जवागल श्रीनाथ ने सौरव गांगुली-स्टीव वॉ के 2001 की पुराने टॉस घटना को याद करते हुए कहा कि अगर वह उस समय मैच रेफरी होते तो वह कुछ मैचों के लिए गांगुली को बैन कर देते।
गांगुली ने बाद में कहा कि उन्हें अपना ब्लेजर नहीं मिला, जिसकी वजह से देरी हुई, लेकिन इस पर बहुत बहस हो सकती है।
हालांकि, श्रीनाथ ने गांगुली की लीडरशिप की तारीफ की, खासकर युवराज सिंह, हरभजन सिंह और वीरेंद्र सहवाग जैसे युवाओं को तैयार करने की उनकी काबिलियत की। उन्हें लगा कि 1990 के दशक के आखिर में मैच-फिक्सिंग स्कैंडल के बाद भारतीय क्रिकेट में एक बड़ा बदलाव आया, जिसमें खिलाड़ियों ने मिलकर खेल की इमेज को ठीक करने का इरादा बनाया।
श्रीनाथ ने कहा, “प्रत्येक खिलाड़ी में उस छवि को वापस लाने और फिर दुनिया को साबित करने की दृढ़ता थी कि क्रिकेट श्रेष्ठ है, क्रिकेट साफ-सुथरा है।”
उन्होंने कहा कि लीडरशिप टॉप चार या पांच खिलाड़ियों के एक ही पेज पर होने से आया, जिससे भारत को न केवल घरेलू मैदान पर लगातार जीत हासिल करने में मदद मिली, बल्कि विदेशों में भी जीत हासिल करने में मदद मिली।
श्रीनाथ ने याद किया कि 1991 और 1997-98 के बीच, भारत को विदेशों में जीतने के लिए संघर्ष करना पड़ा, लेकिन 1999 के बाद से चीजें बदलनी शुरू हो गईं।
2003 वर्ल्ड कप फाइनल में पहले बैटिंग करना चाहते थे श्रीनाथ
2003 वर्ल्ड कप फाइनल हारे 23 साल हो गए हैं, मगर भारतीय फैंस के जहन में वह दर्द आज भी ताजा है। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उस खिताबी मुकाबले को याद करते हुए श्रीनाथ ने कहा कि वह टीम में उन लोगों में थे जो चाहते थे कि भारत पहले बैटिंग करे और ऑस्ट्रेलिया को दबाव में डाले।
उन्होंने कहा, “मैं उन लोगों में से एक था जो चाहता था कि हमें हमेशा पहले बैटिंग करनी चाहिए और फिर उन पर प्रेशर डालना चाहिए।”
लेकिन गांगुली की सोच अलग थी। और एक बार फैसला हो जाने के बाद, श्रीनाथ ने कहा कि टीम को आगे बढ़ना होगा, लेकिन ऑस्ट्रेलिया बहुत ज्यादा मजबूत थी।
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