नई दिल्ली: ‘कॉफी पर कुरुक्षेत्र’ कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश की राजनीति, जंतर-मंतर आंदोलन, राम मंदिर से जुड़े मुद्दे, बिहार उपचुनाव और आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। कार्यक्रम में राजनीतिक विश्लेषक मनोज कुमार सिंह, इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पराशर और वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री ने विभिन्न मुद्दों पर अपने-अपने विचार रखे। कार्यक्रम की शुरुआत में कहा गया कि हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों, जंतर-मंतर आंदोलन, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे, दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शनों, राम मंदिर से जुड़े चढ़ावे के विवाद और उपचुनावों का उत्तर प्रदेश की राजनीति पर क्या असर पड़ सकता है, इसी पर चर्चा की जाएगी। इस दौरान बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा की हार का भी जिक्र हुआ और इसे लेकर विपक्ष द्वारा किए जा रहे राजनीतिक हमलों पर बातचीत हुई।
यूपी चुनाव पर हो जंतर-मंतर आंदोलन का असर?
मनोज कुमार सिंह ने जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान किए गए अपने सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि आंदोलन में शामिल लोगों से कई मुद्दों पर राय ली गई। उनके अनुसार, बड़ी संख्या में प्रतिभागियों ने माना कि आंदोलन में राजनीतिक दलों की मौजूदगी राजनीतिक लाभ के उद्देश्य से थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि आंदोलन में शामिल लोगों की राजनीतिक पसंद और प्रधानमंत्री पद को लेकर उनकी राय आम धारणा से अलग थी। साथ ही उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर आंदोलन का उत्तर प्रदेश के चुनावों पर व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं दिखती।
चढ़ावा चोरी का मामला करेगा प्रभावित?
विनोद अग्निहोत्री ने उत्तर प्रदेश की राजनीति का विश्लेषण करते हुए कहा कि राज्य में लंबे समय से चुनाव जातीय या धार्मिक ध्रुवीकरण के आधार पर प्रभावित होते रहे हैं। उन्होंने 1991, 1993, 2017 और 2022 के चुनावों का उल्लेख करते हुए कहा कि भाजपा को तब अधिक सफलता मिली, जब हिंदू ध्रुवीकरण मजबूत रहा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि राम मंदिर से जुड़े चढ़ावे के विवाद जैसे मुद्दे भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकते हैं और इनका कुछ राजनीतिक असर हो सकता है।
यूपी में बरकार है सीएम योगी की लोकप्रियता
चर्चा के दौरान यह भी कहा गया कि भाजपा के पास राम मंदिर, काशी और अन्य धार्मिक मुद्दों पर अपनी बात रखने के लिए पर्याप्त राजनीतिक आधार मौजूद है। वहीं विपक्ष इन मुद्दों के जरिए सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। इस दौरान इस बात पर भी चर्चा हुई कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता अभी भी बरकरार है और उनके नेतृत्व, कानून-व्यवस्था तथा प्रशासनिक छवि को भाजपा की ताकत के रूप में देखा जा रहा है।
यूपी चुनाव के लिए क्या हैं जरूरी फैक्टर?
विष्लेषकों ने यह भी कहा कि चुनाव केवल नेतृत्व के आधार पर नहीं, बल्कि उम्मीदवार चयन, जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दों और संगठन की मजबूती जैसे कई कारकों से प्रभावित होते हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने उम्मीदवार चयन और सामाजिक समीकरण साधने की चुनौती का भी उल्लेख किया गया, जबकि समाजवादी पार्टी के सामने अपने कोर वोट बैंक और चुनावी रणनीति को संतुलित रखने की चुनौती बताई गई। कार्यक्रम के अंत में राजनीतिक संचार, जनधारणा और चुनावी रणनीति पर चर्चा हुई। विश्लेषकों ने कहा कि किसी भी मुद्दे का चुनावी असर इस बात पर निर्भर करता है कि राजनीतिक दल उसे किस प्रकार जनता के बीच प्रस्तुत करते हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में स्थानीय मुद्दों, हिंदुत्व, जातीय समीकरण और नेतृत्व की विश्वसनीयता जैसे सभी पहलू महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)
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