मिडिल ईस्ट जंग ने भारत के सामने कई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं.एक ओर तो तेल-गैस का सवाल है, तो दूसरी ओर उन लाखों भारतीयों की सुरक्षा का जिम्मा है जो खाड़ी देशों में रहकर अपने वतन की अर्थव्यवस्था में अहम योगदान देते हैं. ऐसे में जयशंकर का फोन घनघनाना और एक के बाद एक वैश्विक समकक्षों से ‘दो टूक’ बात करना यह साबित करता है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं, बल्कि एजेंडा सेट करने वाला देश बन चुका है. हालिया दिनों में सऊदी अरब, यूएई, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, जर्मनी और दक्षिण कोरिया के साथ हुई उनकी बातचीत इसी रणनीति का हिस्सा है.
सऊदी-यूएई संग मिलकर तलाशा जा रहा शांति का रास्ता
भारत ने बिना किसी लाग-लपेट के अपनी चिंताएं सामने रखी हैं और अरब देशों का नजरिया भी पूरी ईमानदारी से सुना है. सऊदी अरब और यूएई दोनों ही देश इस वक्त उस नाजुक मोड़ पर खड़े हैं जहां वे ईरान के साथ सीधे टकराव से बचना चाहते हैं, लेकिन साथ ही वे अपने क्षेत्र में अस्थिरता भी नहीं चाहते. भारत इन दोनों देशों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित कर रहा है कि युद्ध की आग को होर्मुज की खाड़ी से आगे न फैलने दिया जाए. क्षेत्रीय स्थिरता इस समय केवल अरब देशों की जरूरत नहीं है, बल्कि यह भारत के अपने आर्थिक वजूद के लिए भी अनिवार्य है.
‘लुक ईस्ट’ का नया अध्याय
जयशंकर और सुगियोनो के बीच पश्चिम एशिया के संकट पर चर्चा हुई, यह बताता है कि दोनों देश इस युद्ध के कारण इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में पड़ने वाले प्रभावों को लेकर सतर्क हैं. इस बातचीत में न केवल वैश्विक मुद्दों पर चर्चा हुई, बल्कि द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने और जल्द ही ज्वाइंट कमीशन की बैठक बुलाने पर भी सहमति बनी. इंडोनेशियाई विदेश मंत्री ने खुद इस चर्चा को बेहद क्रिएटिव बताया. जयशंकर का दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्री से बात करना इस मायने में अहम है कि दक्षिण कोरिया भी भारत की ही तरह ऊर्जा आयात पर भारी रूप से निर्भर है. ऐसे में एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ लाकर भारत प्रेशर बनाने की कोशिश कर रहा है.
महाशक्तियों के बीच भारत का अभूतपूर्व ‘बैलेंसिंग एक्ट’
क्यों बेचैन है पूरी दुनिया और क्यों डटा है भारत?
इन तमाम कूटनीतिक मुलाकातों और टेलीफोन कॉल्स के सेंटर में सिर्फ एक ही बात है, ईरान की ओर से होर्मुज का बंद कर देना. तेल मार्केट में कोहराम मचा हुआ है, होर्मुज का यह संकरा रास्ता कोई आम समुद्री मार्ग नहीं है, बल्कि यह दुनिया की एनर्जी की नस है. फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाले इस जलमार्ग से दुनिया के कुल कच्चे तेल और LNG का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है. अगर यह रास्ता कुछ हफ्तों के लिए भी पूरी तरह बंद हो जाए, तो दुनिया एक भयानक आर्थिक मंदी के गर्त में गिर सकती है.
भारत के लिए यह स्थिति किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है और इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आता है. तेल की कीमतों में उछाल का सीधा असर भारत की महंगाई दर, चालू खाते के घाटे और आम आदमी की जेब पर पड़ता है. ऐसे में जयशंकर की सक्रियता सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक मोर्चे पर देश को बचाने की एक मजबूत ढाल है. भारत यह सुनिश्चित कर रहा है कि चाहे जो भी हालात हों, भारतीय तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों को इस इलाके में बिना किसी रुकावट के सुरक्षित रास्ता मिलता रहे.
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