अमेरिका-ईरान युद्ध से तेल के बाजार में आग लगी है. हॉर्मूज स्ट्रेट बंद होने से सप्लाई बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है. लेकिन भारत का मजबूत स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व देश में पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रोकने और मांग को पूरा करने में खूब मदद करेगा और भारत पर जल्द कोई बड़ा संकट नहीं आएगा.
भारत के पास इस संकट से निपटने के लिए पर्याप्त ‘बफर’ मौजूद है.
अमेरिका-ईरान युद्ध की वजह से हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने की आंशका हो गई है. इसी रूट से भारत के कच्चे तेल का लगभग आधा हिस्सा आता है. अगर यह रास्ता बंद हो जाता है तो क्रूड स्पलाई बुरी तरह प्रभावित होगी. बहुत से लोग मान रहे हैं कि ऐसा होने पर भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ सकते हैं. लेकिन, डेटा और एनालिटिक्स फर्म केपलर के अनुसार, भारत के पास इस संकट से निपटने के लिए पर्याप्त ‘बफर’ मौजूद है. केपलर इन्वेंटरी डेटा के मुताबिक, भारत के पास वर्तमान में लगभग 10 करोड़ बैरल का वाणिज्यिक कच्चा तेल भंडार उपलब्ध है, जो किसी भी आपात स्थिति में दाम बढने से रोकने में काम आएगा.
45 दिनों का बैकअप तैयार
भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में विशाल भूमिगत गुफाएं बनाई हैं जिनमें तेल जमा किया जाता है. केपलर के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट निखिल दुबे ने बताया कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए भारत रोजाना लगभग 25 लाख बैरल तेल आयात करता है. दुबे के अनुसार, “भारत के संयुक्त भंडार सैद्धांतिक रूप से आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में लगभग 40 से 45 दिनों तक देश की जरूरत पूरी कर सकते हैं.” भारत के पास फिलहाल 53 लाख टन कच्चे तेल का रणनीतिक भंडारण क्षमता है, जो विशाखापत्तनम (1.33 एमएमटी), मैंगलुरु (1.5 एमएमटी) और पडुर (2.5 एमएमटी) में ‘स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व’ (SPR) में रखा गया है.
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी (Hardeep Singh Puri) ने हाल ही में राज्यसभा में भरोसा दिलाया था कि किसी भी बड़े भू-राजनीतिक झटके की स्थिति में देश के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार 74 दिनों तक ऊर्जा जरूरतें पूरी करने में सक्षम हैं.
नहीं रुकेंगी भारत की रिफाइनरियां
केपलर के रिफाइनिंग और मॉडलिंग के लीड रिसर्च एनालिस्ट सुमित रितोलिया का कहना है कि कच्चे तेल की आपूर्ति को सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR), वाणिज्यिक स्टॉक और रूस से आने वाली वैकल्पिक आपूर्ति के जरिए संतुलित किया जा सकता है. इसका मतलब है कि यदि खाड़ी देशों से तेल आने में कुछ समय की बाधा आती भी है, तो भी भारत की रिफाइनरियां रुकेंगी नहीं.
रूस बनेगा ‘संकटमोचक’
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट के दौर में रूस एक बार फिर भारत के लिए बड़ा सहारा बनेगा. निखिल दुबे का कहना है कि अरब सागर में बिना स्पष्ट खरीदार के तैर रहे रूसी तेल को भारतीय रिफाइनरियां तेजी से खरीद सकती हैं. चूंकि रूस के तेल मार्ग हॉर्मुज पर निर्भर नहीं हैं, इसलिए वहां से आपूर्ति सुरक्षित करना भारत की प्राथमिकता होगी.
बाजार विश्लेषकों का यह भी तर्क है कि सरकार तेल की कीमतों को स्थिर रखने के लिए ‘प्राइस स्टेबलाइजेशन’ फंड या एक्साइज ड्यूटी में कटौती जैसे कदम उठा सकती है ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रूड महंगा होने का बोझ सीधे जनता की जेब पर न पड़े.
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