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1 अक्टूबर को पितृपक्ष का पांचवा दिन है। ये कुंवारे लोगों के श्राद्ध का दिन होता है। इसे कुंवारा पंचमी भी कहा जाता है। इस दिन उन लड़के-लड़कियों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु शादी होने से पहले ही हो गई थी। साथ ही, इस दिन उन पितरों का भी श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु किसी भी महीने की पंचमी तिथि को हुई थी।
अविवाहित लोगों की मृत्यु तिथि पता हो तो श्राद्ध पंचमी पर करें या उनकी मूल तिथि पर? क्या दोनों दिन श्राद्ध किया जा सकता है? धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु के नियमों से समझिए इन सवालों के साफ जवाब।
सवाल 1: पितृपक्ष की पंचमी तिथि खास क्यों है, इस दिन क्या होता है?
जवाब: सनातन परंपरा में 16 संस्कारों में विवाह को महत्वपूर्ण माना गया है। जिन लोगों की मृत्यु शादी से पहले हो जाती है, उनका ‘सपिण्डीकरण संस्कार’ नहीं होता। यानी, पितरों की मुख्य कतार में मिलाने की प्रक्रिया। शास्त्रों ने पितृपक्ष की पंचमी को ऐसे अविवाहित दिवंगतों के उद्धार और शांति के लिए तय किया है। इस दिन दोपहर में परिवार का मुखिया दक्षिण दिशा में मुख करके कुशा, जल और काले तिल से तर्पण करता है, एक पिण्ड का दान करता है, पंचबलि (गाय, कुत्ते, कौवे, देव और चींटी का हिस्सा) निकालता है और एक ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराकर दक्षिणा देता है।
सवाल 2: अविवाहित लोगों की मृत्यु तिथि पता है, तो श्राद्ध कब करें?
जवाब: आपको अविवाहित परिजन की सही मृत्यु तिथि पता है, तो उनका श्राद्ध उनकी मूल मृत्यु तिथि पर ही किया जाना चाहिए। पंचमी उनके लिए एक ‘अतिरिक्त समर्पित अवसर’ है। इसलिए मूल तिथि पर तो उनका श्राद्ध-तर्पण जरूर करें, लेकिन श्रद्धा हो तो पंचमी और मृत्यु तिथि, दोनों पर कर सकते हैं।
सवाल 3: यदि मृत्यु की सही तिथि मालूम न हो, तब क्या नियम है और मालूम हो तो दोनों तिथियों पर श्राद्ध कर सकते हैं ?
जवाब: परिवार के किसी अविवाहित मृत इंसान की मृत्यु तिथि किसी को याद नहीं है, तो बिना किसी संशय के उनका श्राद्ध पंचमी तिथि (कुंवारा पंचमी) को ही किया जाएगा। शास्त्रों ने अज्ञात तिथि वाले सभी अविवाहित लोगों के लिए पंचमी तिथि तय की है। अगर मृत्यु तिथि पता हो तो दोनों तिथियों पर भी श्राद्ध कर सकते हैं। इसे ग्रंथों में बहुत अच्छा माना गया है।
सवाल 4: अविवाहितों का श्राद्ध सामान्य श्राद्ध से कैसे अलग होता है?
विवाहित पूर्वजों का श्राद्ध तीन पीढ़ियों के संयुक्त ‘पार्वण श्राद्ध’ के रूप में होता है, जबकि अविवाहितों का श्राद्ध केवल उसी एक दिवंगत की शांति के लिए होने वाला ‘एकोद्दिष्ट श्राद्ध’ कहलाता है। इस कारण दोनों की पूजन विधि में फर्क होता है।
सामान्य श्राद्ध में जहां देवताओं (विश्वेदेव) की चौकी लगती है, तीन पिंड बनते हैं और दो या अधिक ब्राह्मण भोजन करवाया जाता है, वहीं अविवाहितों के श्राद्ध में देव पूजन नहीं होता और केवल 1 ही पिण्ड अर्पित होता है। भोजन के लिए भी केवल एक ब्राह्मण को ही आमंत्रित करने का नियम है।
सवाल 5: बेटियों और बच्चों के लिए क्या है नियम?
अविवाहित कन्या: परिवार में किसी अविवाहित बेटी या बहन की मृत्यु हुई है, तो उसका श्राद्ध हमेशा उसके पिता के घर, पिता के गोत्र में पिता या भाइयों द्वारा ही किया जाता है (विवाह के बाद गोत्र पति का हो जाता है)।
अविवाहित बालक: किसी बालक का जनेऊ (उपनयन) संस्कार होने से पहले ही मृत्यु हो गई हो, तो उसके लिए वैदिक मन्त्रों से पिण्डदान नहीं किया जाता। उसके लिए केवल नाम-गोत्र लेकर कुश के अगले हिस्से से दूध-जल का तर्पण करते हैं और अन्न-वस्त्र का दान किया जाता है।
सवाल 6: श्राद्ध का सही समय और जरूरी सावधानियां क्या होती हैं ?
जवाब: श्राद्ध कभी भी सुबह या शाम के समय नहीं किया जाता। इसके लिए दिन का आठवां मुहूर्त तय किया गया है। इसे कुतुप काल कहते हैं। ये सुबह लगभग 11:36 से दोपहर 12:24 के बीच का समय होता है। इस दौरान दक्षिण दिशा की तरफ मुंह रखकर शांति और श्रद्धा से किया गया तर्पण और दान पितरों को सीधे तृप्त करता है और परिवार को पितृदोष से मुक्ति दिलाता है।
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