकिन अंदर से यह काफी चुनिंदा रैली है.
ट्रंप की क्या प्रतिक्रिया है?
ट्रंप ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को डिसग्रेस यानी शर्मनाक और डीपली डिसअपॉइंटिंग(deeply dissapointing) भी कहा है. ट्रंप रुकने वाले नहीं. उन्होंने तुरंत ऐलान किया कि वो अल्टरनेटिव तरीके अपनाएंगे. इतना ही नहीं, उन्होंने एक नए 10 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ का ऐलान कर दिया, जो मौजूदा टैरिफ के ऊपर होगा और किसी दूसरे कानून के तहत लगाया जाएगा.
ट्रंप का बैकअप प्लान क्या हो सकता है?
सबसे पहले तो ये फैसला ट्रंप टैरिफ को तुरंत रद्द कर देता है जो आईईईपीए के तहत लगाए गए थे. अमेरिकी सरकार ने इन टैरिफ से अब तक 130 से 287 बिलियन डॉलर तक वसूले हैं, यानी करीब 175 बिलियन डॉलर से ज्यादा की रकम रिफंड हो सकती है. लेकिन कोर्ट ने रिफंड के बारे में साफ नहीं कहा, सिर्फ इतना कहा कि ये प्रोसेस एक बड़ा मेस(Mess) यानी अव्यवस्थित होगा. लाखों आयातक, करोड़ों उपभोक्ता और ट्रिलियंस डॉलर के ट्रेड डील इसमें फंस सकते हैं.
कोर्ट ने मामले को यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड को वापस भेजा है ताकि रिफंड का मुद्दा देखा जाए. लेकिन रिफंड इतना आसान नहीं. पॉलीमार्केट जैसी बेटिंग साइट पर तो सिर्फ 36 प्रतिशत चांस है कि ट्रंप प्रशासन को टैरिफ रिफंड करने पड़ेंगे. अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्यों? क्योंकि कांग्रेस अब भी एक बिल पास करके इन टैरिफ को मंजूरी दे सकती है. ट्रंप के सपोर्टर कांग्रेस में हैं, तो ये मुमकिन भी हो सकता है.
ट्रंप के आगे के प्लान में सबसे पहले तो कांग्रेस से मंजूरी लेना शामिल हो सकता है, सेक्शन 301 या 232 जैसे दूसरे ट्रेड लॉ का इस्तेमाल बढ़ा सकते हैं, या सेक्शन 122 के तहत इंपोर्ट सरचार्ज लगा सकते हैं. सेक्शन 301 के तहत चीन पर 7.5 से 25 प्रतिशत टैरिफ, स्टील पर 25 प्रतिशत, एल्युमिनियम पर 10 प्रतिशत जैसे कई टैरिफ पहले से बचे रहेंगे. मतलब, सारे टैरिफ गायब नहीं होंगे. अमेरिका का एवरेज इफेक्टिव टैरिफ रेट अभी भी 17 प्रतिशत के आसपास रहेगा, जो 90 साल का हाई है.
भारत को राहत मिलेगी या नहीं?
भारत जैसे देशों पर ट्रंप ने रूसी तेल खरीदने के लिए टैरिफ लगाए थे. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने सस्ता रूसी तेल खरीदा, जो अमेरिका को पसंद नहीं आया. इसके अलावा, रेसिप्रोकल टैरिफ के तहत भारत पर 50 प्रतिशत तक ड्यूटी लगी थी. ये टैरिफ आईईईपीए के तहत थे, तो अब गैरकानूनी हो गए. मतलब, भारतीय निर्यातकों को अमेरिका में सामान भेजना सस्ता हो सकता है. स्टील, एल्युमिनियम, ऑटो पार्ट्स, टेक्सटाइल जैसी चीजें जो भारत से जाती हैं, उन पर बोझ कम होगा. उपभोक्ताओं के लिए भी अच्छा, क्योंकि महंगाई कम हो सकती है. लेकिन राहत पूरी नहीं.
ट्रंप ने नया 10 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ ऐलान किया है, जो भारत पर भी लागू हो सकता है. साथ ही, सेक्शन 301 जैसे दूसरे टैरिफ बचे रहेंगे. ट्रंप ने पहले भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर का क्रेडिट टैरिफ थ्रेट(Tariff threat) दिया था, उनका कहना था कि कि 250 प्रतिशत टैरिफ की धमकी से 24 घंटे में युद्ध रुक गया. लेकिन भारत-पाकिस्तान ने इस दावे पर सवाल उठाए हैं. फिलहाल, भारत के लिए अनिश्चितता बनी रहेगी. अगर कांग्रेस ट्रंप को सपोर्ट करती है तो टैरिफ वापस आ सकते हैं.
ये फैसला सिर्फ अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि विदेश नीति का भी है. ट्रंप टैरिफ को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हुए दिखे हैं, क्यूबा को तेल देने वाले देशों पर, ग्रीनलैंड खरीदने के लिए यूरोपीय देशों पर धमकी. अब सुप्रीम कोर्ट ने वो हथियार छीन लिया. इससे दुनिया भर के ट्रेड डील पर भी अनसर्टेनिटी के घेरे में आ गई हैं. रिफंड अगर हुए तो अमेरिकी सरकार को बड़ा झटका लगेगा, लेकिन उपभोक्ताओं और कंपनियों को फायदा मिलेगा. कई कंपनियां जैसे कोस्टको, टोयोटा, बीवाईडी, गुडइयर ने पहले से ही मुकदमे दायर किए हैं रिफंड के लिए. ये एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित होने वाला है.
ट्रंप टैरिफ और सुप्रीम कोर्ट से जुड़े हुए सवाल-जवाब
सेक्शन 122 क्या है?
ये ट्रेड एक्ट 1974 का हिस्सा है. अगर अमेरिका को बड़ा और गंभीर बैलेंस ऑफ पेमेंट्स डेफिसिट (यानी ट्रेड डेफिसिट या डॉलर की कमजोरी) हो रहा हो, तो राष्ट्रपति टेम्पररी तरीके से सभी देशों पर 15 प्रतिशत तक टैरिफ या इंपोर्ट कोटा लगा सकते हैं. ये सिर्फ 150 दिनों के लिए होता है, उसके बाद कांग्रेस की मंजूरी चाहिए. ट्रंप ने फैसले के तुरंत बाद इसी सेक्शन के तहत 10 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ लगा दिया है, जो 24 फरवरी 2026 से लागू होगा. ये पुराने आईईईपीए टैरिफ की जगह ले रहा है, लेकिन कुछ सामान जैसे क्रिटिकल मिनरल्स, एनर्जी, फार्मा, कुछ एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स और व्हीकल पार्ट्स पर छूट है. पहले कभी किसी राष्ट्रपति ने इसे इस्तेमाल नहीं किया था.
सेक्शन 301 क्या है?
ये भी ट्रेड एक्ट 1974 का ही हिस्सा है. अगर कोई विदेशी देश अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस करता है, जैसे इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी चोरी, जबरदस्ती टेक्नोलॉजी ट्रांसफर या अमेरिकी व्यापार पर बोझ डालने वाली पॉलिसी, तो यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) जांच करता है. जांच के बाद राष्ट्रपति टैरिफ लगा सकते हैं, ट्रेड एग्रीमेंट सस्पेंड कर सकते हैं या दूसरे उपाय कर सकते हैं. ट्रंप के पहले टर्म में चीन पर इसी सेक्शन से 7.5 से 25 प्रतिशत टैरिफ लगाए गए थे, जो अभी भी चल रहे हैं. अब ट्रंप ने कहा है कि वो कई देशों पर नई जांच शुरू करेंगे, जिससे और टैरिफ लग सकते हैं. ये टैरिफ स्पेसिफिक देशों या प्रैक्टिस पर लगते हैं और लंबे समय तक रह सकते हैं, लेकिन जांच में समय लगता है.
ट्रंप ने नया 10 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ क्यों लगाया?
कल सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के पुराने बड़े टैरिफ को गैरकानूनी कहा था, जो उन्होंने इमरजेंसी पावर यानी आईईईपीए से लगाए थे. कोर्ट ने फैसला दिया कि राष्ट्रपति को ऐसे टैरिफ के लिए कांग्रेस से साफ मंजूरी चाहिए. ट्रंप इस फैसले से बहुत नाराज नजर आए और तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताया कि वह अब दूसरे तरीकों से टैरिफ लगाएंगे. उन्होंने ऐलान किया कि अमेरिका के सभी ट्रेड पार्टनर देशों पर 10 प्रतिशत का एक्स्ट्रा ग्लोबल टैरिफ लगा रहे हैं. ये टैरिफ पुराने वाले के ऊपर लग रहा है और ये सेक्शन 122 के तहत लगाया गया है.
बाजार पर क्या असर पड़ेगा?
जियोपॉलिटिकल तनाव बढ़ते ही बाजार में उतार-चढ़ाव बहुत तेज हो जाता है, क्योंकि लोग डर से जल्दी-जल्दी ट्रेड करते हैं. लीवरेज यानी कर्ज लेकर निवेश करने वाले ट्रेडर सबसे पहले घबरा जाते हैं और अपनी पोजिशन तुरंत बदल देते हैं. इससे शेयर बाजार और कमोडिटी जैसे तेल, गोल्ड में भी तेज मूवमेंट शुरू हो जाता है, कभी गिरावट तो कभी उछाल देखने को मिलता है.
सोने में क्यों तेजी देखने को मिल रही है?
सोना हमेशा अनिश्चितता के समय सुरक्षित निवेश माना जाता है. जब लोगों को करेंसी या केंद्रीय बैंकों की नीतियों पर पूरी तरह भरोसा नहीं होता, तो वे सोने में निवेश करने लग जाते हैं. गोल्ड यह संकेत देता है कि निवेशक सुरक्षा भी चाहते हैं.
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