अमेरिका भारत पर एक और टेरिफ लगाने की तैयारी में था। लेकिन उससे पहले भारत ने एक ऐसा दांव चल दिया जिससे ट्रंप प्रशासन की पूरी रणनीति को बड़ा झटका लगा है। दरअसल अमेरिका का आरोप था कि भारत जबरन मजदूरी यानी फोर्स लेबर से बने सामान के आयात को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहा और इसी आरोप के आधार पर ट्रंप प्रशासन भारत पर एक और टेरिफ लगाने की तैयारी कर रहा था। लेकिन अमेरिका अपना फैसला सुनाता उससे पहले ही भारत में ऐसा दांव चल लिया जिसने वाशिंगटन की पूरी दलील को चुनौती दे दी। भारत सरकार ने विदेश व्यापार नीति में बड़ा बदलाव करते हुए ऐलान कर दिया कि अब जबरन मजदूरी से बने किसी भी सामान का भारत में आयात नहीं होगा। यानी जिस मुद्दे को आधार बनाकर अमेरिका भारत पर दबाव बना रहा था। उसी मुद्दे पर भारत ने पहले ही अपना कानून सख्त कर दिया।
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दरअसल यह मामला बहुत पेचीदा है। कुछ समय पहले अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय यानी यूएसटीआर ने भारत समेत 60 देशों के खिलाफ सेक्शन 301 इन्वेस्टिगेशन शुरू की और अमेरिका ने आरोप लगाया कि इन देशों ने जबरन मजदूरी से बने सामानयात को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। इन देशों में भारत और चीन जैसे देश शामिल थे और इसी जांच के आधार पर अमेरिका ने भारत समेत 54 देशों के सामान पर 12 1/2% अतिरिक्त टेरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा। अगर यह टेरिफ लागू होता है तो भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में ज्यादा शुल्क देना पड़ सकता है। जिससे कई भारतीय उत्पाद महंगे हो जाएंगे। लेकिन अमेरिका की इस तैयारी के बीच भारत ने भी तेजी से कदम उठाया। 13 जुलाई को डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड डीजीएफटी ने एक नई अधिसूचना जारी की। इसमें साफ कहा गया कि अब ऐसा कोई भी सामान भारत में आयात नहीं किया जा सकेगा जिसे पूरी तरह या आंशिक रूप से फोर्स्ड लेबर यानी जबरन मजदूरी से तैयार किया गया हो। यानी अगर जांच में यह पाया जाता है कि किसी उत्पाद को लोगों से उनकी इच्छा के खिलाफ धमकी देकर या दबाव डालकर बनवाया गया है तो भारत उस उत्पाद के आयात पर रोक लगा सकता है।
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सरकार ने फोर्स लेबर की परिभाषा भी वही अपनाई है जो अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन आईएलओ के 1930 के कन्वेंशन में दी गई है। इससे भारत ने यह संकेत दिया कि वह अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के अनुरूप अपना व्यापारिक ढांचा तैयार कर रहा है। लेकिन भारत सिर्फ नियम बनाकर नहीं रुका। अमेरिका की 301 जांच पर भी भारत ने खुलकर आपत्ति दर्ज कराई। अमेरिका में हुई सुनवाई के दौरान वाणिज्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव ने कहा कि इस तरह के मामलों का समाधान एक तरफ़ा टेरिफ लगाकर नहीं बल्कि विपक्षीय व्यापार वार्ता के जरिए होना चाहिए। भारत ने अमेरिका के रवैया पर भी सवाल उठाए। भारतीय पक्ष ने कहा कि अमेरिका खुद लगभग 1600 उत्पादों को अपनी जांच के दायरे से बाहर रखता है। अगर उद्देश्य वास्तव में जबरन मजदूरी को रोकना है तो फिर इतने बड़े पैमाने पर छूट क्यों दी जा रही है? भारत ने यह भी कहा कि अमेरिकी नीति कुछ मामलों में अपने ही उत्पादों को बढ़ावा देती है। इसलिए केवल दूसरे देशों पर अतिरिक्त टेररिफ लगाना उचित तरीका नहीं। यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जा रहा है। एक तरफ भारत ने अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप अपने नियमों को और मजबूत किया। दूसरी तरफ अमेरिका के प्रस्तावित टेरिफ पर भी अपनी आपत्ति दर्ज करा दी। इस पूरे मामले का असर भारत अमेरिका व्यापार वार्ता पर भी पड़ सकता है। दोनों देश इस समय एक बड़े व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं।
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